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क्या गांधी परिवार पर हाथ डालने की हिम्मत जुटा पाएगी सरकार?

यह पहला मौका है, जब किसी पूर्व सर्विस चीफ को गिरफ्तार किया गया है जिसका सेना के अनुशासन पर गहरा असर पड़ेगा

Updated On: Dec 11, 2016 10:30 AM IST

Pramod Joshi

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क्या गांधी परिवार पर हाथ डालने की हिम्मत जुटा पाएगी सरकार?

पूर्व वायु सेनाध्यक्ष एसपी त्यागी की गिरफ्तारी के बाद हथियार खरीद के दो पहलू सामने आए हैं.

यह पहला मौका है, जब किसी पूर्व सर्विस चीफ को गिरफ्तार किया गया है जिसका सेना के अनुशासन पर गहरा असर पड़ेगा.

अटकलें इस बात की हैं कि वायुसेना से ही जुड़े कुछ और मामले अभी और सामने आएंगे. साथ ही सेना से जुड़े अधिकारियों और राजनेताओं के रिश्तों पर भी रोशनी पड़ेगी.

पिछले दो साल में रक्षा खरीद की प्रक्रिया में बड़े बदलाव हुए हैं. ‘मेक इन इंडिया’ की पहल शुरू हुई है, देश का निजी क्षेत्र रक्षा उद्योग में उतर रहा है. इससे गलाकाट व्यावसायिक प्रतियोगिता का माहौल भी बनेगा.

फिलहाल इस मामले का ज्यादा बड़ा 'पहलू' राजनीतिक है.

इस साल 8 अप्रैल को जब मिलान की एक अदालत ने वीवीआईपी हेलिकॉप्टर अगस्ता-वेस्टलैंड डील के केस में ज्यूसेप ओर्सी और ब्रूनो स्पाग्लोनी को भ्रष्टाचार का दोषी पाया तभी समझ में आ गया था कि फैसले से राजनीतिक गुल खिलेंगे.

अदालत के रिकॉर्ड में ऐसे दस्तावेज आए, जिनमें कुछ नाम सांकेतिक अक्षरों में लिखे गए थे.

मीडिया को दी गई रिश्वत

कुछ महीने पहले एक दस्तावेज सामने आया जिसके अनुसार एक इतालवी कंपनी ने इस सौदे को मीडिया की नजरों से बचाने के लिए तकरीबन 50 करोड़ रुपए आवंटित किए थे.

भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी ने इस मामले को लोकसभा में उठाया भी था. संसद के बाहर भी इसकी काफी चर्चा हुई. बताया गया कि बीस पत्रकारों को फायदा पहुंचाया गया.

एक पत्रकार से इस मसले पर पूछताछ भी की गई लेकिन ये बातें कभी खुलकर सामने नहीं आईं और काफी कुछ रहस्य के घेरे में ही रहा.

दूसरी तरफ मीडिया में इस आशय की जानकारियां अलग-अलग सूत्रों से आने लगी थीं  कि फायदा ‘परिवार’ को मिला.

इस मामले की तुलना बोफोर्स मामले से की जाती है, पर उस मामले में स्वीडन सरकार ने सहयोग नहीं किया था. सारी जांच भारतीय एजेंसियों और मीडिया के मार्फत हुई थी.

इस बार इटली की सरकार ने पहल की है, फिर भी रहस्य का घेरा टूट नहीं रहा है.

रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने इस साल मई महीने में कहा था, 'अगस्ता-वेस्टलैंड मामला बोफोर्स जैसा साबित नहीं होगा. जैसा बोफोर्स प्रसंग में नहीं हो सका वैसा हम इस मामले में करेंगे.'

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उन्होंने कहा, 'एसपी त्यागी और गौतम खेतान ‘छोटे नाम’ हैं. उन्होंने तो बहती गंगा में हाथ धोया. हम पता लगा रहे हैं कि इस गंगा का स्रोत कहाँ है.'

जाहिर है, कि अब ये मामला बोफोर्स जैसा राजनीतिक रंग पकड़ेगा.

सीबीआई का कहना है कि एसपी त्यागी ‘सहयोग’ नहीं कर रहे हैं. सवाल ये है कि, आखिर..सीबीआई उनसे किस किस्म का सहयोग चाहती है?

क्या ये पता लगा पाना मुमकिन है कि पैसा किसके पास गया? इस सौदे में क्या त्यागी ही अंतिम लाभार्थी थे? क्या बीजेपी ने इस बात का गणित लगा लिया है कि इस गंगा का स्रोत कहाँ है? घूम-फिरकर यह मामला फुस्स साबित हुआ तो क्या होगा?

या फिर, क्या सरकार गांधी परिवार पर हाथ डालकर गलती करेगी? क्या सारी बातें सिर्फ माहौल बनाने के लिए की जा रही हैं? ये महत्वपूर्ण सवाल हैं और समय ही इसका जवाब देगा.

बोफोर्स जैसा मामला

मनोहर पर्रिकर ने किस आधार पर कहा था कि यह मामला बोफोर्स जैसा साबित नहीं होगा? यह कैसे पता लगेगा कि पैसा किसके पास गया?

नोटबंदी के इस दौर में यह छिपी बात नहीं है कि भारत में बड़े राजनीतिक भुगतान नकद होते हैं. राजनीतिक पेमेंट बैंक ट्रांसफर के जरिये नहीं किया जाता.

सैकड़ों करोड़ रुपए इसी तरह लिए-दिए जाते हैं. हो सकता है कि प्रवर्तन निदेशालय बैंक के मार्फत पैसा पाने वालों के नाम का पता लगा ले. पर उसके बाद क्या?

