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ग्रामीण भारत की ओर बढ़कर अपना वोटबैंक मजबूत कर रहे हैं पीएम मोदी

बीजेपी के सामाजिक आधार में व्यापक बदलाव आना तय है. यह बदलाव बीजेपी को अंदरुनी तौर पर बदलेगा और पार्टी सरकार से कदमताल मिलाते हुए चलने वाला एक मजबूत संगठन बनकर उसी तरह खड़ा होगी

Updated On: Feb 07, 2018 09:38 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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ग्रामीण भारत की ओर बढ़कर अपना वोटबैंक मजबूत कर रहे हैं पीएम मोदी

सामाजिक आधार तयशुदा हो जाय, ठहरा रहे तो फिर किसी लोकतंत्र में राजनीतिक दल का टिक पाना शायद ही मुमकिन हो. चाहे लोकसभा के चुनाव हों या फिर विधानसभा के- बीजेपी हर चुनावी चरण में अपने सामाजिक आधार में बदलाव के प्रयोग करती है और उसे अपने लिए एक मजबूत वोट-बैंक का रुप देती है. साल 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले पेश किए गए अंतिम पूर्ण बजट को इस नजरिए से भी देखा जाना चाहिए.

बजट में बड़ा बदलाव

मिसाल के लिए गौर करें कि केंद्रीय बजट में वित्तमंत्री का जोर बीजेपी के परंपरागत मतदाताओं से दूर ग्रामीण क्षेत्र, किसान और गरीबों पर है और उभरते हुए उस नव मध्यवर्ग पर भी जो मुखर कहे जाने वाले मध्यमवर्ग का हिस्सा है. हालांकि यह तबका आर्थिक रुप से कमजोर है लेकिन सियासी एतबार से इसकी ताकत ज्यादा है. बेशक इस शिकायत में सच्चाई है कि वेतनभोगी या कह लें टैक्स अदा करने वाले मध्यवर्ग की अनदेखी हुई है अथवा उस पर अनुचित जान पड़ते टैक्स आयद किए गए हैं. लेकिन जब बात जमीनी राजनीति की आती है तो ऐसी शिकायतें खास मायने नहीं रखतीं.

जमीनी राजनीति के एतबार से पार्टी ने अब ध्यान दूसरी तरफ लगाया है. किसानों को लागत पर डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की पहल की गई है साथ ही भंडारघर और बाजार के लिए आपूर्ति की श्रृंखला कायम करने का प्रस्ताव किया गया है. इससे आर्थिक गतिविधियों को एक नई ऊंचाई मिलेगी. अगर ये वादे आंशिक रुप से भी पूरे हुए तो भी ग्रामीण संकट की स्थिति संभल जाएगी और बड़े पैमाने पर आर्थिक संभावनाओं की राह खुलेगी.

स्वास्थ्य पर भी नजर

ठीक इसी तरह एक वादा 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपए की स्वास्थ्य बीमा योजना के दायरे में लाने का है और उम्मीद की जा सकती है कि इससे गरीबी को देखने के हमारे नजरिए में बदलाव आएगा. प्रस्तावित स्वास्थ्य योजना को अभी से कामचलाऊ करार दे दिया गया है लेकिन पूरे ग्रामीण भारत में इस योजना से स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़े पैमाने पर विस्तार होगा. सामाजिक रुप से संभ्रांत तबका अभी योग, आयुर्वेद और यूनानी पद्धति की चिकित्सा करने वालों को हेय दृष्टि से देखता है लेकिन सरकार इन्हें एलोपैथी के बराबर मानकर जगह देने की पहल कर रही है और इससे चिकित्सा की इन पद्धतियों में दक्ष लोगों के एक बड़े हिस्से को बढ़ावा मिलेगा.

A woman comes out from a mobile cancer detection unit after her mammography examination during a free medical check-up camp in a slum area in Chandigarh

हालांकि बजट का लक्ष्य वंचित तबके के कई हिस्सों को अपने दायरे में शामिल करने का है लेकिन असल सवाल है कि ऐसी पहल वोट दिलाने में किस तरह सहायक होगी ? दरअसल ऐसी कोशिश तो कांग्रेस ने भी की थी, कांग्रेस भोजन का अधिकार और शिक्षा का अधिकार जैसे कानून लेकर आई लेकिन अपनी इन पहलकदमियों को वह वोट में तब्दील करने में नाकाम रही. आज कोई नहीं पूछता कि भोजन का अधिकार या शिक्षा का अधिकार प्रासंगिक है या नहीं. लेकिन दरअसल बीजेपी और कांग्रेस में अंतर भी सोच के इसी मुकाम पर पैदा होता है. कांग्रेस के उलट बीजेपी ने अपने संगठन की मशीनरी को एक ऐसे औजार में तब्दील किया है जो सरकार की योजना के साथ मेल बैठाकर चलती है और इसी कारण बीजेपी को सियासी एतबार से फायदा भी अधिकतम होता है.

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कांग्रेस योजनाओं को वोट में बदलने में नाकामयाब रही

आजादी के बाद के दशक की कांग्रेस पर केंद्रित अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक पार्टी बिल्डिंग इन ए न्यू नेशन (1967) में अमेरिकी राजनीति विज्ञानी मायर्न वीनर ने ध्यान दिलाया है कि ‘जिस समाज के भीतर संगठन बनाने की क्षमता बढ़ी-चढ़ी होती है वह औद्योगिक संगठन, नौकरशाही, राजनीतिक पार्टी, विश्वविद्यालय जैसी चीजें बनाने में भी बहुत सक्षम होता है’. हालांकि कांग्रेस ने आजादी के बाद के सालों में संगठन बनाने की क्षमता तो खूब दिखाई लेकिन बीसवीं सदी के आखिर के सालों में संगठन के स्तर पर वह एकदम बिखर सी गई. कांग्रेस पार्टी अपनी ही सरकार के जन-कल्याणकारी कार्यक्रमों का फायदा उठाने में चुनावों में लगातार नाकाम रही जिससे जाहिर होता है भारत की सबसे पुरानी पार्टी संगठन के स्तर पर बहुत कमजोर हो गई है.

