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मीरा कुमार को ‘दलित’ बनाम ‘दलित’ की लड़ाई से ऐतराज क्यों है ?

मीरा कुमार ने कहा कि जाति को गठरी में बांधकर जमीन में गाड़ देना चाहिए

Updated On: Jun 27, 2017 06:01 PM IST

Amitesh Amitesh
विशेष संवाददाता, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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मीरा कुमार को ‘दलित’ बनाम ‘दलित’ की लड़ाई से ऐतराज क्यों है ?

विपक्षी दलों की तरफ से पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार को एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के सामने लाया गया तो चर्चा दलित बनाम दलित की लड़ाई की होने लगी.  माना गया कि रामनाथ कोविंद की काट के तौर पर ही विपक्ष ने मीरा कुमार को खड़ा किया है.

लेकिन, दलित बनाम दलित की लड़ाई से खुद मीरा कुमार को अब ऐतराज हो रहा है. मीरा कुमार ने दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि ‘खुशी की बात है कि ये बात उठ रही है कि दो दलित आमने-सामने हैं. लेकिन, इसके पहले तथाकथित उच्च जाति के प्रत्याशी जब सामने हुआ करते थे तो कभी उनकी जाति की चर्चा नहीं हुई. लेकिन, जब दलित खड़े होते हैं तो चर्चा शुरू हो जाती है.’

मीरा कुमार ने कहा ‘2017 में समाज की सोच का आकलन सामने आ रहा है. जाति को गठरी में बांधकर जमीन में गाड़ देना चाहिए.’

मीरा कुमार ने दलित शब्द और उसको लेकर हो रही राजनीति पर कड़ा प्रहार किया. दलित के नाम पर सवाल खड़ा करने वालों को मीरा कुमार ने अपने तरीके से सामने लाने की कोशिश की है.

लेकिन, सवाल है कि मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर खड़ा करने का फैसला आखिर क्यों किया गया.

दरअसल बीजेपी ने पहले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर चुन लिया. यूपी के दलित समुदाय से आने वाले कोविंद बिहार के गवर्नर थे. लिहाजा यूपी और बिहार दोनों को एक साथ साधने की कोशिश की गई.

2019 चुनाव के दलित कार्ड के रूप में देखे जा रहे कोविंद

PTI

इसे अगले लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के दलित कार्ड के तौर पर ही देखा गया. और ऐसा होना भी लाजिमी था क्योंकि खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने नाम का ऐलान करते वक्त रामनाथ कोविंद को दलित समुदाय का बताया था.

लेकिन, इसके बाद अलग-अलग सियासी दलों की प्रतिक्रिया और विपक्ष का तेवर देखने वाला था. बीजेपी का पुरजोर विरोध करने वाली मायावती दुविधा में पड़ गई. मायावती को अपने दलित वोट बैंक का डर सताने लगा.

यहां तक कि उनकी तरफ से संकेत भी दिया गया कि वो दलित रामनाथ कोविंद के खिलाफ नहीं जा सकती हैं. लेकिन, मायावती की तरफ से संकेत साफ था कि अगर विपक्ष की तरफ से किसी दलित को सामने लाया जाए तो फिर कोविंद के बजाए उनके साथ हो सकती हैं.

इस संकेत के बाद ही विपक्ष की तरफ से कवायद शुरू हो गई थी कि कैसे विपक्षी कुनबे को एक साथ किया जाए. निश्चित तौर पर मीरा कुमार के नाम का चयन करते वक्त मायावती की बात पर भी गौर की गई होगी. मतलब मायावती को साथ लाने के लिए विपक्ष ने दलित समुदाय से आने वाली मीरा कुमार को तरजीह दी.

रामनाथ कोविंद के नाम को लेकर जेडीयू का रुख भी काफी सकारात्मक रहा. पहले से ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रामनाथ कोविंद को समर्थन का ऐलान कर दिया जिसके बाद लालू –सोनिया समेत सभी विपक्षी दलों के नेताओं की तरफ से नीतीश को घेरने की रणनीति बनी. इस उम्मीद में कि नीतीश या तो अपना फैसला बदल देंगे या फिर उन्हें इस पूरे मामले में समर्थन को लेकर घेरा  जा सकेगा.

मीरा कुमार बिहार से हैं और दलित समुदाय से आती हैं. इस बात को लालू यादव से लेकर कांग्रेस के बाकी नेताओं की तरफ से खूब प्रचारित किया जा रहा है. नीतीश को बिहार की बेटी और दलित की बेटी के नाम पर घेरा जा रहा है. उनके पिता बाबू जगजीवन राम की दलित पृष्ठभूमि का हवाला देकर मीरा कुमार की छवि एक दलित की बेटी के तौर पर पेश करने की कोशिश हो रही है.

यहां भी साफ लग रहा है कि मीरा कुमार का दलित होना ही विपक्ष की तरफ से उनकी उम्मीदवारी की सबसे बड़ी योग्यता है. लेकिन, जब दलित बनाम दलित की लड़ाई कही जा रही है तो मीरा कुमार को ये बात नागवार गुजर रही है.

नीतीश को लेकर मीरा खामोश !

Nitish Kumar

बिहार की बेटी मीरा कुमार फिलहाल नीतीश कुमार पर कुछ भी बोलने से कतरा रही हैं. उन्होंने इतना जरूर कहा कि हम आगे इस बारे में बात करेंगे. लेकिन, फिलहाल वो नीतीश कुमार का नाम लेने से भी बचती नजर आईं.

जब उनसे पूछा गया कि क्या वो नीतीश कुमार से बात करेंगी तो उनका कहना था कि हमने दो दिन पहले ही सभी मतदाता मंडल के सदस्यों को चिट्ठी लिखकर उनसे समर्थन की अपील की है और आप जिनका नाम ले रहे हैं उनको भी पत्र लिखा है. अब गेंद उनके पाले में है.

अपने बयान से मीरा कुमार नीतीश को भी कठघरे में खड़ा करना चाहती हैं. लेकिन, अपने चुनाव अभियान की शुरुआत वो बिहार से नहीं बल्कि साबरमती आश्रम से करने वाली हैं. बापू के आश्रम पहुंचकर मीरा कुमार उनसे प्रेरणा लेकर देश के सर्वोच्च पद के लिए अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाएंगी.

लेकिन, उनके ना चाहते हुए भी राष्ट्रपति चुनाव की लड़ाई दलित बनाम दलित की चर्चा से अछूती नजर नहीं आ रही है. और ऐसा हो भी नहीं सकता क्योंकि उम्मीदवारों के चयन में ही जब दलित होने को ही आधार माना गया तो फिर अब चर्चा को भला कैसे रोका जा सकता है.

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