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विधानसभा चुनाव 2017: राज्यों के निर्णायक सीटों के नतीजों से पलट सकता है पासा

पांच फीसदी के वोट के अंतर से कोई भी जीत कड़े संघर्ष का नतीजा माना जा सकता है

Aprameya Rao Updated On: Feb 07, 2017 02:31 PM IST

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विधानसभा चुनाव 2017: राज्यों के निर्णायक सीटों के नतीजों से पलट सकता है पासा

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज है. पंजाब और गोवा में चुनाव निपट चुके हैं लेकिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर की सियासत का असली खेल देखना अभी बाकी है.

यूपी जो देश का सबसे बड़ा राज्य है, वहां सभी राजनीतिक दलों के लिए सियासी मुकाबला काफी अहम है. यूपी का सियासी समीकरण जहां किसी भी भारतीय के लिए तमाम जटिलताओं और अस्थिरताओं से भरा है, वहीं बीबीसी जैसे विदेशी मीडिया हाउस ने यूपी की तुलना ब्राजील से की है.

पंजाब में त्रिकोणीय मुकाबला देखा जा रहा है. यहां आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी गठबंधन के बीच सत्ता की लड़ाई है.

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गोवा जहां 40 विधानसभा सीटें हैं. वहां भी मुकाबला त्रिकोणीय रहा. गोवा में चुनावी दंगल में सत्ताधारी बीजेपी के अलावा कांग्रेस और एमजीपी के नेतृत्व वाला नया गठबंधन ताल ठोंकते नजर आए.

उत्तराखंड जहां पिछले साल राजनीतिक अस्थिरता थोड़े वक्त के लिए हावी रही. वहां कांग्रेस और बीजेपी के बीच सत्ता की सीधी लड़ाई है. जबकि मणिपुर, जहां कि लंबे वक्त से आर्थिक नाकेबंदी ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा रखीं हैं वहां चुनावी मुकाबला मयती बनाम नागा विरोधियों के बीच है.

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यूपी का सियासी समीकरण  देश के सभी राज्यों से ज्यादा जटिल माना जाता है (पीटीआई)

वैसे तो मतदान से पहले विरोधी पार्टियां सत्ता तक पहुंचने की हर मुमकिन कोशिश में जुटी हुई है. लेकिन 11 मार्च को जब चुनाव के नतीजे सामने आएंगे तो ये राजनीतिक विश्लेषकों के साथ साथ उम्मीदवारों के लिए भी हैरानी का सबब हो सकती हैं.

कड़ा मुकाबला

चुनाव में कड़ा संघर्ष किसी भी उम्मीदवार के लिए तनावपूर्ण होता है. कांग्रेस सांसद शशि थरूर का ही मामला देखें. साल 2014 लोकसभा चुनाव में तिरुअनंतपुरम से बीजेपी उम्मीदवार ओ राजागोपाल के खिलाफ एक कड़े मुकाबले में उन्हें जीत हासिल हो सकी थी.

इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि कड़े सियासी मुकाबले में भी कई बार हैरान करने वाले नतीजे निकले हैं.

अंतरराष्ट्रीय चुनाव एजेंसी सी वोटर के डायरेक्टर और मशहूर चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख साल 2008 के राजस्थान विधानसभा चुनाव का हवाला देते हैं. तब कांग्रेस के दिग्गज सीपी जोशी को बीजेपी के कल्याण सिंह चौहान ने एक कड़े सियासी मुकाबले में हराया था.

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हैरानी इस बात को लेकर हुई कि तब कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सीपी जोशी महज एक वोट के कारण चुनाव हार गए थे. हालांकि, इस कहानी का अंत एंटी क्लाइमेक्स से तब हुआ जब कि राजस्थान हाईकोर्ट ने इस चुनाव को निरस्त करने का फैसला सुनाया था.

