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क्या राहुल गांधी अपने पिता वाली गलती दोहरा रहे हैं?

राहुल गांधी जो कर रहे हैं, वह सॉफ्ट हिंदुत्व का ओवर डोज़ है. इसका उन्हें कुछ तात्कालिक लाभ मिल सकता है लेकिन दीर्घकालिक राजनीति के लिए यह अच्छा नहीं है

Updated On: Nov 03, 2018 10:51 AM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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क्या राहुल गांधी अपने पिता वाली गलती दोहरा रहे हैं?
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वह अस्सी का दशक था. मिस्टर क्लीन की इमेज रखने वाले राजीव गांधी की सरकार बहुत लोकप्रिय थी. अचानक बोफोर्स रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार का आरोप सामने आया और देखते-देखते राजीव गांधी की तकदीर का सितारा बुझ गया.

एक रक्षा सौदे ने पिता की कुर्सी ली थी. दूसरे रक्षा सौदे को हथियार बनाकर करीब 30 साल बाद बेटा सत्ता हासिल करना चाहता है. बोफोर्स ने नेहरू-गांधी परिवार को जो जख्म दिया था, उसका उपचार राहुल गांधी राफेल रक्षा सौदे में ढूंढ रहे हैं. लेकिन बोफोर्स और राफेल की तुलना इस लेख का विषय नहीं है. हम यहां बात उस ऐतिहासिक गलती की कर रहे हैं, जो राजीव गांधी ने की थी और अब राहुल गांधी भी उसे दोहराते नजर आ रहे हैं.

राजीव गांधी के दौर में कांग्रेस एक ऐसी पार्टी थी, जिसे देश के ज्यादातर धार्मिक और जातीय समूहों का समर्थन प्राप्त था. विपक्ष की भूमिका में कुनबों में बंटा पूर्व जनता परिवार और कम्युनिस्ट पार्टियां थीं. 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के पास लोकसभा की सिर्फ दो सीटें थीं और अपनी राजनीतिक जमीन पुख्ता करने के लिए वह मुद्दों की तलाश में जुटी थी. ऐसे में बतौर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दो बड़ी गलतियां कीं. ये दोनों गलतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं और इनकी वजह से देश की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई.

राजीव की ऐतिहासिक भूल

राजीव ने पहली गलती बहुचर्चित शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना था. शाहबानो मध्य-प्रदेश की रहने वाली एक बुजुर्ग मुस्लिम महिला थीं, जिन्हें उनके पति ने `तीन तलाक’ दे दिया था. भरण पोषण के लिए मुआवजा मांग रही शाहबानो ने आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से मुकदमा जीत लिया.

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इसके बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों ने शोर मचाना शुरू किया और अदालती फैसले को मजहबी मामलों में हस्तक्षेप बताया जाने लगा. राजीव गांधी के कुछ सलाहकारों ने उन्हें समझाया कि सरकार को मुसलमानों की भावना का आदर करना चाहिए. बस फिर क्या था, एक संविधान संशोधन लाकर कांग्रेस की सरकार ने अदालती फैसले को पलट दिया.

लेकिन ऐसा करने से मामला सुलझने के बदले और उलझ गया. राजीव गांधी पर कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकने का इल्जाम लगने लगा और सरकार की धर्मनिरपेक्ष छवि को गहरी चोट पहुंची.

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राजीव को लगा कि मुस्लिम तुष्टीकरण के इल्जामों से पीछा छुड़ाना मुश्किल होता जा रहा है, तो उन्होंने एक दूसरा रास्ता निकाला और यह उनकी ज्यादा बड़ी भूल साबित हुई. 'लोहा, लोहे को काटता है’ वाले अंदाज में उन्होंने मुसलमानों के बाद हिंदुओं को रिझाने का फैसला किया.

फैजाबाद के विवादास्पद बाबरी मस्जिद परिसर पर बरसों से ताला जड़ा था. आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों का कहना था कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म यहीं हुआ था, इसलिए यह परिसर हिंदुओं को सौंप देना चाहिए. राजीव गांधी ने विवादास्पद परिसर का ताला खुलवा दिया.

इस फैसले ने दो सीटों वाली बीजेपी के लिए संजीवनी का काम किया. लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी ने राम मंदिर का आंदोलन छेड़ दिया. सच पूछा जाए तो 1989 के चुनाव में कांग्रेस की हार के लिए बोफोर्स के साथ हिंदुवादी राजनीति का उभार भी जिम्मेदार था. राजीव गांधी के बाद प्रधानमंत्री बने वी.पी. सिंह ने हिंदुत्वादी राजनीति की काट निकालने के लिए रातो-रात मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर दीं. इसके बाद देश की राजनीति मंडल बनाम कमंडल की राह पर चल पड़ी और कांग्रेस दोबारा कभी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई.

rajiv gandhi

राजीव का तुष्टीकरण और राहुल का सॉफ्ट हिंदुत्व

अपनी खोई हुई ताकत हासिल करने के लिए कांग्रेस का संघर्ष जारी है. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी अब तक राष्ट्रीय नेता के रूप में वह स्वीकार्यता हासिल नहीं कर पाए हैं, जिसकी उम्मीद कांग्रेस को थी. ऐसे में राहुल ने अचानक एक ऐसा रास्ता अख्तियार कर लिया है, जो कई लोगों के लिए चौकाने वाला है. राहुल गांधी अब नीति, कार्यक्रम और गर्वनेंस के मुद्दे उठाने के साथ अपनी हिंदू पहचान भी जोर-शोर से उजागर कर रहे हैं.

