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आजम खान को सुना? अब एक आम रामपुरिये की भी सुनिए...

सत्ता की ताकत साथ में होने का मतलब उसके दुरूपयोग का हक मिलना नहीं होता

Updated On: Mar 18, 2017 12:23 PM IST

Pradeep Awasthi

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आजम खान को सुना? अब एक आम रामपुरिये की भी सुनिए...

बात रामपुर की है, जहां का मैं कहता हूं कि मैं रहने वाला हूं. रामपुर की बात होगी तो आजम खान की भी होगी और आजम खान की बात होगी तो एक नए वीडियो की भी बात होगी. जिसमें वे अपनी ही नाकामियों का गुस्सा दूसरों पर उतारते नजर आ रहे हैं.

चुनाव में समाजवादी पार्टी हार गई. आजम खान 9वीं बार रामपुर से विधायक बने और वे अपनी जीत का सर्टिफिकेट लेने गए. वहां कीचड़ भरे रास्ते से उनका सामना हुआ और उन्हें पैदल चल कर जाना पड़ा. इसके बाद जो उन्होंने एसडीएम अभय कुमार गुप्ता से कहा, वो इस वीडियो में कैद है.

ये वीडियो इस मायने में बहुत शिक्षाप्रद है कि इसको देखकर सिर्फ दो मिनट में पूरे सरकारी तंत्र की पोल पट्टी खुल सकती है.

आगे आजम खान के शब्द -:

'ये भी मोदी जी ने कहा था कि ऐसे लाना है? चलेंगे आप उस रास्ते पर?' हम ये सर्टिफिकेट बाद में ले लेंगे. चलिए पहले उस रास्ते पर चलकर देखिए. हालांकि ये बात हमारे लिए बहुत शर्म की है कि मंडी में इतनी गन्दगी है. बुरी बात है ये. अच्छी बात नहीं है ये. इतना-इतना कीचड़.

और अभी सरकार है. अभी मैं मिनिस्टर हूं और आचार संहिता हटने के बाद भी रहूंगा. जब तक नयी सरकार नहीं बनेगी और उस वक्त दो तीन दिन में आप पर एक्शन लेने का भी हक होगा मुझको.

हमने यही सलूक किया था आपके साथ?. इसीलिए लाए थे हम आपको ट्रान्सफर कराकर. आप तो कूड़े में पड़े हुए थे. रोए थे आप. ऐसे कूड़े में थे आप. इतनी जल्दी नजरें बदलते हो. क्या रास्ता है. इस रास्ते से लाए आप हमें. शोभा दिया आपको इस रास्ते से लाना हमें. फिसल जाएं तो बिल्कुल तमाशा बन जाएं पूरी नेशनल न्यूज में.'

जनता रोज ऐसे रास्तों पर ही चलती है

तो नेता जी आपकी जनता रोज ऐसे ही या इससे भी खराब कीचड़ वाले रास्तों पर चलती है बिना किसी हंगामे के. ये उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है और आपको एक दिन में इतना गुस्सा आ गया. जहां के आप विधायक हैं वहां इतनी गन्दगी होना आपके लिए शर्म की बात तो है, लेकिन इतनी नहीं कि आप अपनी गलती मानें.

ये बात साफ है कि तबादले जुगाड़ और मिन्नतों से होते हैं और कूड़े में पड़े अधिकारियों का जो भी विधायक तबादला कराए, वो उससे अपने मनचाहे काम ले पाए. जो आपका फायदा कराए, उसके प्रति आपको अहसानमंद रहना चाहिए. विधायक साहब, ऐसे रास्ते पर चलने से आपकी शोभा घट जाती है और आपकी शान में ऐसी गुस्ताखी के लिए हम माफी चाहते हैं.

आपने सच कहा, आप यदि फिसल जाते तो नेशनल न्यूज में तमाशा बन जाते. फिर टीवी न्यूज और ट्विटर से लेकर फेसबुक तक हर जगह आपका मजाक बनता और ये दुर्भाग्य है. इतना आसान है आपका नेशनल न्यूज बनना जबकि कितने ही जरूरी मुद्दे हैं जो नेशनल न्यूज नहीं बन पाते जैसे फिलहाल जंतर मंतर पर प्रदर्शन करते तमिलनाडू से आए किसान.

लेकिन इस देश को हर बात में तमाशा और मजाक बनाने की एक गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया है. कुछ भद्दी गालियां देने वाले ट्रोल हैं तो कुछ साफ सुथरी भाषा वाले सभ्य ट्रोल हैं. और आखिरी में आपकी विधायकी वाली धमकी तो सोने पे सुहागा है कि तुम्हारी वजह से मुझे कीचड़ में चलना पड़ा इसके लिए तुमपर एक्शन लिया जा सकता है. आखिर अभी तो मैं मिनिस्टर हूं.

घर-मोहल्ले की नजरों और नुक्कड़ गलियारों की चर्चाओं पर ध्यान दिया जाए तो बड़ा आसान है समझना कि क्यों आज़म ख़ान का राज है रामपुर में. कई सारे समीकरण एक साथ काम करते हैं. ये एक बड़ा सच है कि छोटे शहरों में बिजली की समस्या है.

रामपुर में एसपी  के राज में दिन में लगभग बीस घंटे बिजली आती रही है, तो बसपा के राज में 14 से 15 घंटे. ये मेरा खुद का भोगा हुआ है. यकीन मानिए, कई सारे कारणों में ये एक बहुत बड़ा कारण रहा है रामपुर में आज़म ख़ान के लगातार जीतने का.

आज़म ख़ान के बने रहने का एक बड़ा कारण ये भी है कि उनके रहते काम हुआ है. आप जाकर देखेंगे तो सड़कों को देखकर खुश होंगे. हम आम लोगों के नजरिए को देखें तो वे यही कहते पाए जाते हैं – ‘भाई खाते तो सभी हैं, खा लो लेकिन काम भी तो करो कुछ. अब आज़म खान कैसा भी हो, उसने काम किया है, हम तो उसी तो जिताएंगे’.

एक बड़ा कारण जो किसी से नहीं छुपा वो जाति है. मायावती को जो संबोधन दिए जाते हैं, वो लिखते हुए मैं शर्मिंदा हो जाउंगा. जब छोटा था तब नहीं होता था क्योंकि हमारा माहौल हमें अभ्यस्त बना देता है. चौदह या पंद्रह साल की उम्र में मैंने ये भी सुना था कि रामपुर में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा आबादी मुस्लिम है, फिर भी यहां कभी कोई दंगा नहीं हुआ.

लोग तो आराम से ही रहना चाहते हैं, ये तो नेता ही हैं जो लड़ाते हैं. ये बात तारीफ की तरह कही गयी थी और मुझे इस एक बात के लिए रामपुर पर फक्र हुआ था. हालांकि इस बात में जो पूर्वाग्रह झलकता है, वो कोई गर्व करने लायक बात नहीं.

1980 से शुरू होकर अब तक नौ बार आज़म ख़ान विधायक बने हैं और किसी क्षेत्र विशेष में ऐसी मजबूत पकड़ होने के साइडइफेक्ट्स क्या हैं ?

उस मानसिकता के बारे में सोचना होगा जो लगातार जीतते रहने के बाद किसी को लोकतंत्र में भी राजा होने का एहसास कराती है. जब हम उनके रहमो-करम पर पलने वाली प्रजा का रोल निभाते चले जाएंगे तो उन्हें खुद को राजा मानने में कोई गुरेज नहीं होगा और तब हमें ताकत की नुमाइश करते ऐसे वीडियोज के लिए तैयार रहना होगा.

सत्ता में आने बाद ताकत का कैसा उपयोग होता है

यहां तेवर वही हैं, भाषा फिर भी संयमित है. ऐसा तब है जब सपा को बुरी हार मिली है. हम सब को मिलकर कल्पना करनी चाहिए कि सपा जीती होती तो ये वीडियो कैसा होता.

क्योंकि याद आ रहा है, इसलिए जिक्र करता चलूं कि ऐसा ही एक वीडियो दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और सांसद- गायक मनोज तिवारी का भी आया था. जिसमें वे एक शिक्षिका पर भड़क गए क्योंकि उसने मंच पर आकर कुछ गुनगुनाने की गुजारिश उनसे की थी. उन्होंने मंच से ही उस शिक्षिका को झड़प दिया और सबके सामने उतरकर नीचे जाने को कहा.

यहां बात ताकत के दुरुपयोग की है. पूरी व्यवस्था की है जिसने इस दुरूपयोग को आम चलन बना दिया है जहां औहदे में बड़ा कोई भी व्यक्ति अपने से कम औहदे वाले व्यक्ति का जब चाहे, जैसे चाहे अपमान कर सकता है.

पूरे वीडियो में एसडीएम सिर झुकाए खड़ा है. ये एक व्यक्ति की बात है ही नहीं. पूरा ढांचा है ऊपर से नीचे तक. कोई आश्चर्य नहीं कि कोई एसडीएम किसी छोटे अधिकारी से इस तरह बात करता हुआ पाया जाए. हर रिश्ता, हर सम्बन्ध पारिवारिक हो या व्यावसायिक, ताकत के समीकरणों पर ही आधारित है.

हमारी पुलिस किस तरह व्यवहार करती है हमसे. उसके मन में किसने भरा ये अहंकार कि वो जब चाहे लाठी का इस्तेमाल कर सकती है या बदतमीजी से बात कर सकती है. हमारे स्कूलों में किसने अधिकार दिया शिक्षकों को कि वे हाथ उठा सके बच्चों पर. औहदे या उम्र में अपने से छोटे व्यक्ति के प्रति रवैया, व्यक्तित्व के बारे में बताता है. ये न सिर्फ एक व्यक्ति की बात, न पार्टी विशेष की.

विधायक होना गुंडा होना नहीं है. विधायक होने से धमकी देने का हक नहीं मिल जाता. सत्ता की ताकत साथ में होने का मतलब, उसके दुरूपयोग का हक मिलना नहीं होता.

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