अब इस स्थिति की तुलना जरा बीजेपी से करें जिसने शुरुआत बड़ी आशंकाओं के बीच की थी. कहा जाता था कि यह हिन्दुओं और अगड़ी जातियों (ब्राह्मण-बनिया) की हिमायती पार्टी है और इसका प्रभाव विन्ध्य के पार या फिर बिहार और उत्तरप्रदेश तथा देश के पूर्वी को बांटने वाली कर्मनाशा नदी से आगे नहीं पहुंचता. यह बात सच है कि बीजेपी ने हिंदुत्व के सीमित सामाजिक आधार के बूते शुरुआत की थी और यह आधार अयोध्या-आंदोलन के जोर पकड़ने के दिनों में ज्यादा ठोस रुप में सामने आया लेकिन पार्टी जबतक अपने इस सामाजिक आधार से चिपकी रही, उसका प्रभाव धीरे-धीरे कम पड़ता गया. यही वजह है जो साल 2014 में सियासी मंच पर नरेन्द्र मोदी के आगमन से पहले बीजेपी का यूपी में सियासी वजन कम हो चला था.

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यह धारणा बहुत भ्रामक है कि नरेन्द्र मोदी को देश भर में सांप्रदायिक तेवर अपना चुके मध्यवर्ग का पुरजोर समर्थन मिला. ध्यान रहे कि मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने गैर-मुस्लिम समाज के विभिन्न तबकों में अपने प्रभाव का विस्तार किया और उसे अपने समर्थक सामाजिक आधार में बदला. इसमें कोई संदेह नहीं कि महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग का समर्थन पार्टी का प्रभामंडल कायम करने के लिहाज से बहुत अहम था लेकिन बीजेपी की नैया सिर्फ इसी के बूते आगे नहीं बढ़ी.

BJP Parliamentary Party meeting

विभिन्न तबकों को साथ ले आई है बीजेपी

इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में 'बीजेपी’ज राइज टू पावर' शीर्षक गुजरात केंद्रित अपने एक अध्ययन (1996) में राजनीतिक विज्ञानी घनश्याम शाह ने बड़े विस्तार से दिखाया है कि पार्टी शहरी मध्यवर्ग के साथ-साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे समाज के विभिन्न तबकों को कैसे अपने खेमे में लाने में कामयाब रही. बीतते वक्त के साथ बीजेपी ने कांग्रेस के परंपरागत सामाजिक आधार में सेंध लगाई है और अपने संगठन की मशीनरी के दम पर गोलबंदी करके इस सामाजिक आधार को अपने खेमे में समेट लिया है.

इसका सबसे ताजातरीन और सबसे कामयाब उदाहरण है पिछले साल का उत्तरप्रदेश का चुनाव. बीजेपी को हासिल विशाल बहुमत को देख राजनीति के विशेषज्ञ हैरत में पड़ गए. दरअसल बीजेपी ने छोटे-छोटे जाति समूहों और समुदायों को सत्ता में हिस्सेदारी देने का वादा किया और बड़े छोटे-छोटे दायरों में की गई कोशिशों के सहारे इन जातियों और समुदायों के बीच पहुंच बनाने में सफल रही.

वाजपेयी और मोदी का फर्क

अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए I और नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाले एनडीए II में स्पष्ट अन्तर है. अटलबिहारी वाजपेयी अपने को एक ‘स्टेटस्मैन’ के रुप में देखते थे, उनकी नजर व्यापक तस्वीर और बड़े मसलों पर रहा करती थी इसके उलट नरेंद्र मोदी संगठन के मामलों में एकदम जमीनी व्यक्ति जान पड़ते हैं. प्रधानमंत्री के रुप में अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए उन्होंने संगठन के मसलों को प्रशासन के मसलों से कम तरजीह नहीं दी. इसी कारण उन्होंने अमित शाह को पार्टी के अध्यक्ष के रुप में चुना. अमित शाह ने संगठन का एक मजबूत ताना-बाना खड़ा किया है जो सरकार के साथ मेल बनाते हुए काम कर रहा है. वाजपेयी के समय में सरकार और पार्टी अक्सर अलग एक-दूसरे को टक्कर देते मकसदों से काम करते जान पड़ते थे.

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बजट में सामाजिक कल्याण की योजनाओं का प्रस्ताव किया गया है और फिलहाल बीजेपी इन योजनाओं को लेकर अपने संगठन के स्तर पर पूरे दमखम के साथ अभियान चलाने को तैयार नजर आ रही है. चूंकि इन योजनाओं का वादा देश की तकरीबन 50 फीसद आबादी तक पहुंचने का है सो सरकार और पार्टी को 2019 के चुनावों में अग्रणी भूमिका हासिल होगी. बीजेपी के सामाजिक आधार में व्यापक बदलाव आना तय है. यह बदलाव बीजेपी को अंदरुनी तौर पर बदलेगा और पार्टी सरकार से कदमताल मिलाते हुए चलने वाला एक मजबूत संगठन बनकर उसी तरह खड़ा होगी जैसा कि आजादी के बाद के दशकों में कांग्रेस के साथ हुआ था. सामाजिक आधार का बदलाव और उन्हें नए रुप में गढ़ना बीजेपी की कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है.

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