इसकी शुरुआत पिछले साल गुजरात के विधानसभा चुनाव से हुई थी. जब राहुल अनगिनत मंदिरों के चक्कर काटते और लगभग हर जनसभा में अगरबत्ती जलाते नजर आए. सिलसिला और आगे बढ़ा और वे हिंदुओं के सबसे दुर्गम तीर्थ कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर आए. कांग्रेस पार्टी ने जोर-शोर से दावा किया राहुल पूरी तरह कर्मकांडी हैं.

सबूत के तौर पर जनेउ वाली उनकी तस्वीरें भी जारी की गईं. बीजेपी के उलट राहुल हिंदू अस्मिता के किसी सवाल को आक्रमकता से नहीं उठा रहे हैं. राम मंदिर जैसे सवालों से भी बच रहे हैं. लेकिन तिलक से लेकर पूजा पाठ तक प्रतीकों के सहारे यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे एक आस्थावान हिंदू हैं.

राहुल का राजनीतिक सफर 2004 के लोकसभा चुनाव के साथ शुरू हुआ था. उसके बाद से कांग्रेस पार्टी लगातार दो बार गठबंधन के सहारे सत्ता में आई और राहुल गांधी की हैसियत एक बेहद ताकतवर राजनेता की रही. उस दौरान राहुल गांधी ने कभी इस तरह अपनी हिंदू पहचान पर ज़ोर नहीं दिया. 2014 के चुनाव में कांग्रेस का मुकाबला नरेंद्र मोदी से था, जिन्हें विकास चाहने वालों के अलावा कट्टर हिंदुवादियों का भी भरपूर समर्थन था. उस दौरान भी राहुल ने अपने चुनावी रैलियों में हिंदू पहचान का सहारा नहीं लिया. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि राहुल गांधी ` घोषित हिंदू’ हो गये. इसका जवाब 2014 के नतीजों में छिपा है.

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ऐतिहासिक रूप से सबसे खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस ने हार कारणों की समीक्षा शुरू की. ए के एंटनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में पार्टी की `हिंदू विरोधी छवि’ को भी हार के एक कारण के रूप में चिन्हित किया. खुद को एक उदार हिंदू नेता के रूप में बदलने की राहुल गांधी की कोशिशें इसी एंटनी रिपोर्ट का नतीजा है.

बीजेपी राम के नाम पर राजनीति करती है. राहुल गांधी बड़ी होशियारी से शिवभक्ति की तरफ मुड़ गए. इसके दो फायदे हुए. पहला यह कि उनपर सीधे-सीधे बीजेपी की नकल का इल्जाम नहीं लगेगा. दूसरे हिंदू माइथोलॉजी में शिव का स्थान बहुत ऊंचा है और देश के करोड़ों लोग उनमें गहरी आस्था रखते हैं.

Congress President Rahul Gandhi in Ujjain Ujjain: Congress President Rahul Gandhi offer prayers with Madhya Pradesh Congress chief Kamal Nath and party's state campaign committee chairman Jyotiraditya Scindiaat Mahakaleshwar temple during his two-day tour to Malwa-Nimar region, in Ujjain, Monday, Oct 29, 2018. (PTI Photo)(PTI10_29_2018_000080B)

राहुल की रणनीति से बीजेपी बेचैन क्यों है?

यह सच है कि पिछले एक-डेढ़ साल में राहुल गांधी का राजनीतिक कद बढ़ा है. अलग-अलग सर्वे प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में हल्की गिरावट की तरफ इशारा कर रहे हैं. दूसरी तरफ राहुल का ग्राफ तेजी से उपर चढ़ा है. बेशक लोकप्रियता के मामले में वे अब भी प्रधानमंत्री मोदी से पीछे हों लेकिन इतना साफ है कि अब उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता है.

क्या इस लोकप्रियता के पीछे राहुल गांधी की नई छवि का भी योगदान है? इसका जवाब बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रियाओं में छिपा है. पार्टी का आईटी सेल राहुल को नकली हिंदू साबित करने के लिए कैंपेन चला रहा है. हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ कह चुके हैं कि राहुल गांधी पूजा करते हैं तो लगता है कि नमाज पढ़ रहे हैं. बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा राहुल गांधी का गोत्र पूछ चुके हैं.

