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अयोध्या विवाद: राम भरोसे चल रही है बीजेपी

बीजेपी ने सत्ता में आने से पहले सब्जबाग दिखाए ,अब पीछे हट रही है. इस पेचीदा मसले का हल एकतरफा नहीं निकल सकता है.

Updated On: Nov 08, 2018 08:08 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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अयोध्या विवाद: राम भरोसे चल रही है बीजेपी
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अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग उठाई जा रही है. बीजेपी इस मांग को हवा दे रही है. अयोध्या विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. संत समाज और हिंदुत्ववादी संगठन ,संसद में कानून लाने की मांग पर अड़े है. सरकार भी हां-नां में इस पूरे मामले को राजनीतिक रंग देने में लगी हुई है. आम चुनाव से पहले बीजेपी इस मुद्दे को गरम कर रही है. हालांकि इस पूरे मसले पर अयोध्या खामोश है.

परिक्रमा से पहले माहौल बनाने की तैयारी

दिवाली के बाद अयोध्या में पंच कोसी और चौदह कोसी परिक्रमा होती है. जिसमें लाखो की तादाद में श्रद्धालु आते हैं. जिससे पहले माहौल बनाने की तैयारी हो रही है. इसलिए बार-बार राम मंदिर बनाने की बात की जा रही है. बीजेपी चाहती है, जब ये परिक्रमा का वक्त आए तो मुद्दा गरम रहे, जिससे जो भी श्रद्धालु लौट कर घर जाए तो इस मसले की चर्चा गांव देहात में शुरू हो जाए. जिसका राजनीतिक फायदा बीजेपी के खाते में चला जाए.

राम शिला कार्यशाला में माहौल

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प्रतीकात्मक तस्वीर

रामसेवकपुरम में तीन चार महीने पहले कई ट्रक पत्थर मंगाए गए हैं. लेकिन ये पत्थर अभी कार्यशाला में नहीं पहुंचे हैं. कार्यशाला में पुराने पत्थर की नक्काशी का काम चल रहा है. जहां तक मंदिर निर्माण की सामग्री का सवाल है. अभी तक एक छत का काम पूरा होने का दावा किया जा रहा है. इस काम के लिए पांच कारीगर काम कर रहे हैं. जिसमें ज्यादातर गुजरात के सुरेन्द्नगर जिले के रहने वाले है. इस कार्यशाला में काम करने वाले रजनीकांत ने बताया कि एक खंभे की नक्काशी में तकरीबन एक साल का वक्त लगता है. हालांकि ये लोग काम के सिलसिले में यहां टिके हैं, लेकिन इन लोगों का वीएचपी की तरफ से कोई खास ख्याल नहीं रखा जा रहा है. इस परिसर में किताब बेच रहे, हनुमान यादव का दावा है कि यहां श्रद्धालु बहुत आते हैं, लेकिन किताबें कभी कभी एक भी नहीं बिकती हैं. ठेठ अवधी में कहते हैं कि कौनों दिन बोहनीयों नाई होत है.

क्या है लोगों की उम्मीद

बीजेपी की दोनों जगह,राज्य और केन्द्र में बहुमत की सरकार है. जिससे लोगों की उम्मीद बढ़ी है. राम मंदिर कार्यशाला में आए आलमबाग लखनऊ से आए शिवम श्रीवास्तव बीटेक कर रहे हैं. शिवम का कहना है कि इस मसले पर इस वक्त विशुद्ध राजनीति हो रही है. ये भी चाहते हैं कि राम मंदिर बने लेकिन प्राथमिकता रोजगार की है. वहीं अपने को इलाहाबाद का बताने वाले शैलेश सिंह का कहना है कि मंदिर निर्माण जरूरी है अगर ऐसा नहीं होता तो नोटा का विकल्प है.

अरवल, बिहार के विकास कुमार भी बीटेक कर रहे हैं, मंदिर निर्माण के लिए 100 रुपए का चंदा भी दिया है. विकास का कहना है कि कोर्ट में तो मामला 2014 में भी लंबित था लेकिन तब बीजेपी ने गुमराह क्यों किया था. हालांकि जहानाबाद से आए रामेन्दर सिंह ने साफ किया कि युवा वर्ग को रोजगार की जरूरत है.

