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सावधान! तानाशाही मुहूर्त देखकर नहीं आती है

इतिहास बताता है कि लोकतंत्र में जिन लोगों ने भी असहमत लोगों को अपना दुश्मन माना, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी. बीजेपी के पास अब भी इन बातों पर गौर करने के लिए काफी वक्त है.

Updated On: Oct 22, 2017 04:45 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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सावधान! तानाशाही मुहूर्त देखकर नहीं आती है

बड़ी बीमारियां अपने शुरुआती लक्षण जरूर दिखाती हैं अगर इन लक्षणों को पहचानकर सही समय पर इलाज शुरू नहीं किया गया तो बीमारियां आगे चलकर लाइलाज बन जाती हैं. भारतीय लोकतंत्र के लिए यह समय कुछ ऐसा ही है. लक्षण इस बात के साफ-साफ संकेत दे रहे हैं कि आने वाले वक्त में तानाशाही प्रवृतियां इतनी मजबूत हो जाएंगी कि जनता के लिए मुंह तक खोलना दूभर होगा.

इस चिंता का आधार वह धारणा नहीं है, जो नरेंद्र मोदी के जरूरत से ज्यादा मजबूत नेता होने और विरोधी आवाजों के व्यवस्थित दमन को लेकर बनी हैं. केंद्र सरकार को थोड़ी देर के लिए भूल जाएं और राज्य सरकारों के कुछ फैसलों पर गौर करें तो पता चलेगा कि डिक्टेटरशिप इस देश में हर स्तर पर किस तरह सिर उठा रहा है।

राजस्थान में महारानी लाईं कानून का हंटर

राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार अपने अजीबोगरीब फैसलों के लिए लगातार सुर्खियों में रही है. ताजा मामला एक ऐसे कानून का है,जो लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता पैदा करता है. सरकार पहले ही एक ऐसा अध्यादेश कर चुकी है, जिसके तहत अब बिना सरकारी अनुमति के किसी भी लोकसेवक के खिलाफ ना तो पुलिस एफआईआर दर्ज करेगी और ना ही मीडिया उनसे जुड़े आरोपो पर खबरें बना पाएगा. अब विधानसभा से मंजूरी के लिए इसी कानून से जुड़ा बिल पेश किया जा रहा है.

भारतीय लोकतंत्र चेक एंड बैलेंस पर आधारित है. यानी लोकतंत्र के खंभे हमेशा एक-दूसरे को नियंत्रित करते हैं. सरकार निरंकुश न हो जाए यह देखना संसद और विधानसभाओं का काम हैं, जिन्हें हम विधायिका कहते हैं. कार्यपालिका और विधायिका संविधान के मुताबिक काम करें यह सुनिश्चित करना न्यायपालिका का काम है. सरकार की सारी इकाइयों के कामकाज की रिपोर्टिंग करना और खबरें जनता तक पहुंचाना मीडिया की जिम्मेदारी है, इसलिए उसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है.

Vasundhara Raje

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे

लेकिन वसुंधरा राजे सरकार के कानून पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि इसके जरिए सारी ताकत हड़पने की कोशिश की गई है. अगर सरकार की नीयत साफ होती तो अध्यादेश की जगह विधानसभा सत्र में सीधे विधेयक लाती, उसकी खूबियों और खामियों पर चर्चा करवाती और फिर उसे पास करवाकर कानून बनवाती. आखिर आनन-फानन में अध्यादेश जारी करवाने की जल्दी क्यों थी? खबर यह भी है कि राज्य के विधि विभाग ने इस कानून को लेकर बहुत सारे सवाल उठाए थे, लेकिन उनकी अनदेखी कर दी गई.

अध्यादेश में यह कहा गया है कि किसी सरकारी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए संबंद्ध प्राधिकरण से लिखित मंजूरी लेनी होगी और अनुमति देने या न देने का फैसला करने के लिए सरकार के पास छह महीने का वक्त होगा. इस दौरान आरोपित व्यक्ति का नाम उजागर नहीं किया जाएगा. यह बात अपने आप में बहुत ही विचित्र है. जिस पर आरोप है, उसी के मुखिया को भला कैसे जज बनाया सकता है?