ऐसे सियासी मुकाबले प्रजातंत्र का अभिन्न हिस्सा होते हैं. उत्तरपूर्वी भारत के राज्यों में भी वोटों के बेहद कम अंतर से चुनाव जीतने के कई मिसाल मिलते हैं. पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी के मुताबिक, 'छोटे राज्यों में वोट के कम अंतर से चुनाव जीतना बड़ा फर्क पैदा कर सकती है.'

बीएसपी

यहां के चुनावों में  क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व रहता है जिस कारण मुकाबला कड़ा होता है

अब मिसाल के तौर पर इसे देखें. पिछले वर्ष हुए मणिपुर विधानसभा चुनाव के 60 में से 20 सीटों पर जिन उम्मीदवारो ने जीत हासिल की उनके वोट का अंतर महज 1000 वोट था. जबकि 07 उम्मीदवारों की जीत का अंतर महज 2 फीसदी वोट था. जबकि हियांगलाम विधानसभा सीट पर सबसे कम 17 वोट के अंतर से उम्मीदवार की जीत हुई थी.

छोटी विधानसभा

फर्स्टपोस्ट को यशवंत देशमुख ने बताया कि, 'उत्तर पूर्वी राज्यों में विधानसभा इतनी छोटी होती हैं कि 1000-2000 वोट के अंतर का मतलब काफी बड़ा होता है. पांच फीसदी के वोट के अंतर से कोई भी जीत कड़े संघर्ष का नतीजा माना जा सकता है.'

इसी तरह अगर गोवा की बात करें तो यहां भी कई विधानसभा सीटों पर मुकाबला बेहद कड़ा और रोचक रहा है. कई सीटों पर जीत का अंतर पांच फीसदी वोट से भी कम देखा गया है.

यूपी के 403 विधानसभा सीटों में से 106 विधायकों की जीत महज तीन फीसदी वोट के अंतर से सुनिश्चित हो पाई थी. विधानसभा की कुल सीटों की ये एक चौथाई से कुछ ज्यादा सीटें होती हैं. और अगर इसमें उन विधायकों को भी शामिल कर लिया जिनके जीत का अंतर पांच फीसदी से कम था तो ये सूची और लंबी हो जाती है.

किसी एक सीट पर विरोधियों के बीच सियासी दंगल के कभी ज्यादा दिलचस्प हो जाने की भी अपनी कई वजह है.

Defence Minister Manohar Parrikar

गोवा जैसे राज्य में  कई चुनाव क्षेत्र अन्य राज्यों के बनिस्पत छोटे होते हैं

गठबंधन युग में सियासी समीकरण दुरुस्त करने के लिए प्रमुख राजनीतिक दल अब छोटे दलों के साथ चुनावी गठजोड़ करने से हिचकते नहीं हैं. खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और तामिलनाडु जैसे राज्यों में जहां राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जाति और धर्म की भूमिका अहम होती है.

ऐसे में अगर प्रमुख राजनीतिक दल सही सियासी समीकरण बैठा पाने में कामयाब नहीं होते हैं तो वोटरों के लहर का फायदा उन्हें नहीं मिल पाता है.

देशमुख इसकी एक और वजह बताते हैं. सुरक्षित माने जाने वाले सीट पर मजबूत विरोधी उम्मीदवार का होना. उनकी राय में ऐसे विरोधी उम्मीदवार वोट शेयर का खेल बिगाड़ सकते हैं जो जीत के अंतर के लिए घातक हो सकता है. इस वजह से भी चुनावी नतीजे अस्थिर हो सकते हैं.

हालांकि, ज्यादा विशेषज्ञों का मानना है कि दो मजबूत उम्मीदवारों के बीच जब वोट बंट जाते हैं तो जीत का अंतर कम हो जाता है.

