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अयोध्या विवाद: 25 सालों से राजनीति में अटका मुद्दा सुलझने के करीब!

ऐसे संकेत हैं कि अयोध्या गतिरोध एक नए आयाम की तरफ बढ़ रहा है, बल्कि आने वाले महीनों में कारगर राजनीतिक और न्यायिक दखल से इसका कोई हल निकल आए तो बेहतर ही होगा

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Dec 06, 2017 10:11 AM IST

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अयोध्या विवाद: 25 सालों से राजनीति में अटका मुद्दा सुलझने के करीब!

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के पास राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर एक रोचक किस्सा था. 1989 में तिवारी जब लखनऊ में सत्तासीन थे, आरएसएस-बीजेपी-वीएचपी गठबंधन और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी द्वारा एक दूसरे के खिलाफ तेवर तीखे करते जाने से माहौल बहुत तनावपूर्ण हो गया था.

राजीव गांधी ने 1986 में विवादित स्थान का ताला खोलकर हिंदुओं को अपने पाले में लाने के लिए बड़ा दांव खेला था, लेकिन वह साथ ही मुसलमानों को भी मुट्ठी से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे. तब के गृहमंत्री बूटा सिंह उनके मुख्य रणनीतिकार बने और एक योजना बनाई और राजीव गांधी को ‘हकीकत से समझौता’ कर लेने के लिए राजी कर लिया. और इस तरह एक अटकलपच्चू प्लान तैयार हुआ.

राजीव गांधी का रुख

जाहिर तौर पर तिवारी इस विवाद से राजनीतिक रूप से फायदा उठाने के विचार के खिलाफ थे. लेकिन बूटा उत्तर प्रदेश कैडर के एक योग्य आईपीएस की मदद से राजीव को पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक आदरणीय संत, देवरहवा बाबा के पास ले गए. बाबा अपने खास अंदाज में एक पेड़ पर बने मचान पर बैठे रहा करते थे और श्रद्धालु के माथे पर लात मारकर उसे आशीर्वाद दिया करते थे. राजीव ने जब बाबा से पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए तो बाबा ने उनके साथ भी वही किया और अपने मचान से बोले, 'बच्चा, हो जाने दो.' 1996 के आम चुनाव से पहले पी.वी. नरसिम्हा राव के खिलाफ विद्रोह के बाद इस लेखक के साथ बातचीत में तिवारी ने यह किस्सा सुनाते हुए अपनी स्थिति साफ करते हुए एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा था, 'और बच्चा ने हो जाने दिया.'

rajiv gandhi

भारत के इतिहास में और कोई मुद्दा इतना उलझाऊ नहीं है, जितना अयोध्या मसला. यह संवैधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका और राजनीतिक शख्सियतों के घालमेल की गाथा है. राजीव सिर्फ अकेले नहीं थे जो इस मसले को उस तरीके से डील कर रहे थे, जो प्रधानमंत्री के दर्जे के अनुकूल नहीं था. जल्द ही वी.पी. सिंह ने भी इसी का अनुसरण किया. जैसा कि अरुण शौरी ने उनको उद्धृत करते हुए बताया कि उन्होंने वीएचपी प्रतिनिधिमंडल से कहा था, 'अरे भाई वो मस्जिद कहां है. वो तो राम लला का मंदिर है.'

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लेकिन वी.पी. सिंह सार्वजनिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष बने रहते थे और यह उसके एकदम उलट था, जो उन्होंने निजी बातचीत में कहा था. सिर्फ एक अपवाद थे चंद्रशेखर, जिन्होंने 1991 में अपने संक्षिप्त कार्यकाल में मसले को सुलझाने की गंभीर कोशिश की थी. लेकिन राजीव ने प्रधानमंत्री के रूप में पद संभालने के तीन महीने के अंदर ही उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया था.

बीजेपी की आस्था फैसले में नहीं बदलती

तो, जहां तक बीजेपी का मामला है, इसका अयोध्या को लेकर हमेशा एक जैसा रुख रहा है. बीजेपी के पार्टी घोषणापत्रों में राम मंदिर निर्माण आस्था का प्रश्न होता है, जिस पर कोई तर्क स्वीकार नहीं किया जाएगा. लेकिन बीजेपी जब भी सत्ता में आई तो पता लगा कि ऐसा कहना आसान है, करना मुश्किल. उदाहरण के लिए अयोध्या मसले पर अभी भी अदालत में मालिकाना हक का मुकदमा लड़ा जा रहा है. जाहिर है कि अदालत आस्था के मसले हल करने के लिए साधनसंपन्न नहीं है. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में भी यह मसला सरकार के सामने आया. और वाजपेयी की सरकार भी अदालत पर निर्भर रहने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकी. 1999-2004 के दौरान एनडीए सरकार की वीएचपी और आरएसएस से सबसे बुरी मुठभेड़ हुई. 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को गिरा दिए जाने के बाद अयोध्या मसला व्यावहारिक रूप से बीजेपी की योजनाओं में पृष्ठभूमि में चला गया था.

ayodhya temple

इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय जजों की पीठ ने अपने फैसले में सामाजिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए इस जटिल मसले के समाधान की कोशिश की. लेकिन इस फैसले के वैधानिक क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठे. यही सबसे बड़ा कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मुकदमे की सुनवाई शुरू की.

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मोदी और योगी का साथ आना बड़ा संकेत

यह बात हमेशा दिमाग में रखनी होगी कि आज की राजनीतिक परिस्थिति पूर्व से बहुत अलग है. उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी हिंदू पहचान जाहिर करने में कोई झिझक नहीं है. राम मंदिर बनाने की उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा उनके भारतीय संविधान का पालन करने की जिम्मेदारी से टकरा सकती है, लेकिन ऐसे संकेत हैं कि उन्होंने इन राजनीतिक बारूदी सुरंगों के बीच से निकलने की राह बना ली है.

इन संकेतों में से एक है योगी आदित्यनाथ का राज्याभिषेक. गोरखनाथ पीठ के महंत को देश के सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया. योगी उन धार्मिक नेताओं में से हैं, जो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग करने वालों में सबसे मुखर हैं.

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हालांकि अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को देखते हुए योगी अब सबसे नरम शख्स हैं, क्योंकि उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियां धार्मिक उग्रता से कहीं ज्यादा वजनदार हैं. इसके साथ ही हिंदुत्व के कट्टरपंथियों के लिए योगी पर सवाल उठाना भी बेहद मुश्किल होगा.

ऐसे संकेत हैं कि अयोध्या गतिरोध एक नए आयाम की तरफ बढ़ रहा है, बल्कि आने वाले महीनों में कारगर राजनीतिक और न्यायिक दखल से इसका कोई हल निकल आए तो बेहतर ही होगा. यह भारतीय राजनीति की त्रासदी ही होगी अगर इस विवाद में और मवाद पड़ने दी गई.

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