बीजेपी बेचैन बिना वजह नहीं है. यह सच बात है कि देश की आबादी का एक हिस्सा, भले ही वह बहुत बड़ा ना हो, नेहरू-गांधी परिवार का मुरीद रहा है. गांधी सरनेम के साथ अगर हिंदू आइडेंटिटी जुड़ती है तो इसका एक अलग असर होता है. बीजेपी हाल के दिनों में दलित और ओबीसी वोटरों की तरफ ज्यादा झुकी नजर आई है. इससे सवर्ण वोटरों का बड़ा तबका पार्टी से नाराज़ है. ऐसे में `घोषित ब्राहण’ के रूप में राहुल गांधी की सक्रियता यकीनन बीजेपी नेताओं की नींद उड़ाएगी. अब सवाल यह है कि अगर सॉफ्ट हिंदुत्व राहुल गांधी के पक्ष में काम कर रहा है, तो फिर इस रास्ते पर चलना गलती किस तरह माना जा सकता है?

इसका उत्तर ज्यादा मुश्किल नहीं है. पहली बात यह कि धर्म बीजेपी का नेचुरल टर्फ है, वहां जाकर उससे टक्कर लेना और जीत पाना मुमकिन नहीं है. असली हिंदू और नकली हिंदू की बहस एक ऐसा एजेंडा है जो बीजेपी के लिए पूरी तरह मुफीद है. पार्टी की पूरी कोशिश इस बहस को आगे ले जाने की है. दूसरी तरफ राहुल गांधी अपनी हिंदूवादी पहचान कायम रखते हुए सरकार की आर्थिक नाकामी और कथित भ्रष्टाचार जैसे मुद्धों पर उसे घेरना चाहते हैं. भारतीय राजनीति का इतिहास यह बताता है कि धर्म का सवाल जब भी बड़ा होता है, बाकी चीज़ें पीछे छूटने लगती हैं. ऐसे में राहुल गांधी धर्म की पिच पर आकर अपने पॉलिटिकल स्ट्रोक भला किस तरह खेल पाएंगे? बीजेपी ने राम-मंदिर का सवाल राहुल की तरफ उछालना शुरू कर दिया है.

मंदिर पर प्राइवेट मेंबर बिल लाने की तैयारी कर रहे बीजेपी सांसद राकेश सिन्हा ने राहुल गांधी को चुनौती दी है कि अगर वे सच्चे हिंदू हैं तो इस बिल का समर्थन करके दिखायें. अब राहुल इसका क्या जवाब देंगे?

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क्या अब राजनीति कभी धर्म से अलग नहीं हो पाएगी?

हार्डकोर हिंदुत्व और सॉफ्ट हिंदुत्व की बहस में कांग्रेस जैसी पार्टियां यह भूल चुकी हैं कि भारत मूलत: एक धर्मनिरपेक्ष देश है. देश के सेक्यूलर ढांचे को बनाए रखना हर नागरिक और हर पार्टी की संवैधानिक जिम्मेदारी है. बीजेपी धर्मनिरपेक्षता पर हमेशा से सवाल उठाती रही है. दूसरी तरफ कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता को लेकर प्रतिबद्ध होने का दावा करती आई है.

केंद्र और उसके बाद अलग-अलग राज्यों में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद लगातार बहुत सी ऐसी घटनाएं हुईं हैं, जिन्हें धर्मनिरपेक्षता पर प्रहार माना जा सकता है. चाहे वह गौरक्षा के नाम पर होने वाली मॉब लिचिंग हो या फिर हरियाणा और यूपी में अल्पसंख्यकों के प्रति सरकार का रवैया, घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरसंघचालक मोहन भागवत तक को घुमा-फिराकर इन मामलों की निंदा करनी पड़ी है. लेकिन कांग्रेस का रूख क्या है?

कांग्रेस ज्यादातर मामलों में खुलकर बोलने से परहेज करती रही है. पार्टी को यह लगता है कि अगर मौजूदा माहौल में कोई मामला हिंदू-मुसलमान का बना तो उसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा. तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए यह स्टैंड ठीक हो सकता है. लेकिन उन सिद्धांतों का क्या जिसकी दुहाई कांग्रेस देती आई है?

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राहुल गांधी चाहते तो यह कह सकते थे कि वे एक आस्थावान हिंदू हैं. लेकिन आस्था उनके लिए व्यक्तिगत चीज है. राजनीति मुद्धों पर होनी चाहिए, धार्मिक भावनाओं पर नहीं. मगर राहुल ने ऐसा नहीं किया बल्कि वे जो कर रहे हैं, वह सॉफ्ट हिंदुत्व का ओवर डोज़ है. इसका असर आनेवाले दिनों की राजनीति पर होगा. बिना भगवान का नाम लिए और धार्मिक पहचान बताए कोई इस देश में राजनीति कर ही नहीं पाएगा. अगर यह बात समझनी हो तो पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की तरफ देखना चाहिए, जिसे जिन्ना सेक्यूलर बनाना चाहते थे और धीरे-धीरे वह तालिबानी हो गया. इस लिहाज से राहुल गांधी की राजनीतिक नादानी अगर अपने पिता जितनी बड़ी नहीं है, तो बहुत मामूली भी नहीं है.

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