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अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकाप्टर डील: 'अदृश्य हाथ' की तरफ पहला कदम

पूर्व वायुसेना प्रमुख एस.पी त्यागी की गिरफ्तारी के राजनीतिक अर्थ

Updated On: Dec 10, 2016 12:36 PM IST

सुरेश बाफना
वरिष्ठ पत्रकार

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अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकाप्टर डील: 'अदृश्य हाथ' की तरफ पहला कदम

मनमोहन सरकार के समय में ब्रिटेन की कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड से 3600 करोड़ रुपए की लागत से खरीदे गए 12 वीआईपी हेलिकाप्टर में हुए घोटाले का भूत भारतीय राजनीति के आकाश में फिर मंडरा रहा है.

इस घोटाले में पूर्व वायुसेना प्रमुख शशिन्द्र पाल त्यागी की गिरफ्तारी इस बात का साफ संकेत है कि मोदी सरकार आनेवाले दिनों में कई बड़े लोगों से जुड़े मामलों में तेजी से कार्रवाई करने वाली है.

देश के इतिहास में पहली बार कोई पूर्व या वर्तमान सेना प्रमुख को गिरफ्तार किया गया है.

इधर, चेन्नई से खबर है कि सीबीआई ने बीएसएनल की 864 हाई स्पीड डाटा लाइन के गैर कानूनी इस्तेमाल के आरोप में पूर्व संचार मंत्री दयानिधि मारन. और उनके भाई कलानिधि मारन के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल कर दिया है.

उन पर आरोप है कि सरकार को इससे 1.78 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है.

नोटबंदी पर संसद में सरकार और विपक्ष के बीच जारी गतिरोध और टकराव के संदर्भ में इन दो खबरों का सीधा अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी सरकार ने निर्णायक कार्रवाई करने का अभियान शुरु कर दिया है.

गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना की सीबीआई प्रमुख के पद पर अस्थायी तौर पर नियुक्ति को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

सीबीआई को पहचान करने में लगे 6 साल

अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकाप्टर घोटाले के मामले में इटली में मिलान शहर की अदालत ने कंपनी के दो अधिकारियों को घूस देने का दोषी पाया है.

इटली की अदालत के फैसले के बाद ही भारत में सीबीआई ने मनमोहन सरकार के समय केस दर्ज कर के जांच शुरु की थी.

सीबीआई

इटली की अदालत में सबूतों के आधार पर यह साबित हो गया कि भारत को बेचे गए 12 अगस्ता हेलिकाप्टर सौदे में 7 करोड़ यूरो की राशि (लगभग 360 करोड़ रुपए) घूस दी गई है.

दिलचस्प बात यह है कि ‍इटली में रिश्वत देनेवाले को तो सजा मिल गई. लेकिन भारत में लेनवालों की पहचान करने में सीबीआई को 6 साल लग गए.

इस हेलिकाप्टर घोटाले के तार वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार तक जुड़े हैं. सौदे को अंतिम रूप मनमोहन सरकार के दौरान दिया गया.

इटली से मिले डेढ़ लाख पेज के कागजातों से साफ होता है कि इस घोटाले के तहत. भारत में नेताओं, सेना और रक्षा मंत्रालय के अफसरों और पूर्व वायुसेना प्रमुख एस.पी. त्यागी के परिवारवालों को घूस दी गई.

जांच रोकने के लिए 'अदृश्य ताकत' सक्रिय

सौदे में शामिल विदेशी दलालों से मिले कागजात में कुछ कोडवर्ड AM, Fam, Pol व  Bur के तौर पर दर्ज हैं.

सीबीआई के अधिकारियों ने इन कोडवर्ड को अहमद पटेल, एस.पी. त्यागी की फैमिली, राजनीतिज्ञ और नौकरशाहों के रूप में समझा है.

अहमद पटेल ने इस बारे में बयान दिया था कि यदि उनके खिलाफ कोई आरोप साबित हो जाए. तो वह राज्यसभा और सार्वजनिक जीवन छोड़ देंगे.

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि, भारत में इस घोटाले की जांच को रोकने के लिए कोई अदृश्य ताकत हाई लेवल पर सक्रिय थी. उन्होंने इटली की अदालत का फैसला आने के बाद ऐसा कहा. जाहिर है उनका इशारा कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की तरफ था.

जिन विदेशी रक्षा दलालों ने भारतीयों के बैंक खातों में घूस जमा कराई है. उसके ठोस सबूत सीबीआई को मिल चुके हैं.

अब सीबीआई को यह पता लगाना चाहिए कि इन भारतीय रक्षा दलालों ने किन राजनेताओं और नौकरशाहों को घूस का हिस्सा दिया है.

यदि सीबीआई ने ईमानदारी के साथ इस मामले की जांच को आगे बढ़ाया. तो यह तय है कि भारतीय राजनीति में भूकंप जैसी स्थिति पैदा हो सकती है.

राजनीति की साफ-सफाई करनी होगी

सभी जानते हैं कि इंदिरा जी के जमाने में रक्षा सौदों के जरिए चुनावी फंडिंग जुटाने की परंपरा शुरु हुई थी.

 

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फोटो: पीटीआई

राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को शिक्षित करने के नाम पर विदेशी रक्षा कंपनियां सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करती हैं.

रक्षा सौदों में दलाली को पूरी तरह मिटाने के लिए हमें अपनी राजनीति को साफ-सुथरी बनाने की कोशिश भी करनी होगी. भ्रष्ट राजनेता ही पूरी व्यवस्था को भ्रष्ट करते हैं.

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