संतों मे दो वर्ग

राममंदिर को लेकर संत समाज में भी दो फाड़ है. बड़े साधु संत जहां सरकार के रुख के समर्थन में हैं. वहीं कई साधु संत सरकार के रवैये से नाराज दिखाई दे रहे हैं. राम विलास वेदांती,नृत्य गोपाल दास ,सुरेश दास सरकार के साथ दिखाई दे रहे हैं. वहीं कुछ साधु हर हाल में मंदिर निर्माण चाहते हैं. महात्यागी आचार्य पीठ के मंहत परमहंस दास उनमें से एक हैं.अयोध्या के ये साधु नजरबंद हैं.1 से 6 अक्तूबर तक आमरण अनशन पर थे. सरकार ने इनका अनशन तुड़वाया, वादा किया गया था कि प्रधानमंत्री से मिलवाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है. परमहंस ने मंदिर निर्माण के लिए 5 दिसंबर तक का अल्टीमेटम दिया है ,नहीं तो 6 दिसंबर को आत्मदाह की धमकी दे रहे हैं.

अयोध्या खामोश

पहले की तरह अयोध्यावासी खामोश हैं. सबसे ज्यादा परेशानी इन्हीं को उठानी रहती है. ज्यादातर लोग चाहते हैं कि मंदिर बने लेकिन बिना बवाल के मामला निपटना चाहिए. क्योंकि अयोध्या का रोजगार पर्यटकों पर निर्भर है. जितने ज्यादा पर्यटक आएंगे उतनी ज्यादा आमदनी होगी. इसलिए पर्यटन में बढ़ोतरी होती रहे यही अयोध्यावासी चाहते हैं. सरकार से इस दिशा में काम करने की मांग करते हैं.

मुसलमान का रुख

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर मुसलमानों की राय भिन्न है. बहुत लोग चाहते हैं कि कोर्ट के फैसले के बाद ही सरकार को कोई एक्शन लेना चाहिए. अयोध्या बेशक स्पॉटलाइट पर है, लेकिन यहां अमन चैन का माहौल है. बाहरी लोगों के दखल की वजह से ही यहां परेशानी बढ़ती है. ज्यादातर लोग शहर में अमन चाहते है. सभी लड़ाई झगड़े से बचना चाहते हैं.

बीजेपी की मुश्किल

जिस तरह से पब्लिक की उम्मीद बीजेपी से है, उससे बीजेपी मुश्किल में आ सकती है. बीजेपी अब सरकार में है. 2014 के पहले की स्थिति से अब माहौल अलग है. प्रचंड बहुमत की सरकार है. बीजेपी इस मामले में पीछे हटने का जोखिम नहीं उठा सकती है. पब्लिक कह रही है इस बार वादा खिलाफी हुई तो बीजेपी का तख्तापलट जाएगा. जाहिर है कि जनता की नाराजगी बढ़ रही है.

सरकार में होने की वजह से बीजेपी के हाथ बंधे हैं. मामला सुप्रीम कोर्ट में है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही सरकार कोई कदम उठा सकती है. सरकार की कोई भी पेशरफ्त अदालत के निगाह में रहेगी. जिसकी वजह से बीजेपी की तरफ से बयान ही दिया जा रहा है. बीजेपी राजनीतिक फायदा उठाने के फिराक में है लेकिन इस बार बीजेपी की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं. दोनों ही सरकारें कोई 1991-92 जैसा जमावड़ा कर पाएंगी, इसकी आशंका कम है. इतनी तादाद में भीड़ जमा करना भी आसान नहीं है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

बीजेपी के सामने विकल्प

बीजेपी चाहे तो शिलान्यास वाली जगह पर निर्माण आरंभ कर सकती है, जिससे माहौल बनाया जा सकता है. विवाद की जगह सिर्फ 190 फीट *80 फीट है. इसके गिर्द जमीन केन्द्र सरकार के अधीन है, जिसमें कोई विवाद नहीं है. केन्द्र सरकार रिसीवर है, जमीन रिलीज कर सकती है. लेकिन शिलान्यास की जगह मंदिर निर्माण से बीजेपी, वोटर को खुश कर पाएगी ये बड़ा सवाल है. बीजेपी ने सत्ता में आने से पहले सब्जबाग दिखाए ,अब पीछे हट रही है. इस पेचीदा मसले का हल एकतरफा नहीं निकल सकता है. बीजेपी का दांव उल्टा भी पड़ सकता है. मंदिर निर्माण के शोर में बीजेपी के साथ विकास के कारण जुड़े वोटर छिटक सकते हैं.

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