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वाजपेयी के अनसुने किस्से (पार्ट-2): अटल-आडवाणी की जोड़ी ने ऐसे खड़ी की एक विरासत

आडवाणी के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद वाजपेयी से जिस संबंध और मजबूत रिश्ते की शुरुआत हुई वह तकरीबन साढ़े छह दशकों तक अटूट बना रहा

Updated On: Aug 23, 2018 07:18 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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वाजपेयी के अनसुने किस्से (पार्ट-2): अटल-आडवाणी की जोड़ी ने ऐसे खड़ी की एक विरासत

जब जब भारतीय जनसंघ और उसके उत्तराधिकारी भारतीय जनता पार्टी के विकास की बात की जाती है तो एक कहानी का जिक्र अक्सर लालकृष्ण आडवाणी हास्य विनोद के साथ करते हैं. कहानी कुछ यों है- 1968 में भारतीय जनसंघ की कमान संभालने के बाद वाजपेयी चार वर्षों तक इसके अध्यक्ष रहे. इसके बाद वाजपेयी इस जिम्मेदारी को अपने किसी योग्य साथी को सौंपना चाहते थे जिससे कि वो व्यक्ति पार्टी को और आगे ले जा सके.

लेकिन ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये था कि वाजपेयी का आखिर उत्तराधिकारी बनेगा कौन. वाजपेयी और आडवाणी के अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने विचार करके शुरुआत में पार्टी के उपाध्यक्ष भाई महावीर का चयन करने का निश्चय किया. वाजपेयी की इच्छा के अनुरूप भाई महावीर ने पार्टी की भागलपुर नेशनल एग्जीक्यूटिव की बैठक की अध्यक्षता करने पर सहमति भी जता दी थी. इस बैठक में भारतीय जनसंघ के काम काज का स्वतंत्र विश्लेषण किया जाना था क्योंकि भारत पाकिस्तान के 1971 युद्ध के बाद हुए 72 के चुनावों में पार्टी ने बहुत बुरा प्रदर्शन किया था. ऐसे में भाई महावीर एक योग्य विकल्प थे.

हालांकि शुरू में भाई महावीर ने राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक की अध्यक्षता करना स्वीकार कर लिया था. लेकिन जब उन्होंने अपनी पत्नी और घरवालों से इस संबंध में बात की तो उन्हें इस कार्य को संभालने में घबराहट होने लगी. नई उपजी इन परिस्थितियों को देखते हुए वाजपेयी और आडवाणी ने विजया राजे सिंधिया से अनुरोध किया कि वो बैठक की अध्यक्षता करें. ग्वालियर के राजघराने की रानी विजया राजे सिंधिया राजमाता के नाम से पहचानी जाती थी. और उन्होंने उस समय इंदिरा गांधी की लहर के बावजूद मध्य प्रदेश से लोकसभा का चुनाव जीता था.

अध्यक्ष रहते हुए आडवाणी ने बलराज मधोक को पार्टी से निकाल दिया था

राजमाता सिंधिया ने भी वाजपेयी और आडवाणी का अनुरोध ठुकरा दिया. ऐसे में 1973 के कानपुर राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक से आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर अपनी पारी की शुरुआत की. लेकिन आडवाणी की ताजपोशी भी बिना विवादों के नहीं हो सकी. आडवाणी ने पार्टी के वरिष्ठ नेता बलराज मधोक को पार्टी से निकाल दिया. मधोक पिछले कुछ सालों से वाजपेयी और उनकी राजनीति पर लगातार निशाना साध रहे थे.

फोटो रॉयटर्स से

फोटो रॉयटर्स से

यहीं से वाजपेयी और आडवाणी के बीच का संबंध और बंधन मजबूत बना जो कि वाजपेयी की मौत तक तकरीबन साढ़े छह दशकों तक अटूट बना रहा. जिस तरह से वाजपेयी ने आडवाणी के लिए अध्यक्ष पद 1973 में छोड़ दिया था उसी तरह से एक बार फिर 1986 में वाजपेयी ने अपना अध्यक्ष पद आडवाणी के लिए छोड़ दिया. उस समय तक भारतीय जनसंघ भारतीय जनता पार्टी में जब्दील हो चुका था. कारण भी दोनों समय लगभग एक ही था.

