S M L

एक 'खाऊ' वोटर को 'खिलाऊ' नेता का खुला खत

भारत की राजनीति में चुनाव जीतने के लिए 'कंबल, दारू और चिकन' का फॉर्मूला भरोसमंद है

Tarun Kumar Updated On: Feb 17, 2017 09:49 AM IST

0
एक 'खाऊ' वोटर को 'खिलाऊ' नेता का खुला खत

चुनाव का समय है. सौगातें बांटी-परोसी जा रही हैं. जनता की नजर में औसतन नेताओं की नैतिक बिसात शून्य है. ऐसे में मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा त्वरित सुविधाएं बटोरकर अपने वोट की कीमत वसूल लेने के पुराने फार्मूले में आज भी आस्था रखता है. ऐसे ही एक वोटर की 'मांगों' वाली चिट्ठी का जवाब दे रहे हैं नेताजी-

महानुभाव भोलाराम भावुक जी करबद्ध प्रणाम!

अभी-अभी चुनावी दौरे से लौटा हूं. दो दिनों से मेज पर पड़े आपके खत को पढ़ने का वक्त मुश्किल से निकाल पाया हूं. भोलाराम जी, एक तरफ आपका खत विडंबनाओं-अंतर्विरोधों का दिलचस्प पुलिंदा है, तो दूसरी ओर यह आपकी कड़क व्यवहारिक सोच को साक्षात दर्शाता है!

पहले तो नैतिक नेतागीरी के लुटिया-डूब खतरों से आपको वाकिफ करा दूं! आपको याद होगा, पिछली बार हमने कंबल-दारू-चिकन का भरोसमंद फॉर्मूला त्यागकर संपूर्ण स्वच्छता से चुनाव लड़ा था. चुनावी मंचों से विवेकानंद, गांधी, लोहिया, पटेल सभी को याद कर पवित्र चुनावी माहौल बनाने की कोशिश की थी.

मेरे विरोधी भी भौंचक्के थे! मैं एक पवित्र गाय बनकर आपके बीच गया था! मेरे खिलाफ कई बाहुबली मैदान में थे! वे सभी पुराने आजमाए फॉर्मूले पर अडिग थे. मुर्गा, दारू, बंदूक, धौंसपट्टी, जोड़-तोड़ पर उनका भरोसा कायम रहा.

People wave towards a helicopter carrying Hindu nationalist Narendra Modi, the prime ministerial candidate for India's main opposition Bharatiya Janata Party (BJP), after an election campaign rally at Mathura in the northern Indian state of Uttar Pradesh April 21, 2014. Around 815 million people have registered to vote in the world's biggest election - a number exceeding the population of Europe and a world record - and results of the mammoth exercise, which concludes on May 12, are due on May 16. REUTERS/K. K. Arora (INDIA - Tags: POLITICS ELECTIONS TPX IMAGES OF THE DAY) - RTR3M2UN

मुझे लगा सियासी स्वच्छता में आस्था रखने वाली जनता हमें सिर आंखों पर बिठाएगी. मैं राजनीतिक मर्यादा और नैतिकता का प्रतीक पुरूष बनकर विधानसभा पहुंचूंगा. पर हुआ इसका उल्टा! जमानत जब्त हो गई! साढ़े तीन सौ वोट मिले!

चेहरा छुपाना मुश्किल हो गया! घर वालों और चमचों की नज़र में महामूर्ख और पगला बन गया! सगे-संबंधियों ने दूरी बना ली. विरोधियों की नजर में हंसी का पात्र बन गया! अगले पांच साल के ऐश-ओ-आराम पर पानी फिर गया. हार ने माथे को झटका दिया. काश! दारू-मुर्गा-कंबल वाले कारगर फॉमूले पर भरोसा किया होता! न सिर्फ विधायकी गई, पिछले दौर की विधायकी में कमाई पूंजी भी डूब गई!