अध्यादेश में यह भी कहा गया है कि जब तक सरकार अनुमति नहीं देती तो न्यायालय भी ऐसे किसी आरोप का संज्ञान नहीं लेगा और मीडिया उसकी खबरें प्रसारित नहीं करेगा. आरटीआई के जरिए भ्रष्टाचार की न जाने कितनी घटनाएं उजागर होती हैं. लेकिन अब ऐसी खबरें प्रसारित करना गैर-कानूनी होगा और गुनहगार को दो साल तक की सजा हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करवाने को एक मूलभूत नागरिक अधिकार करार दिया था. लेकिन राजस्थान सरकार का यह कानून सीधे-सीधे इस मूलभूत नागरिक अधिकार का हनन करता है. बहुत संभव है कि वसुंधरा राजे सरकार के इस कदम को अदालत में चुनौती मिले. लेकिन फिलहाल स्थिति यही है कि राजस्थान सरकार ने निरंकुशता की तरफ एक और कदम बढ़ा दिया है.

यूपी में नेता मालिक और कर्मचारी नौकर

बीजेपी शासित बाकी राज्यों का भी यही हाल है. यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार के ताजा फरमान में कहा गया है कि जब कोई जन-प्रतिनिधि किसी सरकारी दफ्तर में जाए तो अधिकारी और कर्मचारी उसके सम्मान में कुर्सी छोड़कर खड़े हो जाएं. सवाल यह है कि योगी सरकार को ऐसा फरमान सुनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

Yogi Adityanath

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

वजह बहुत साफ है. सरकार नौकरशाही पर अपनी धौंस जमाकर उसे पूरी तरह पालतू बनाना चाहती है. राज्य भर के अधिकारियों और कर्मचारियों को संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि वो सरकार के रहमो-करम पर हैं. लेकिन क्या लोकसेवक सचमुच सरकार के रहमो-करम पर हो सकते हैं? सरकारी कर्मचारियों को तनख्वाह जनता के पैसे से दिया जाता है, किसी पार्टी के फंड से नहीं. जाहिर है, सरकारी कर्मचारियों की असली जवाबदेही भी जनता प्रति होती है. भारतीय नौकरशाही का पूरा तंत्र शुरू से अराजनीतिक रहा है और यही उसकी ताकत भी है.

एक अराजनीतिक नौकरशाही ही नेताओं के अंसवैधानिक या गैर-कानूनी फरमाइशों के खिलाफ सीना तानकर खड़ी हो सकती है. हालांकि नौकरशाही का भी बहुत ज्यादा अवमूल्यन हुआ है. फिर उसका थोड़ा-बहुत जो मूल स्वभाव बचा है, उसे योगी सरकार पूरी तरह बदलना चाहती है.

सम्मान करना अच्छी बात है. अगर यूपी सरकार को लगता है कि राज्य के कर्मचारी नेताओं का ढंग से सम्मान नहीं कर रहे हैं तो इसके लिए एक एडवाइजरी जारी की जा सकती थी. लेकिन कुर्सी छोड़कर खड़े होने का आदेश पूरी तरह राजतंत्रीय है. यूपी में बीजेपी के जनप्रतिनिधि जो सम्मान सरकारी कर्मचारियों से पाना चाहते हैं, क्या वो वही सम्मान कर्मचारियों को भी देने को तैयार हैं? सोशल मीडिया पर ना जाने कितने ऐसे वीडियो क्लिप पड़े हैं, जिनमें बीजेपी का कोई नेता या मंत्री किसी सरकारी कर्मचारी को सरेआम बेइज्जत कर रहा है. कहीं आरएसएस से जुड़े होने का हवाला देकर तो कहीं ऊंची राजनीतिक पहुंच का दावा कर के कर्मचारियों को डराया-धमकाया जा रहा है.