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जनता पार्टी के कड़वे अनुभवों से गुजरने के बाद भारतीय जनसंघ के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी के नाम से अलग पार्टी बना ली. लेकिन इस नई बनी पार्टी का प्रदर्शन 1984 के चुनावों में फीका रहा था. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को देश भर में बंपर सीटें मिली वहीं बीजेपी महज दो सीटों पर सिमट कर रह गई थी. पिछले बार की तरह से इस बार भी वाजपेयी ने हार की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली और पार्टी से कहा कि वो उनकी गलती की जो चाहे सजा दे दे. लेकिन वाजपेयी के इस अनुरोध को सर्वसम्मति से ठुकरा दिया गया.

गांधी फिलॉसफी के साथ पार्टी में आया आया एकात्म मानवाद का दर्शन

हालांकि वरिष्ठ नेताओं के एक समूह जिसका नेतृत्व केएल शर्मा कर रहे थे, ने एक आंतरिक समीक्षा में ये निष्कर्ष निकाला की वाजपेयी की पार्टी को गांधीवादी समाजवाद की तरफ ले जाने वाले गाइडिंग फिलॉसफी में बदलाव की जरूरत है. उन लोगों ने इस फिलॉसफी में बदलाव की वकालत करते हुए दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ के रास्ते पर पार्टी को आगे ले जाने की बात कही. इसके अलावा कुछ अन्य सुझाव भी दिए गए जिनमें राष्ट्रीयता और सकारात्मक धर्म निरपेक्षता पर जोर देने की बात कही गई थी. हालांकि पूरी तरह से गांधीवादी समाजवाद की परिकल्पना को खारिज भी नहीं किया गया थे लेकिन उसे इस तरह से शामिल किया गया था जिससे कि गांधीवादी दर्शन की मुख्य विशेषता, समाजिक न्याय और समानता पार्टी के मुख्य दर्शन में शामिल रह सके.

रॉयटर्स पिक्चर

रॉयटर्स पिक्चर

पार्टी की कमान हाथ में आने के बाद आडवाणी ने केएन गोविंदाचार्य जैसे कुछ शक्तिशाली संघ प्रचारकों को पार्टी में शामिल करा कर एक राजनैतिक प्रयोग किया जो कि अपने तरह का अनूठा प्रयोग था. जनता पार्टी में शामिल होने के अनुभवों से प्राप्त हुई शिक्षा को भुलाए बिना आडवाणी ने संगठन को मजबूत बनाने पर जोर देना शुरू किया. इसके लिए आडवाणी ने अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी विशिष्ट शख्सियतों को पार्टी में शामिल कराना शुरू किया जिसमें संघ परिवार के बाहर के लोग भी थे तो कुछ आरएसएस के प्रचारक भी थे. नरेंद्र मोदी उन्हीं प्रचारकों में से एक थे जिन्हें आडवाणी ने 1986 में पार्टी में शामिल कराया था.

'मैं हमेशा उन्हें अपना वरिष्ठ मानता रहा हूं और उन्हें सम्मान देता रहा हूं'

मजेदार बात ये है कि आडवाणी भी संघ परिवार पर लिखी गई राजनीतिक थीसीस से मार्गदर्शन प्राप्त करते थे. 'दी ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ ऐन आइडियोलॉजिकल मूवमेंट इंटू एग्रीगेटिव पार्टी' शीर्षक नाम से लिखे इस लेख को अमेरिकन स्कॉलर हैंपटन थॉमसन डेवी जूनियर ने लिखा था. थॉमसन डेवी का तर्क था कि अपने विचारधारा के मूल सिद्धांतो को त्यागे बिना बीजेपी अपना आधार केवल समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़कर ही बढ़ा सकती है.

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1986 से लेकर 1993 तक बीजेपी ने केवल अपनी विचारधारा के आधार को मजबूत करने का काम किया. इसके तहत उन्होंने देश भर में रथ यात्रा निकालने की शुरुआत की. जल्द ही आडवाणी पार्टी का प्रमुख चेहरा बन गए और वाजपेयी का प्रभाव घटने लगा. हालांकि आडवाणी भले ही लोगों की नजरों में सबसे ऊपर थे लेकिन खुद कभी आडवाणी ने वाजपेयी को दूसरे दर्जे का नहीं समझा. मुझे दिए गए एक इंटरव्यू में खुद आडवाणी ने कहा था, 'मैं हमेशा उन्हें अपना वरिष्ठ मानता रहा हूं और उन्हें सम्मान देता रहा हूं.'

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी. (रॉयटर्स)

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी. (रॉयटर्स)

आडवाणी और वाजपेयी के बीच में किस तरह का विशिष्ट बंधन रहा है इसे गोविंदाचार्य से बढ़िया और कौन समझा सकता है. गोविंदाचार्य ने आरएसएस के नेता भाऊराव देवरस और आडवाणी के बीच मध्यस्थता की थी और आडवाणी को ये मनाने में कामयाब हुए थे कि 1991 के लोकसभा चुनावों के बाद वो लोकसभा में नेता विपक्ष का पद स्वीकार कर लें. आडवाणी जोर दे रहे थे कि नेता विपक्ष का पद अटल बिहारी वाजपेयी को दिया जाए क्योंकि वो न केवल इस पद के योग्य हैं बल्कि इसका उन्हें पर्याप्त अनुभव भी है आडवाणी को 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने के बाद नेता विपक्ष का पद छोड़ना पड़ा था और उसके बाद वाजपेयी को ये पद मिला.

आडवाणी ने वाजपेयी को पीएम उम्मीदवार घोषित कर चौंका दिया था

1993 की गोवा की नेशनल एग्जीक्यूटिव की मीटिंग में आडवाणी ने बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर वाजपेयी का नाम घोषित करके सबको चौंका दिया था. चौंकने वालों में आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व भी शामिल था. आरएसएस की तरफ से इस तरह का फैसला पूरी तरह से अपने संगठन और उससे जुड़े सहयोगी संगठनों से गहन विचार विमर्श के बाद लिया जाता है. लेकिन आडवाणी की बिना किसी से विचार विमर्श के ऐसी बड़ी घोषणा करना उनकी उत्कृष्ट राजनीतिक समझ को दर्शाता था.

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बाद में कई बातचीत में उन्होंने इस बात का मतलब समझाते हुए कहा कि, 'भारत जैसे विशाल देश का नेतृत्व समग्र व्यक्तित्व वाले वाजपेयी जैसे व्यक्ति ही कर सकते हैं.' वाजपेयी के साथ अपने संबंधों के बारे में बात करते हुए आडवाणी बताते हैं कि उनके और वाजपेयी के बीच कभी भी किसी तरह की प्रतियोगिता नहीं रही है बल्कि सहयोग का संबंध रहा है. वाजपेयी को हमेशा उन्होंने एक ऐसे वरिष्ठ के नजर से देखा है जिनकी बातों का सम्मान किया जाना चाहिए.

फोटो रॉयटर्स से

फोटो रॉयटर्स से

वाजपेयी ने खुद आडवाणी के साथ अपने संबंधों का वर्णन आडवाणी की किताब ‘माय कंट्री, माय लाइफ’ की भूमिका में किया है. वाजपेयी लिखते हैं, 'ये सही है कि हमारे लंबे समय के जुड़ाव के दौरान कई ऐसे मौके आए जब कई मुद्दों पर हमारे आपसी विचार मेल नहीं खाते थे. क्योंकि ऐसा संभव नहीं है कि दो अलग-अलग व्यक्तित्व के लोगों का विचार लगभग पांच दशकों तक एक साथ, एक ही संगठन में काम करने के दौरान एक ही होगा. लेकिन दरअसल ये मतभिन्नता न होकर कार्यों के उद्देश्य को लेकर एकजुटता होती है जिससे हमारा संबंध बंधा हुआ होता है. अलग-अलग विचारों के बावजूद हमारा आपसी मनभेद कभी नहीं होता है और न ही कभी ये बंटवारे का आधार बनता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी पार्टी, पहले जनसंघ और बाद में बीजेपी बड़े उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मिलकर एक साथ काम करने में विश्वास करती है. मैं मानता हूं कि इसी दर्शन के आधार पर ही बीजेपी हमेशा एकजुट रही है जो कि भारतीय राजनीति में अपवाद सरीखी है क्योंकि यहां के अधिकतर दलों में संगठनात्मक बंटवारे की बात आम है.'

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भारतीय राजनीतिक इतिहास में अटल-आडवाणी की जोड़ी की दोस्ती एक विशिष्ठ स्थान रखती है. इस दोस्ती में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या, आगे बढ़ने की चाहत जैसी कोई बात नहीं थी जैसी की अन्य जगहों पर पावर पॉलिटिक्स में रहती है. इन दोनों ने भारतीय जनता पार्टी के लिए मजबूत नींव का निर्माण किया है और यही वजह है कि आज बीजेपी भारतीय राजनीति के शीर्ष पर काबिज है और वो अखिल भारतीय स्तर की पार्टी में तब्दील हो चुकी है.

पार्ट-1ः वाजपेयी के अनसुने किस्से (पार्ट-1): आखिर क्या है आडवाणी के साथ 3 घंटे तक चले लंच का राज?

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