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एक कानून जिसने बदल दिया बिहार का सियासी समीकरण!

2013 के बाद गंगा में काफी पानी बह चुका है और नरेंद्र मोदी का विरोध अब मायने नहीं रखता

Alok Kumar Updated On: Jul 01, 2017 03:18 PM IST

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एक कानून जिसने बदल दिया बिहार का सियासी समीकरण!

दोस्ती यूं ही नहीं टूटती. खासकर तब जब दोस्त दुश्वारी में हो. पर लालू-नीतीश के बीच कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है.

राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को नीतीश के समर्थन के बाद से ही महागठबंधन की उम्र पर चर्चा शुरू हो गई. लालू और नीतीश आमने-सामने आ गए. तो क्या सिर्फ राष्ट्रपति चुनाव ने दोस्ती की डोर कमजोर कर दी? ऐसा नहीं है. तह की परतें खोलें तो एक कानून दोनों की दोस्ती पर हावी होता दिख रहा है.

नोटबंदी में नीतीश ने उठाया था बेनामी संपत्ति का मुद्दा 

आठ नवंबर 2016. शाम आठ बजे मोदी ने नोटबंदी का एलान कर दिया. चौतरफा विरोध के बीच नीतीश कुमार ने इस फैसले की तारीफ कर दी. इसके बाद मधुबनी दौरे पर नीतीश ने नोटबंदी से एक कदम आगे बढ़ने की अपील जारी की. उन्होंने बेनामी संपत्ति पर शिकंजा कसने को कहा. वैसे सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, जीएसटी जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर नीतीश हमेशा पीएम मोदी के साथ रहे.

एक नवंबर को ही मोदी सरकार ने बेनामी संपत्ति संशोधन कानून, 2016 को लागू कर दिया था. लेकिन 22 मार्च को अरूण जेटली जो वित्त विधेयक पेश किया उसमें इस कानून को और तल्ख कर दिया. इनकम टैक्स विभाग को छापा मारने और बेनामी संपत्ति जब्त करने की ताकत मिल गई. विपक्ष ने इसकी आलोचना की पर नीतीश चुप रहे. उनकी मौन सहमति यहां भी मोदी के साथ थी.

लालू परिवार पर कसता शिकंजा

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इधर अप्रैल महीने से ही बिहार बीजेपी ने लालू परिवार की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी. ताबड़तोड़ बेनामी संपत्तियों की लिस्ट जारी होने लगी. सुशील मोदी ने लालू परिवार पर हजारों करोड़ की संपत्ति हथियाने के आरोप लगाए.

इधर आईटी सक्रिय हो गई. बेनामी संपत्ति कानून के तहत लालू की बेटी मेसी भारती और उनके पति शैलेश पर सबसे पहले कार्रवाई हुई. दिल्ली का फार्म हाउस सील किया गया. इसके बाद लालू के दोनों बेटों के नाम भी सामने आ गए. आईटी ने दिल्ली में ही एक फ्लैट सीज किया जो था तो किसी और के नाम पर लेकिन असली मालिक डिप्टी चीफ मिनिस्टर तेजस्वी यादव बताए गए हैं.

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उधर लालू के बड़े बेटे और नीतीश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप पर गलत तरीके से पेट्रोल पंप का लाइसेंस लेने का आरोप है. हालांकि भारत पेट्रोलियम ने लाइसेंस रद्द कर दिया है. मामला कोर्ट में है. पर जिस जमीन पर पेट्रोल पंप बनना था वो तेज प्रताप की बेनामी संपत्ति बताई जा रही है.

अब तक मिशेल पैकर्स, एक इनफोसिस्टम, फेयरग्रो समते पांच छद्म यानी शेल कंपनियों के खुलासे हुए हैं जिनका मालिकाना हक लालू के बेटे-बेटियों को सौंप दिया गया था.

लालू की बेटी मीसा और दामाद शैलेश दो बार आईटी के सामने पेश हो चुके हैं. लेकिन अब तलवार तेजस्वी और तेज प्रताप पर लटक रही है. कानून के जानकारो की मानें तो दोनों इस सख्त कानून के घेरे में कभी भी आ सकते हैं.

बीजेपी के साथ ज्यादा सहज हैं नीतीश 

उधर नीतीश ने लालू कुनबे को उनके हाल पर छोड़ दिया है. पर सवाल तो सरकार पर भी उठ रहे हैं. ऐसे में अगर लालू के बेटों पर इनकम टैक्स की आंच पड़ी तो नीतीश शर्तिया कोई मजबूरी नहीं दिखाएंगे. दोनों को सरकार से बाहर जाना होगा.

ये महज संयोग नहीं हो सकता कि नीतीश जिस कानून की मांग करें वो केंद्र बना भी दे और उसी की जद में आने वालों पर वो सहजता से बैठे रहें.

नीतीश कभी नहीं भूलेंगे कि लालू के कथित जंगलराज का विरोध कर ही वो सत्ता के शिखर पर पहुंचे थे. उन्हें ये भी पता है कि 2013 के बाद गंगा में काफी पानी बह चुका है और नरेंद्र मोदी का विरोध अब मायने नहीं रखता. ये नीतीश के सिपहसालार केसी त्यागी के बयान से भी पता चलता है कि बीजेपी के साथ सरकार में जेडीयू ज्यादा सहज थी.

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