विरोधियों के दमन से नहीं चल सकता लोकतंत्र

एक राजनीतिक दल के रूप में बीजेपी एक ऐसे स्वर्णिम दौर में है, जिसका बार-बार लौटकर आना संभव नहीं है. 1980 के दौर के कांग्रेस की तरह इस समय केंद्र और अधिकतर राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं. लेकिन इस अभूतपूर्व जनसमर्थन का इस्तेमाल जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने से कहीं ज्यादा विरोधियों को रौंदने के लिए किया जा रहा है.

Amit Shah and Narendra Modi in Ahmedabad

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह

सरकार चाहे हरियाणा की हो, झारखंड की या फिर मध्य-प्रदेश और छत्तीसगढ़ की. बीजेपी शासित राज्यों में एक बात कॉमन है और वो है, विरोधियों का दमन. पिछले कुछ महीनों में मध्य-प्रदेश और झारखंड में आंदोलनकारी किसानों पर फायरिंग की बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं. हरियाणा का मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मनोहर लाल खट्टर लगातार अपने काम करने के ढंग को लेकर सवालों के घेरे में रहे हैं. सवाल यह है कि क्या विरोधियों का दमन से लोकतंत्र चल सकता है?

'कांग्रेस मुक्त भारत' के घोषित सपने में सीधे-सीधे तानाशाही की आहट सुनाई देती है. पक्ष और विपक्ष लोकतंत्र के दो पहिए हैं. किसी एक से लोकतंत्र की गाड़ी नहीं बढ़ सकती है. लेकिन बीजेपी का रवैया इस मामले में हैरान करने वाला है. शीर्ष नेतृत्व से लेकर पार्टी के आम समर्थकों तक किसी को भी ऐसी बात सुनना गवारा नहीं, जो उसे पसंद ना हो. इस बात को तमिल फिल्म मेर्सल पर उठ रहे विवाद से भी समझ सकते हैं.

फिल्म सेंसर बोर्ड से मंजूर लेकिन बीजेपी से खारिज

बीजेपी तमिल फिल्म मेर्सल का बड़े पैमाने पर विरोध कर रही है और इसके कुछ दृश्य बदले जाने की मांग कर रही है. इस कैंपेन में केंद्रीय मंत्री पोन विजयन भी शामिल हैं. जाने-माने तमिल एक्टर विजय की इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने बकायदा क्लीयर किया है. फिर आखिर बीजेपी को इसे लेकर क्या एतराज है?

दरअसल फिल्म में कुछ जगहों पर जीएसटी को लेकर टिप्पणी की गई है. फिल्म में एक जगह यह कहा गया है कि सिंगापुर में जीएसटी 7 फीसदी है और वहां स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त हैं. फिर 28 फीसदी जीएसटी वाले भारत में मेडिकल सर्विस फ्री क्यों नहीं हो सकती है? बेशक इस सवाल को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है. लेकिन क्या किसी लेखक या फिल्ममेकर को भारत में अब ऐसे सवाल पूछने का अधिकार भी नहीं है? बीजेपी को इस सीन पर सख्त एतराज है. पार्टी इसे नरेंद्र मोदी के खिलाफ पूर्वाग्रह मानती है, लिहाजा इसे बदलवाने के लिए कैंपेन चला रही है.

Tamil Film Mersel

तमिल फिल्म मेर्सल का पोस्टर

इतिहास हमें बताता है कि लोकतंत्र में जिन लोगों ने भी असहमत लोगों को अपना दुश्मन माना, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी. इंदिरा गांधी ने इसकी भरपूर कीमत चुकाई. राजीव गांधी के साथ भी यही हुआ. विरोधियों की आवाज दबाने की कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि 400 से ज्यादा सीट वाली उनकी सरकार अगला लोकसभा चुनाव हार गई.

अहंकार और विरोधियों के दमन के नतीजे यही नहीं रुके. यूपीए 2 सरकार ने जिस तरह रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक के विरोध को ताकत से दबाने की कोशिश की, उसका नतीजा 2014 में सामने आया. बीजेपी के पास अब भी इन बातों पर गौर करने के लिए काफी वक्त है.

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