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रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार की लड़ाई में देश की भावी राजनीति की तस्वीर छिपी है

दलितों के सवाल आने वाले दिनों में राष्ट्रीय विमर्श से गायब नहीं होंगे बल्कि उसकी केंद्र में होंगे

Rakesh Kayasth Updated On: Jun 26, 2017 10:16 AM IST

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रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार की लड़ाई में देश की भावी राजनीति की तस्वीर छिपी है

राष्ट्रीय मीडिया इस समय राष्ट्रपति चुनाव की खबरों से भरा पड़ा है. इन खबरों से अलग कुछ खबरें दिल्ली के जंतर-मंतर और यूपी के सहारनपुर से भी आ रही हैं. एक नये किस्म का गैर-राजनीतिक दलित मूवमेंट उबाल पर है.

सहारनपुर से दलितों के बौद्ध धर्म अपनाने की खबरें रोज आ रही हैं. देश की तमाम बड़ी राजनीतिक पार्टियां इन खबरों के मायने समझ रही हैं. राष्ट्रपति पद के लिए दो दलित उम्मीदवारों का मुकाबला ऐसी ही खबरों का नतीजा है.

दलित राजनीति में हलचल के मायने बड़े हैं

सवाल ये है कि अगर ऊना और सहारनपुर जैसे कांड नहीं होते तो क्या रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति चुनाव के लिए बीजेपी के उम्मीदवार होते? अगर रामनाथ कोविंद बीजेपी के उम्मीदवार नहीं होते तो क्या मीरा कुमार विपक्ष की उम्मीदवार होतीं? शायद नहीं. इसका मतलब ये है कि दलित राजनीति में आई हलचल सचमुच इतनी बड़ी है कि राष्ट्रीय राजनीति की धारा मोड़ दे.

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रामनाथ कोविंद ने एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरा (फोटो: पीटीआई)

सहारनपुर का दलित आंदोलन भीम आर्मी नाम वाले एक गैर-राजनीतिक संगठन के नेतृत्व में खड़ा हुआ है. इस संगठन के नेता चंद्रशेखर रावण अपने कई सहयोगियों के साथ फिलहाल जेल में हैं. यूपी सरकार चंद्रशेखर और उनके सहयोगियों को असामाजिक तत्व बता रही है. दूसरी तरफ मायावती भीम आर्मी को आरएसएस का संगठन करार दे चुकी हैं. इसके बावजूद भीम आर्मी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.

इससे पहले गुजरात के ऊना में भी एक ऐसा आंदोलन महीनों तक चला था. जिग्नेश मेवाणी के नेतृत्व में दलितों ने मरे हुए जानवरों के खाल उतारने से इनकार कर दिया था. और सरकार से जमीन दिए जाने की मांग बुलंद की थी. यह आंदोलन भी एक तरह से गैर-राजनीतिक था, लेकिन इसे मिलने वाले समर्थन को देखकर लगा कि दलित समुदायों में अंदर ही अंदर एक गहरा असंतोष है.

बीजेपी समझ रही है दलितों की नाराजगी के मायने

चंद्रशेखर हों या जिग्नेश मेवाणी, दोनों नेताओं के आंदोलन में एक बात समान है. दोनों का झगड़ा आरएसएस की बुनियादी विचारधारा से है. कांशीराम ने मनुवाद के खिलाफ लड़ाई का जो नारा दिया था, वह मायावती के सोशल इंजीनियरिंग में गुम हो गया था. चंद्रशेखर और मेवाणी ने फिर से यही मुद्धा उठा लिया है. बीजेपी की चिंता की सबसे बड़ी वजह यही है.

एक वक्त था जब बीजेपी को ब्राह्मण, बनिया पार्टी कहा जा था लेकिन बीजेपी ने धीरे-धीरे इस छवि को बदला है. आज पिछड़ों का सबसे बड़ा तबका बीजेपी के साथ है. आरएसएस से जुड़े संगठनों के जरिए बीजेपी ने दलितों खासकर अनुसूचित जन-जातियों के बीच भी लगातार काम किया. इसका असर 2014 के चुनाव में देखने को मिला.

आम तौर पर बीजेपी को 10-12 फीसदी दलित वोट मिलते थे. लेकिन 2014 के चुनाव में ये वोट दोगुने से भी ज्यादा हो गये और बीजेपी 84 में से 40 रिजर्व सीटें जीतने में कामयाब रही. बीजेपी के लिए दलित जनाधार खिसकने का सीधा मतलब है 2019 के मंसूबों पर असर पड़ना.

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रामनाथ कोविंद को एनडीए उम्मीदवार बनाने के पीछे नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सोची-समझी रणनीति है

दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियों के लिए दलितों की नाराजगी उम्मीद की एक किरण बनकर आई है. पिछले तीन साल में विपक्ष बेहद कमजोर और बिखरा रहा है. विपक्ष केंद्र सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभावी कैंपेन शुरू नहीं कर पाया है. ऐसे में विपक्ष को लगता है कि अगर दलित राजनीति गर्म होगी और किसानों के आंदोलन तेज होंगे तो देश में एक ऐसा सरकार विरोधी माहौल बन सकता है, जो 2019 की लड़ाई में मददगार साबित हो.