जब मतदाता को ही स्वच्छ राजनीति का फॉर्मूला पसंद नहीं तो मैं कौन होता हूं कंधे पर गांधीवाद को ढोने वाला! मेरे बाल-बच्चे हैं. अपना और उनका भविष्य क्यों चौपट करूं?

मुझे अपार खुशी है कि वोटतंत्र के खाऊ-पकाऊ चरित्र को आप समझने लगे हैं! मतदान के माहौल में आपका मुंह सुरसा की तरह फटना लाजिमी है! सुख का ऐसा रेला वाकई बार-बार नहीं आता है! आपकी यह टेढ़ी लंबी लिस्ट स्वीकार्य है! आपकी ही नहीं, आपकी तरह कई औरों की भी. इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहता!

दारू, कंबल, बनियान, चिकन से अपने वोट एक्सचेंज करने वाले हर वोटर से मुझे मिलवाइए. मां कसम, कोई कमी नहीं रहेगी! विधायकी सुख से वंचित नेता की पीड़ा आप जैसे शुभचिंतक न समझेंगे तो कौन समझेगा!

NEW DELHI, INDIA - MAY 16: A man hands out money as supporters celebrate election results in front of the headquarters of the Congress Party on May 16, 2009 in New Delhi, India. Senior BJP leader Arun Jaitley has admitted defeat in the Indian general election. Television networks are reporting that India's Prime Minister Manmohan Singh's Congress Party appear to be heading for a victory as votes were counted on Saturday. (Photo by Keith Bedford/Getty Images)

आपने राजनीति में नैतिकता-मर्यादा के लुप्त हो जाने का ठीकरा हमारे सिर पर फोड़ा है. मानो हम इस समाज से नहीं, आकाश से टपके हों! हम किसके कंधे पर चढ़कर पंचायत, विधानसभा और संसद की मेंबरी हासिल करते हैं? जनता ही तो हमें चुनती है न? वही जनता, जो अपराध के कई संस्करणों में संलिप्त शहाबुद्दीन के स्वागत में सैकड़ों गाड़ियों का काफिला सजाकर निकल पड़ती है.

देश की औसतन 50 फीसदी दागी विधायक और सांसद चुनने का फैसला कौन करता है? उन्हें कंधे पर चढ़ाकर, फूल माला से लादकर और काफिला सजाकर कौन माई-बाप और भाग्य विधाता का दर्जा देता है? उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रेलवे स्टेशनों, वाहनों, सरकारी इमारतों को फूंकने वाली भीड़ कौन है? समारोहों, शादियों, जलसों, गोष्ठियों में हमें मुख्य अतिथि बनाकर गौरवान्वित होने वाली जनता कौन है? हमारे साथ तस्वीरें खिंचाकर धन्य हो जाने वाले लोग कौन हैं? अनुचित सिफारिशें के साथ हमारे दरबारों में कौन मजमा लगाता है?

धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर सरकारी जमीन और परिसंपत्तियों को कब्जाने के खेल में नेताओं के रसूख का इस्तेमाल करने वाली जनता कौन है? मूर्ति-स्थापना, मंदिरों, मस्जिदों आदि के लिए सरकारी जमीन की हड़प में नेताओं की ताकत का कौन इस्तेमाल करता है? जनता ही न?

माननीय भोलाराम जी, हम आपके ही आईनादार! जैसी जनता, वैसे नेता! मिलजुल खा कर मुल्क चलाने का फार्मूला राजनीति का ठोस स्थापित सत्य है. मिस्र के उत्तंग पथरीले पिरामिड जैसा सघन ठोस! इसमें जनता-नेता दोनों की भलाई और परमानंद के जुगाड़ छुपे हैं. आइए, मतदान के इस बसंत में हम मिलजुल पीहू-पीहू गाएं! नैतिकता का हिसाब फिर कभी!

आपका प्रिय प्रतिबद्ध नेता

धनीराम धाकड़

भोलाराम भावुक जी का नेताजी को लिखा पत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
SACRED GAMES: Anurag Kashyap और Nawazuddin Siddiqui से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi