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अयोध्या मामले पर जनवरी 2019 तक टली सुनवाई, क्या होगा इसका राजनीति पर असर ?

अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब सुनवाई को जनवरी 2019 तक के लिए टाल दिया है.

Updated On: Oct 29, 2018 03:59 PM IST

Amitesh Amitesh

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अयोध्या मामले पर जनवरी 2019 तक टली सुनवाई, क्या होगा इसका राजनीति पर असर ?
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अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब सुनवाई को जनवरी 2019 तक के लिए टाल दिया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक जनवरी में ही तय होगा कि इस मामले की नियमित सुनवाई होगी या नहीं. इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की बेंच में हो रही है जिनकी तरफ से यह फैसला आया है.

इससे पहले 27 सितंबर को सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के अपने फैसले पर पुनर्विचार से इनकार कर मस्जिद को इस्लाम का आंतरिक हिस्सा मानने से इनकार कर दिया था. उस वक्त इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 27 सितंबर को अपने फैसले में 2:1 से आदेश दिया था कि अयोध्या मामले की सुनवाई सबूतों के आधार पर होगी. 27 सितंबर के फैसले के बाद 29 अक्टूबर की तारीख तय की गई थी जिसके बाद अब वर्तमान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने जनवरी तक सुनवाई को टाल दिया है.

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर, 2010 को दिए अपने फैसले में 2:1 के बहुमत से अयोध्या की उस 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था. इसे फैसले के खिलाफ ही सुप्रीम कोर्ट में सभी पक्षों की तरफ से याचिका दायर की गई है, जिस पर सुनवाई की जानी है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी सरकार ?

supreme court

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जबकि संघ परिवार की तरफ से फिर से मंदिर निर्माण को लेकर सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है. मोदी सरकार मंदिर निर्माण को लेकर पहले से ही अपना स्टैंड साफ कर चुकी है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जाएगा या फिर आपसी समहति से ही बीच का रास्ता निकालकर वहां मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा. सरकार के सूत्रों के मुताबिक, सरकार अभी भी अपने उसी स्टैंड पर कायम रहेगी.

लेकिन, इस बीच संघ परिवार का दबाव सरकार पर आने वाला है. संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की तरफ से इस मामले में कानून बनाने की मांग कर दी गई है. दूसरी तरफ विश्व हिंदू परिषद यानी वीएचपी ने साधु-संतों के साथ मिलकर अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने को लेकर जनजागरण अभियान पहले ही शुरू कर रखा है. संतों की उच्चाधिकार समिति की बैठक में वीएचपी नेताओं और साधु-संतों ने भव्य मंदिर निर्माण को लेकर सांसदों का उनके संसदीय क्षेत्र में घेराव करने और संसद मे कानून बनाने की मांग को लेकर सांसदों के अलावा हर राज्य में राज्यपालों से मिलकर ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम है. साधु-संत प्रधानमंत्री से मिलकर भी राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार की पहल की मांग करने वाले हैं.

बीजेपी के फायरब्रांड नेताओं की बयानबाजी

संघ परिवार के मुखिया की तरफ से जल्द राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की मांग करने के बाद बीजेपी के भीतर भी उन नेताओं को खुलकर अपनी बात रखने का मौका मिल गया है जो राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे हैं या जो खुलकर हिंदुत्व के मुद्दों को उठाते रहे हैं.

बीजेपी नेता और पूर्व सांसद विनय कटियार ने राम मंदिर आंदोलन मामले में देरी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि कांग्रेस नहीं चाहती कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राम मंदिर पर कोई फैसला आए जिसके चलते इतनी देरी हो रही है.

उधर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा है कि हिंदुओं का सब्र अब टूट रहा है. उन्होंने कहा, ‘मुझे भय है कि हिंदुओं का सब्र टूट गया तब क्या होगा?’

विनय कटियार औऱ गिरिराज सिंह के बयान से साफ है कि बीजेपी के भीतर एक बड़ा तबका है जो इस मुद्दे पर संघ परिवार और साधु-संतों की लाइन पर चल रहा है. बीजेपी का यह धड़ा हर हाल में अध्यादेश लाकर या फिर कानून बनाकर राम मंदिर का रास्ता साफ करना चाहता है. लेकिन, फिलहाल सरकार के लिए यह सबसे बड़ी मुश्किल है कि इस मुद्दे पर कानून या अध्यादेश का रास्ता अख्तियार करे.