वोटों का बंटवारा

2006 से 2009 के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एन गोपालस्वामी का कहना है कि, बिहार और यूपी जैसे राज्यों में जीत के अंतर में कमी की सबसे बड़ी वजह वोट बंटना है. वे कहते हैं, 'यूपी को ही देख लीजिए, यहां तीन पार्टियों को 28, 26 और 20 फीसदी वोट मिल सकते हैं. इस तरह 74 फीसदी वोट इन्हीं पार्टियों के बीच बंट जाएगा. ऐसे में महज दो फीसदी के अंतर से ही विजेता चुना जाएगा.'

Agra: Congress leader Rahul Gandhi and Samajwadi Party President Akhilesh Yadav during a road show in Agra on Friday. PTI Photo (PTI2_3_2017_000244B)

यूपी में गठबंधन की सूरत में वोटों का बंटवारा होना तय है (तस्वीर-पीटीआई)

पूर्व नौकरशाह का मानना है कि गुजरात और केरल जैसे राज्यों में सियासी मुकाबला दोतरफा होता है. बावजूद इसके एक-एक वोट काफी निर्णायक होता है. (कांग्रेस बनाम बीजेपी और लेफ्ट बनाम यूडीएफ के बीच संघर्ष)

हालांकि, दिल्ली में मौजूद एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस के प्रमुख जगदीप चोकर का मानना है कि, चुनावी दंगल में इससे फर्क नहीं पड़ता कि उम्मीद दो या दो से अधिक हैं. 'अगर सभी उम्मीदवार समान हैं तो भी जीत का अंतर कम हो जाता है.'

यूपी के सियासी अखाड़े में कई राजनीतिक दल अपना दांव आजमा रहे हैं. यहां सत्ताधारी समाजवादी पार्टी, प्रमुख विपक्षी दल बीएसपी, मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला है. ऐसे में नारायणस्वामी का बयान सही साबित हो सकता है.

जीत का कम अंतर

एफपीटीपी यानी 'फर्स्ट पास्ट द पोल' सिस्टम के समर्थकों का मानना है कि जीत आखिर जीत होती है. चाहे एक वोट से हो या फिर ज्यादा मतों के अंतर से. ये प्रजातंत्र के 'वेस्टमिनिस्टर मॉडल' थीम की ओर संकेत करता है.

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यूपी का तीन तिहाई वोट तीन बड़ी पार्टियों के बीच बंट जाता है

इस बहस में कुरैशी ‘प्रपोरश्नल रिप्रेजेंटेशन’ की बात को शामिल करते हैं. इस तरह की प्रजातांत्रिक व्यवस्था इजरायल और पश्चिमी देशों में मिलती है. 2014 के लोकसभा में बहुजन समाज पार्टी की ओर कुरैशी ध्यान दिलाना चाहते हैं.

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1971 बैच के आईएएस अधिकारी कुरैशी का कहना है कि, 'बीएसपी तब पूरे देश भर में वोट शेयर के मामले में तीसरे स्थान पर थी. यूपी में कुल मतदान का 20 फीसदी पार्टी को मिला था. बावजूद इसके पार्टी एक भी सीट यूपी में नहीं जीत सकी थी.'

व्यवस्था की तमाम खामियों के बावजूद देशमुख का कहना है कि कम अंतर से किसी विधानसभा सीट पर किसी उम्मीदवार की जीत प्रजातंत्र की खूबसूरती है. उनका कहना है कि एक वोट से कोई उम्मीदवार जीतता है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए.

काबिल चुनाव आयोग 

कुरैशी का मानना है कि चुनाव आयोग ने मतदाताओं को जागरुक करने का जो अभियान चलाया है उसका सकारात्मक असर हुआ है. उनका मानना है कि इसकी वजह से भी परोक्ष तौर पर तो नहीं, लेकिन अपरोक्ष तौर पर किसी सीट पर उम्मीदवार के जीत का अंतर कम होता है.

