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अयोध्या विध्वंस के 25 साल: कोर्ट के बाहर क्यों नहीं हो सकता समझौता?

अयोध्या विवाद का कोर्ट से बाहर सुलह होने में कानूनी अड़चनें हैं. इसके हल का अभी किसी के पास कोई रोडमैप नहीं है

Syed Mojiz Imam Updated On: Dec 05, 2017 10:33 AM IST

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अयोध्या विध्वंस के 25 साल: कोर्ट के बाहर क्यों नहीं हो सकता समझौता?

सुप्रीम कोर्ट में 5 दिसंबर से अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हो रही है. सुप्रीम कोर्ट को फैसला करना है कि आखिर यह जमीन किसकी है. कोर्ट में सभी दस्तावेजों के अग्रेजी में अनुवाद हो चुका है. कोर्ट ने भी यह पेशकश की थी कि इस मामले को अदालत के बाहर सुलझा लिया जाए. लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला.

नवंबर महीने में अध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने भी अपने स्तर से कई लोगों से बातचीत की. लेकिन विवाद का कोई हल निकलने की उम्मीद नहीं बनी है. इस बीच अयोध्या मे विध्वंस के 25 साल पूरे हो जाएगें. इस घटना की जांच कर रहे जस्टिस एम एस लिब्राहन ने कहा है कि पहले विध्वंस के मामले की सुनवाई होनी चाहिए. बाद में टाइटिल सूट पर कोई सुनवाई शुरू करनी चाहिए. हालांकि सिविल सोसाइटी के लोगों ने अदालत से दरख्वास्त की है कि किसी भी पक्ष को यह जमीन नहीं देनी चाहिए, क्योंकि इससे हिंसा भड़कने की आशंका है.

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कोर्ट के बाहर कोई समझौता होगा इसकी उम्मीद कम ही नजर आ रही है. क्योंकि दोनों पक्ष में से कोई भी पक्ष पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है. बातचीत के मसले पर जमाते इस्लामी हिंद के जलालुद्दीन उमरी ने कहा कि शर्त के आधार पर कोई बात नहीं हो सकती है. इससे पहले भी तकरीबन 10 बार बातचीत हुई जिसका कोई नतीजा नहीं निकला है. जमात के ही नेता सलीम इंजीनियर भी कहते है कि सिर्फ अदालत का फैसला ही इस पूरे मामले को हल कर सकता है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की भी यही राय है.

संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए. लेकिन कैसे अभी किसी के पास इसका कोई रोडमैप नहीं है. हालांकि कोर्ट के बाहर सुलह होने में कानूनी अड़चन है.

समझौते के लिए अयोध्या एक्ट में करना पड़ेगा बदलाव

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढहाने के बाद केंद्र सरकार ने कानून लाकर  7 जनवरी, 1993 से इसके आस-पास 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया. जिसमें तीन गांव कोट रामचंद्र, अवध खास और जलवानपुर की जमीनें थी. इस अधिग्रहण के खिलाफ मुस्लिम पक्ष कोर्ट गया लेकिन अदालत ने इसको खारिज कर दिया. सरकार की तरफ से कहा गया कि पब्लिक ऑर्डर को बहाल करने के लिए ऐसा किया गया है.

अयोध्या अधिग्रहण एक्ट 1993 के क्लाज 12 में साफ कहा गया है कि इस एक्ट में बदलाव करने के लिए सिर्फ संसद को अधिकार है. कोई भी बदलाव दोनों सदन में पास कराना जरूरी होगा. इस एक्ट के तहत जब तक इस विवाद का कोई कानूनी हल नहीं निकल आता है केंद्र सरकार इस पूरे इलाके की कस्टोडियन है. इसके मौजूदा स्वरूप से छेड़छाड़ पर 3 साल की सजा का भी प्रावधान है.

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वक्फ एक्ट में भी करना पड़ेगा बदलाव

अयोध्या के मामले में यूपी शिया वक्फ बोर्ड ने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) का साथ दिया है. लेकिन शिया धर्मगुरू कल्बे जव्वाद ने दिल्ली में 27 नवंबर को एक धार्मिक जलसे में कहा था कि वो इस मसले पर पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ है. हालाकि पर्सनल लॉ बोर्ड ने दलील दी है कि शिया वक्फ बोर्ड का इस मामले में कोई दावा नहीं बनता. और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे पहले ही खारिज कर दिया है.

वक्फ एक्ट में 2013 में संशोधन किया गया. जिसमें धारा 51 के संशोधन में कहा गया कि वक्फ संपत्ति को किसी तरह का विक्रय विनिमय या बंधक के तौर पर नहीं दिया जा सकता है. अगर ऐसा किया गया है तो इसे शून्य माना जाएगा. कोर्ट के बाहर किसी भी समझौते के लिए इस एक्ट में भी बदलाव करना पड़ सकता है.

अयोध्या विवाद से संबंधित सरकारी दस्तावेज देखने के लिए यहां क्लिक करें

6 दिसंबर 1992 की घटना

6 दिसंबर, 1992 को विश्व हिंदू परिषद ने कारसेवा के लिए बड़ी तादाद में लोगों को बुलाया था. जिसमें बीजेपी के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार मंच पर मौजूद थे. सुबह से इन नेताओं का भाषण हुआ. इस दौरान कारसेवा के लिए आए लोग बेकाबू हो गए और उन्होंने पुलिस और प्रशासन के सामने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया. इस विध्वंस के मामले में रायबरेली की सीबीआई कोर्ट में मुकदमा लंबित है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

30 सितंबर, 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8000 पन्नों का फैसला दिया. तीन जजों की पीठ ने 2.77 एकड़ के विवादित जगह का तीन हिस्सा कर दिया. एक हिस्सा निर्मोही अखाड़ा, एक हिस्सा रामलला और एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया. अदालत के इस फैसले को किसी भी पक्ष ने मंजूर नहीं किया और मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया.

 

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अयोध्या में विवादित स्थल के पास तैनात सुरक्षाकर्मी (फोटो: रॉयटर्स)

क्या है विवाद का इतिहास

बताया जा रहा है कि सन् 1525 में मुगल शासक बाबर ने उत्तर भारत पर कब्जा किया. 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने मस्जिद बनवाया. हिंदू पक्षकारों का कहना है कि मीर बाकी ने राम जन्म स्थान को गिराकर मस्जिद बनवा दिया था. जब हुकूमत ब्रिटिश राज के पास गई तो प्रशासन नें बैरिकेटिंग लगा दिया और दोनों पक्ष पूजा करने लगे.

सबसे पहले 1850 में मस्जिद को लेकर हनुमान गढ़ी के पास विवाद हुआ. 1946 में अखिल भारतीय रामायण महासभा ने आंदोलन शुरू किया. 1949 में गोरखनाथ मठ के दिग्विजय नाथ की अगुवाई में राम चरित मानस का पाठ हुआ और 10वें दिन विवादित स्थल के अंदर राम और सीता की मूर्ति को स्थापित कर दिया गया.

बताया जाता है कि तत्कालीन फैजाबाद के कलेक्टर के के नायर ने मूर्ति हटवाने से इनकार कर दिया. जिसके बाद इसको बंद कर दिया गया और सिर्फ पुजारियों को पूजा करने की अनुमति दी गई. 1986 में दीवानी अदालत फैजाबाद के निर्देश के बाद इस जगह का ताला आम जनता के लिए खोल दिया गया. उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर मुस्लिम पक्षों ने आरोप लगाया कि उनकी मिलीभगत से ऐसा हुआ है.

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