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यूपी चुनाव 2017: मुसीबत में पहले भी भतीजे को याद आ चुकी हैं बुआ

क्या पेटीएम से भतीजे को विधायक देंगी बुआ मायावती?

Rakesh Kayasth Updated On: Mar 10, 2017 08:27 PM IST

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यूपी चुनाव 2017: मुसीबत में पहले भी भतीजे को याद आ चुकी हैं बुआ

एक साइकिल पर सवार टीपू और पप्पू तय पते पर पहुंचे. ये घर टीपू की बुआ का था. पप्पू साइकिल की रखवाली के लिए रुक गया और टीपू अंदर की ओर बढ़ा.

अचानक उसके फोन की घंटी बजी. उधर से गुस्सैल बाप की आवाज आई- खबरदार बुआ कुछ दें तो ले मत लेना. टीपू चुपचाप अंदर चला गया. बुआ का मूड बहुत सीरियस था.

उन्होंने कहा- तेरे बाप ने मेरे साथ जो बुरा सलूक किया, वो मैं जीते-जी नहीं भूल सकती. टीपू चुपचाप सुनता रहा. फिर मुंह लटकाकर सीढि़या उतरने लगा. अचानक उसके मोबाइल पर मैसेज आया और खुशी से चिल्लाया- थैंक्यू बुआ.

बुआ के पास साठ, सत्तर, सौ, सवा सौ जितने भी विधायक थे, उन्होने सब भतीजे को पेटीएम कर दिए. टीपू ने मन ही मन कहा- थैंक्यू मोदी जी, ये है ई गर्वेंस का कमाल. अब पेटीएम से भी समर्थन भी दिए जा सकते हैं.

Agra: Congress leader Rahul Gandhi and Samajwadi Party President Akhilesh Yadav during a road show in Agra on Friday. PTI Photo (PTI2_3_2017_000244B)

ये एक काल्पनिक स्थिति है, जिसे वास्तविक मानने में समाजवादी और कांग्रेसियों को कोई एतराज नहीं बल्कि खुशी ही होगी. अब एक नजर एक वास्तविक स्थिति पर जिसका अनुभव न्यूज चैनलों में काम करने वाले ज्यादातर लोगों को 11 मार्च को हो सकता है.

बुआ भतीजे वाला गाना निकालो

काउंटिंग के नतीजे आने शुरु हुए. संपादक जी चिल्लाए- अरे जल्दी से बॉलीवुड का कोई बुआ भतीजे वाला गाना ढूंढकर निकालो. गाने पर मायावती और अखिलेश के विजुअल लगाकर झमाझम एडिट करवाओ.

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प्रोड्यूसर, असिस्टेंट प्रोड्यूसर और रिसर्चर सभी काम में जुट गए. घंटा भर हो गया. संपादक जी के सब्र का बांध टूट गया-  अरे क्या हुआ, सब के सब भांग खाकर बैठे हो क्या? ढूंढो जल्दी वर्ना नौकरी से निकाल दूंगा.

बड़ी हिम्मत जुटाकर एक सीनियर प्रोड्यूसर ने कहा-  सॉरी बुआ भतीजे पर बॉलीवुड में एक भी गाना नहीं है.

बुआ नेगेटिव कैरेक्टर क्यों?

बात थोड़ी अजीब है. बुआएं बेशक बहुत प्यार करने वाली हों. लेकिन माइथोलॉजी से लेकर इतिहास तक बुआ हर जगह नेगेटिव कैरेक्टर रही है. शुरुआत होलिका से होती है, जिसने अपने भाई हिरण्यकश्यप के कहने पर भतीजे प्रह्ललाद को जलाने की कोशिश की और खुद जल मरी.

अपने बच्चो के नाम प्रह्ललाद रखने वाली महिलाओं के बारे में मुझे यही लगता था कि उनकी असली खुंदक ननद से है. आधुनिक स्त्रीवादी विमर्श के दौर में प्रह्रलाद और होलिका की कहानी को भी नए संदर्भों में देखा जा रहा है. ये लंबी बहस है, जिसपर अभी बात करने का कोई फायदा नहीं है.