उसके बाद उन व्यक्तियों के बयान महत्वपूर्ण होंगे, जिनके पास पैसा आया है. शायद वहीं से नकदी ट्रांसफर का सबूत भी मिले जाए.

ऐसा लग जैसे सरकार आरोपियों की पहली कतार को टार्गेट करने जा रही है ताकि अंतिम कतार का पता लगे.

rahulgandhi

यह बात भी समझ में आती है कि अगर इस मुद्दे को 2019 के चुनाव तक जीवित रखा जा सका तो बीजेपी के लिए यह उपयोगी होगा.

मोदी सरकार का नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ इस कदर पीछे पड़ जाना गलत भी साबित हो सकता है?

आरोप है कि एसपी त्यागी ने हेलिकॉप्टर की सर्विस सीलिंग 6000 मीटर से घटाकर 4500 मीटर कराने में भूमिका निभाई.

भारत में हथियार खरीदने की प्रक्रिया के पारदर्शी होने के बावजूद उसमें कितने छेद हैं, यह इस मामले से साफ होता है.

सरकार की दिलचस्पी इस बात में है कि त्यागी के जरिये वो कांग्रेस के बड़े नेताओं और कुछ अफसरों की गर्दन नापने में सफल हो जाए.

लेकिन ऐसा करना अधूरा काम करने जैसा है. इसका तार्किक नतीजा, इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने से ही मुमकिन है.

देश के लगभग सभी दलों ने सत्ता का सुख प्राप्त किया है, पर हथियारों की खरीद को बेहतर बनाने की कोशिश किसी ने नहीं की.

आखिर, दुनिया की चौथे नम्बर की सेना के लिए हथियार खरीदने का तरीका परचून की दुकान जैसा क्यों है?

अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर का सौदा सात साल की बातचीत के बाद पूरा हुआ. और पहले हेलिकॉप्टर की सप्लाई के साथ ही विवाद शुरू हो गया.

ये मामला कांग्रेस के अलावा विपक्ष के दूसरे दलों की परीक्षा भी है. संसद में इस मामले के प्रति वामदलों, बसपा और सपा की प्रतिक्रिया रक्षात्मक रही है, पर वे खुलकर कांग्रेस के खिलाफ बोलने को भी तैयार नहीं हैं.

राजनीति में भ्रष्टाचार

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार बहुत बड़ा मुद्दा कभी नहीं रहा. सच यह है कि साल 1989 का चुनाव राजीव गांधी केवल बोफोर्स के कारण नहीं हारे थे. उनकी हार के पीछे ‘सामाजिक’ कारण थे. सांप्रदायिक और जातीय राजनीति.

इधर चल रहे नोटबंदी अभियान के बावजूद सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की पहल नहीं की है.

देश के छह प्रमुख राजनीतिक दलों को, 'जनता के जानकारी पाने के अधिकार के दायरे में लाने' की कोशिश की गई तो लगभग सारे दलों ने उसका विरोध किया.

क्षेत्रीय पार्टियों के बड़े नेताओं में से ज्यादातर इस प्रकार के आरोपों से घिरे रहे हैं.

भारतीय राजनीति में पारदर्शिता और शुचिता से ज्यादा सामाजिक समीकरणों की भूमिका है.

ताज्जुब की बात है कि इतनी सारी सरकारी रोकथाम के बावजूद अगर अगस्ता-वेस्टलैंड सौदे में कमीशन दिया गया है, तो हमारी फौरी सरकारी प्रतिक्रिया होती है कि कंपनियों को बैन कर दिया जाए.

इस तरह से अनेक कम्पनियां बैन की जा चुकी हैं. अगर हम इसकी सूची बनाने लग जाएं, तो पाएंगे कि हमने दुनिया की तकरीबन आधी कम्पनियाँ बैन कर दी हैं.

इस मानसिकता से सेनाओं के आधुनिकीकरण का रास्ता रुक जाएगा इसलिए भी ये प्रवृत्ति रोकी गई है.

बोफोर्स के तोप से लेकर अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर तक के सौदों में अनियमितताएं पायी गईं थीं. इसके बाद भी उनकी गुणवत्ता साबित थी.

सवाल ये है कि जो हेलिकॉप्टर अपनी गुणवत्ता के आधार पर चुना गया है उसे कमीशन देने की जरूरत क्यों पैदा हुई?

अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर के चयन की प्रक्रिया पर ध्यान दें तो पता लगेगा कि पहले 6000 किमी की ऊँचाई तक उड़ान भरने वाले हेलिकॉप्टर, 'खोज' का मानक बना.

Agusta westland Helicopter

इस मानक का हेलिकॉप्टर ढूँढना ही मुश्किल था, शायद इसीलिए इसे घटाकर 4500 किमी किया गया.

अंत में मुकाबला सिकोर्स्की और अगस्ता वेस्टलैंड के एडब्ल्यू-101 के बीच रह गया. दोनों कम्पनियों की व्यावसायिक प्रतियोगिता भी इन विवादों के मूल में है.

हथियारों के ज्यादातर सौदों के मूल में विवाद हैं. जीप मामले (1948) से लेकर बोफोर्स (1987), बराक मिसाइल (1996-97), ताबूत (1999), सुदीप्तो घोष कांड (2009) और टैट्रा ट्रक (2011) तक रक्षा से जुड़े तमाम सौदों के जड़ में विवाद है.

भारत में बन रही स्कोर्पीन पनडुब्बी के रहस्य खुलने की खबर आई तो पता लगा कि इसके पीछे भी व्यावसायिक रंजिश है. आने वाले वक्त की व्यावसायिक प्रतियोगिता कम खतरनाक नहीं है.

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