देशमुख भी चुनाव आयोग की कोशिशों की तारीफ करते हैं. पूरी दुनिया में चुनाव आयोग सबसे प्रभावी और भरोसेमंद चुनावी संस्था है. हालांकि, उनका कहना है कि चुनाव में बंपर वोटिंग और जीत के अंतर के बीच कोई वास्तविक संबंध नहीं होता है.

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चुनाव आयोग के अनुसार  ईवीएम मशीनों ने इन गड़बड़ियों को काफी कम किया है

इस सवाल पर कि क्या चुनाव में गड़बड़ी कर क्या ये मुमकिन है कि चुनाव में पीछे चल रहे उम्मीदवार की किस्मत बदल सकती है? इस सवाल के जवाब में चुनाव विश्लेषक का मानना है कि ईवीएम के इस्तेमाल और बूथ कैप्चरिंग के खिलाफ सख्त कार्रवाई ने इस खतरे को काफी हद तक टाल रखा है.

कुरैशी का कहना है कि पुर्नमतदान ने भी ऐसी मतदान में होने वाली ऐसी गड़बड़ियों को कम किया है.

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अंतिम दो दशकों में करीब दो तिहाई मौजूदा विधायक और सासंदों ने चुनाव में हार का मुंह देखा है. जबकि, सी वोटर के चीफ एडिटर का कहना है कि 90 फीसदी चुनाव में सत्ताधारी पार्टी का फिर से चुना जाना मुमकिन नहीं हो सका है...और अगर यही ट्रेंड 2017 के चुनाव में देखा जाता है तो हमें काफी रोचक नतीजे देखने को मिल सकते हैं.

फर्स्टपोस्ट ने उत्तराखंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश और गोवा के 2012 विधानसभा चुनाव नतीजों की समीक्षा की है. इसके साथ ही यहां के उन विधानसभा सीटों की भी समीक्षा की है जहां वोटों का अंतर काफी कम रहा है. ऐसा पूरे राज्य में देखा गया है. नीचे दिए गए मैप से इस बात को समझना आसान होगा.

गोवा

गोवा में पिछले विधानसभा चुनाव में महज चार सीटें ऐसी थीं जहां जीत का अंतर एक हजार वोट से कम था. हालांकि, ये पहली बार नहीं हुआ था. इस राज्य के चुनावी इतिहास में कई ऐसे मौके देखे गए हैं जब एक उम्मीदवार ने चुनाव बेहद कम अंतर से जीता हो. गोवा में जीत के कम अंतर की मिसाल और भी देखने को मिलेगी.

पंजाब

इस सीमावर्ती राज्य में पिछले विधानसभा चुनाव में 33 विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां जीतने वाले उम्मीदवार के जीत का अंतर 4000 वोट से भी कम रहा. तो ये अंतर 3 फीसदी से भी कम था..लेकिन इस बार यहां कई चौंकाने वाले नतीजे आ सकते हैं.

उत्तर प्रदेश

403 विधानसभा सीटों वाले देश के सबसे बड़े राज्य में इस बार के चुनावी नतीजे हैरान करने वाले हो सकते हैं. 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां 100 से ज्यादा ऐसी सीटें थीं जिनमें जीत का अंतर 6000 मत या 3 फीसदी से भी कम था.

उत्तराखंड

इस पहाड़ी राज्य में 70 विधानसभा की सीटें है. 2012 में जब यहां चुनाव हुए थे तब यहां की 19 विधानसभा सीटो पर उम्मीदवारों की जीत का अंतर 2000 वोट से कम या तीन फीसदी से कम रहा था.

मणिपुर

बावजूद इसके कि इस पूर्वोत्तर राज्य में कम मतदाता हैं लेकिन दूसरे राज्यों से ये अलग नहीं है. यहां की भी एक तिहाई सीटों पर उम्मीदवारों के जीत का अंतर 1000 वोट से कम था. जबकि हियंगलाम विधानसभा सीट पर जीत का अंतर सबसे कम 17 वोट था.

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