राजनीति की बुआएं

सच यही है कि इतिहास और राजनीति में  बुआ कभी पॉजिटिव कैरेक्टर नहीं रही. दिल्ली सल्तनत से लेकर मुगलकाल तक कई ऐसी बुआओं का जिक्र आता है, जो महलों में रची जानेवाली साजिशों का अहम किरदार हुआ करती थीं. अंत:पुर की साजिशों में भूमिका निभाने वाले किन्नर भी बुआ के नाम से बुलाये जाते थे.

आधुनिक राजनीति में बुआ के साथ भतीजे-भतीजियों के रिश्तों पर नजर डालें तो पहला बड़ा उदाहरण इंदिरा-गांधी और विजयलक्ष्मी पंडित का है. बुआ विजयलक्ष्मी ने इंदु को कभी पसंद नहीं किया और अपनी पीएम भतीजी की कई बार खुलकर मुखालफत की.

Vijaya Laxmi Pandit

विजयलक्ष्मी पंडित

राजनीतिक परिवारों में ऐसे एक नहीं अनगिनत उदाहरण हैं. एक दौर में देश के शीर्षस्थ दलित नेता रहे बाबू जगजीवन राम की मृत्यु के बाद विरासत की जंग में टक्कर बुआ मीरा कुमार और भतीजी मेधावी कीर्ति के बीच हुई. दोनो ने एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव भी लड़े. आखिरकार बाजी बुआ के हाथ लगी.

सिंधिया परिवार में बुआ वसुंधरा राजे और भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीतिक वफादारियां अलग-अलग हैं. टकराव के हालात कई बार बने. लेकिन ज्योतिरादित्य ने हमेशा अपनी बुआ के खिलाफ कुछ भी बोलने से परहेज किया.

J Jayalalithaa passes away

तमिल राजनीति की दिग्गज जे. जयललिता की भतीजी दीपा ने उनकी विरासत पर अपना दावा पेश किया. लेकिन मुंहबोली बुआ शशिकला नटराजन ने दीपा के मंसूबों पर पानी फेर दिया.

बुआएं सिर्फ नेगेटिव कैरेक्टर हों ये कोई जरूरी नहीं है. बुआएं विद्रोही भी होती हैं. मध्य-प्रदेश की उप-मुख्यमंत्री रही आदिवासी नेता जमुना देवी अपनी सरकार के मुख्यमंत्री के खिलाफ बोलने के लिए मशहूर थीं.

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जिस दौर में जमुना देवी उप-मुख्यमंत्री थी, उसी दौर में दिल्ली का बदनाम तंदूर कांड हुआ था. जमुना देवी ने फौरन बयान दाग दिया- मैं भी दिग्विजय सिंह के तंदूर में लगातार जल रही हूं. बुआजी जब-जब भड़कतीं, सियासी दांव में माहिर दिग्गी राजा उन्हे मना लेते.

पुरुषवादी समाज में बुआएं

सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि ये पूरे भारतीय समाज का चरित्र रहा कि बेटियों की योग्यता के बावजूद उत्तराधिकार हमेशा बेटे को ही सौंपा जाता है. यही पितृसत्तामक व्यवस्था बुआ को एक ऐसे कैरेक्टर में बदलती है, जिसमें नेगेटिव शेड ज्यादा है.

rahul-priyanka

फर्ज कीजिए अगर राहुल गांधी शादी-शुदा होते, उनके बच्चे होते, तो प्रियंका गांधी बाकी राजनीतिक बुआओं से अलग बुआ होती? सत्ता चाहे विरासत में मिले या फिर संघर्ष से औरतों के लिए अपना हक हासिल करना आसान नहीं होता. हजरत अमीर खुसरो ने आज से साढ़े सात सौ साल पहले यूं ही नहीं लिखा:

भईया को दियो बाबुल महलन दो महलन

हमको दियो परदेश, काहे को ब्याहो बिदेस

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