अब क्या होगा फैसले का असर ?

सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी संगठन और सरकार इस मुद्दे पर काफी संभलकर चल रहे हैं. पांच सालों के अपने काम-काज और बेहतर प्रशासन के मुद्दे पर चुनावी मैदान में उतरने की सोंच रहे सरकार के लोगों को उम्मीद थी कि अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनाव से पहले आ जाता है तो उन्हें इसका सीधा सियासी फायदा हो सकता है. बीजेपी के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि चुनाव से पहले इस मुद्दे पर फैसला चाहे जो भी हो उस पर हो रहे सियासी ध्रुवीकरण का फायदा उन्हें ही मिलेगा.

Keshav Prasad Maurya

बीजेपी नेताओं के बयानों से इसकी झलक भी मिल रही थी. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी राम मंदिर पर बयान आया लेकिन, उसके बाद उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का यह बयान माहौल को ज्यादा गरमाने वाला था जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर के विपरीत आने पर भी कानून बनाकर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की बात की थी.

बीजपी नेताओं और संघ परिवार की तरफ से यूपी समेत देश भर में जो माहौल बनाया जा रहा था उसी का परिणाम था कि अचानक राष्ट्रीय स्तर पर यह मसला फिर से उछलने लगा. लेकिन, कोर्ट के फैसले ने उनकी रणनीति पर फिलहाल पानी फेर दिया है.

दूसरी तरफ, कांग्रेस भले ही राम मंदिर मुद्दे पर अदालत के फैसले को मानने की ही बात कर रही थी, लेकिन, वो नहीं चाहती थी कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला चुनावों से पहले हो. कांग्रेस को इस बात का एहसास है कि लोकसभा चुनाव से पहले अयोध्या मुद्दे पर अगर फैसला आ जाता तो फिर फैसला जो भी हो, उस पर नुकसान कांग्रेस को ही होता. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी दोनों ही सूरत में अयोध्या मसले को अपने हिसाब से भुनाने और ध्रुवीकरण की राजनीति करने में माहिर है, लिहाजा फायदा उसे ही मिलता.

मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल ने भी दलील देकर 2019 के लोकसभा चुनावों तक अयोध्या मामले को टालने की अपील की थी. उसके बाद से ही बीजेपी और संघ परिवार की तरफ से कांग्रेस पर हमला किया जा ता रहा है.

कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व को काट पाएगी बीजेपी ?

दूसरी तरफ, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस वक्त चुनावों से पहले सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर हैं. कभी शिवभक्त तो कभी रामभक्त बनकर राहुल गांधी लगातार अपने-आप को ‘हिंदू’ के तौर पर पेश कर रहे हैं. अगर चुनाव से पहले राम मंदिर पर कोई फैसला आता है तो फिर कांग्रेस अध्यक्ष के हिंदुत्व कार्ड की हवा निकल जाएगी और बीजेपी पूरा फायदा ले लेगी. यही डर कांग्रेस को था, लेकिन, सूत्रों के मुताबिक, अब सुनवाई टलने से अंदर खाने कांग्रेस खेमे में खुशी ही है.

Jhalawar: Congress President Rahul Gandhi waves at crowd during a public meeting in Jhalawar, Rajasthan, Wednesday, Oct 24, 2018. (PTI Photo) (PTI10_24_2018_000100B)

हालांकि संघ परिवार की तरफ से अभी भी अध्यादेश या कानून के जरिए राम मंदिर मुद्दे पर आगे बढ़ने के लिए दबाव बनाया जाएगा. कुछ लोगों का तर्क यह भी है कि अध्यादेश या कानून पर समर्थन और विरोध की सूरत में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का भी हिंदुत्व कार्ड फ्लॉप हो जाएगा, लेकिन, सरकार इस संवेदनशील मसले पर अध्यादेश शायद ही लाए. ऐसे में संघ परिवार और साधु-संतों का आंदोलन चलता रहेगा जिसके जरिए 2019 तक इस मसले को जिंदा करने की कोशिश की जाती रहेगी.

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