विचारधारा, प्रतिनिधित्व और प्रतीकवाद

देश में चल रहा मौजूदा दलित आंदोलन मूल रूप से एक वैचारिक लड़ाई है. आंदोलनकारी कह रहे हैं कि आरएसएस की ब्राह्मणवादी सोच दलितों के उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार है और ब्राह्मणवादी व्यवस्था को कमजोर किये बिना दलितों का भला नहीं होने वाला है. इस दावे मजबूत करने के लिए सामूहिक धर्मांतरण भी किये जा रहे हैं.

बीजेपी के लिए यह एक दुविधा वाली स्थिति है. वह दलितों के साथ किसी भी तरह का वैचारिक टकराव मोल नहीं लेना चाहती क्योंकि अगर बहुजनवाद बनाम ब्राह्मणवाद का सवाल राष्ट्रीय विमर्श बन गया तो इसके दीर्घकालिक नतीजे पार्टी और आरएसएस के लिए अच्छे नहीं होंगे.

विचारधारा के सवाल को बीजेपी प्रतिनिधित्व के जरिए हल करना चाहती है. ओबीसी के साथ यह काम उसने बखूबी किया है. एक दलित को राष्ट्रपति बनाकर यही काम अब बीजेपी दलितों के साथ करना चाहती है. रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने का सीधा मतलब दलितों तक यह संदेश पहुंचाना है कि सरकार उन्हे सत्ता में बराबरी का भागीदार बनाना चाहती है.

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हाल के दिनों में दलितों पर अत्याचार बढ़ने के बाद कई जगहों पर उनके धर्मांतरण करने की खबरें आई हैं

दलितों के साथ बीजेपी और आरएसएस का कोई वैचारिक विरोध नहीं है, तभी उन्होंने एक दलित को देश के सर्वोच्च पद पर बिठाया है. कोविंद का नाता कोली या कोरी समाज से है. भारत में दलितों की राजनीतिक ताकत जाटवों के इर्द-गिर्द घूमती है. ऐसे में एक गैर-जाटव दलित को राष्ट्रपति बनाकर बीजेपी दलितों की एकता में भी सेंध लगा सकती है. हाल के यूपी के विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी यह काम बखूबी कर चुकी है.

प्रतीकवाद की राजनीति में बीजेपी देश की तमाम पार्टियों से मीलों आगे रही है. राष्ट्रपति चुनाव के लिए पूर्वोत्तर के ईसाई जी जी स्वेल को बीजेपी ने ही खड़ा किया था. एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने का श्रेय भी बीजेपी के ही खाते में है. अंबेडकर को भी बीजेपी ने लपक लिया और कांग्रेस हाथ मलती रह गई. इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी का दांव कामयाब होता दिख रहा है

क्या दलित एजेंडा 2019 चुनाव के केंद्र में होगा?

सवाल यह है कि क्या किसी एक दलित के राष्ट्रपति बन जाने से दलितों का असंतोष थम जाएगा? यह सच है कि 2014 के बाद से देश भर में दलितों के खिलाफ हिंसा बढ़ी है. बीजेपी शासित राज्यों में गोरक्षकों के निशाने पर दलित रहे हैं.

हरियाणा, गुजरात, राजस्थान और यूपी से उत्पीड़न की खबरें लगातार आ रही हैं. अगर दलील यह हो सकती है कि देश में दलितों की स्थिति अच्छी है, क्योंकि एक दलित भारत का राष्ट्रपति है. तो फिर दलील यह भी हो सकती है कि दलित सिर्फ कठपुतली हैं, वास्तविक ताकत अभी उनके हाथ में आनी बाकी है.

यानी इसमें कोई शक नहीं है कि दलितों के सवाल आने वाले दिनों में राष्ट्रीय विमर्श से गायब नहीं होंगे बल्कि उसकी केंद्र में होंगे. अब सवाल ये है कि विपक्ष को इसका कितना फायदा मिल पाएगा. दलित आंदोलनों ने जो जमीन तैयार की है, वह किसके काम आएगी?

मायावती के समर्थक

दलित नेता और बीएसपी की अध्यक्ष मायावती की दलितों पर से पकड़ लगातार ढीली पड़ी है (फोटो: पीटीआई)

मायावती इस हालत को भुनाने की स्थिति में नजर नहीं आ रही हैं. यही हाल कांग्रेस का भी है, जिसके दलित जनाधार में 2014 के लोकसभा चुनाव में लगभग 50 फीसदी की गिरावट आई थी. क्या इस देश में कोई दूसरी बीएसपी पैदा होगी या फिर दलित आंदोलन अपनी मौत मर जाएंगे? सवाल कई हैं और पक्का जवाब किसी के पास नहीं.

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