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कांग्रेस की डगमगाती नैया, देखिए कहीं डूब ना जाए!

अगर राहुल गांधी की कांग्रेस अपने को फिर से खड़ा करना चाहती है तो उसे असली मुद्दों की असली लड़ाई लड़नी होगी.

Nalini R Mohanty Updated On: Mar 15, 2017 04:57 PM IST

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कांग्रेस की डगमगाती नैया, देखिए कहीं डूब ना जाए!

पांच राज्यों के चुनाव का सबसे बड़ा संदेश है कि नरेन्द्र मोदी की बीजेपी का विजयरथ लगातार दौड़ रहा है. (यह बीजेपी की नहीं बल्कि मोदी की जीत है ठीक उसी तरह जैसे कि 2015 में बिहार के चुनावों में मिली पराजय पार्टी की कम और मोदी की छवि की कहीं ज्यादा बड़ी हार थी).

दूसरी तरफ राहुल गांधी की कांग्रेस उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य तथा उत्तराखंड में पूरी तरह धराशायी होने के बाद एक तरह से खात्मे के कगार पर हैं.

राहुल गांधी के लिए सांत्वना की बात बस इतनी भर है कि कांग्रेस ने पंजाब में बहुमत के साथ जीत हासिल की है. गोवा और मणिपुर में कांग्रेस और बीजेपी सीटों के मामले में एक-दूसरे से थोड़ा ही आगे-पीछे हैं.

तर्क के लिए पल भर को अगर यह मान भी लें कि कांग्रेस इन दोनों राज्यों में जीत गई है तो भी इससे पार्टी को सिर्फ गिनती बढ़ाने भर का संतोष हासिल होना है.

ऐसा इसलिए क्योंकि, ये दोनों ही राज्य बहुत छोटे हैं और इन राज्यों को कांग्रेस के खाते में गिन लेने से 2019 की बड़ी तस्वीर नहीं बदलने वाली. (मणिपुर और गोवा में प्रत्येक सूबे से सिर्फ 2 सांसद लोकसभा में आते हैं जबकि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड से क्रमशः 80 और 5 सांसद पहुंचते हैं).

सूबों के विधानसभाई चुनावों में कांग्रेस पार्टी का साल दर साल खराब प्रदर्शन जारी है. ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि पार्टी एक ऐसी ढलान पर है जहां से ऊपर की यात्रा संभव ही नहीं?

क्या 21वीं सदी में हिंदुस्तान में कांग्रेस का वैसा ही अवसान होने जा रहा है जैसा ग्रेट-ब्रिटेन में 20 वीं सदी में लिबरल पार्टी का हुआ था?

ब्रिटेन में लिबरल पार्टी और भारत में कांग्रेस पार्टी दोनों ही दलों का वजूद 19वीं सदी में कायम हुआ. लिबरल पार्टी 19वीं सदी के शुरुआती दशकों में बनी तो कांग्रेस 19वीं सदी के आखिर के दशकों में.

लेकिन इन दोनों पार्टियों के बीच एक भारी भेद है: लिबरल पार्टी ह्वीग, फ्री-ट्रेडर्स और रैडिकल्स के आपसी मेल से बनी और यह पार्टी ब्रिटेन में सत्ता की होड़ में लगी दो बड़ी पार्टियों में एक थी. (दूसरा बड़ा राजनीतिक दल कंजर्वेटिव पार्टी थी).

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जवाहरलाल नेहरू के साथ महात्मा गांधी

अंग्रेजों का शासन

जबकि कांग्रेस के बनने के वक्त भारत में शासन अंग्रेजों का था और ऐसे में कांग्रेस पार्टी भारतीयों के हित और आकांक्षाओं को मुखर करने का मंच बनकर उभरी. भारत को 1947 में आजादी मिली तो सत्ताधारी दल के रुप में कांग्रेस को दूर-दूर तक कोई चुनौती नहीं थी.

कांग्रेस पार्टी जिस वक्त सत्ता में आयी तकरीबन उसी वक्त लिबरल पार्टी अपने राजनीतिक अवसान के एक ऐसे ढलान पर थी जहां से ऊपर की यात्रा संभव नहीं. लिबरल पार्टी 19वीं सदी के आखिर तक इंग्लैंड में चार दफे सरकार बना चुकी थी.

20वीं सदी के शुरुआती दशक में भी यह एक मजबूत राजनीतिक दावेदार थी. उन दिनों इस पार्टी ने या तो खुद के बूते सरकार बनायी या फिर कंजर्वेटिव पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन की सरकार बनायी. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन में ऐसी ही गठबंधनी सरकार बनी थी.

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन में पहला चुनाव 1922 में हुआ. इस चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में आयी और लिबरल पार्टी तीसरे स्थान पर खिसक गई. 1922 के चुनावों के साथ नवगठित लेबर पार्टी ब्रिटेन में प्रमुख विपक्षी पार्टी बनकर उभरी.

इसके बाद से लिबरल पार्टी ब्रिटेन की राजनीति में हाशिए पर खिसकने लगी. दूसरी पार्टियों से कई दफे के विलय के बाद भी लिबरल पार्टी सत्ता का प्रमुख दावेदार बनकर ना उभर सकी.

इसके बाद के दिनों में (लिबरल पार्टी अपने नये अवतार में ब्रिटेन में लिबरल डेमोक्रेटस् कहलाती है और 2010 में कंजर्वेटिव पार्टी की सरकार बनी तो जूनियर सहयोगी के तौर पर उसने सरकार में शिरकत भी की लेकिन 2015 में सत्ता कंजर्वेटिव्स के हाथ में चली गई और मतदाताओं ने लिबरल डेमोक्रेटस् को धराशायी कर दिया).

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तकरीबन एक सदी से लिबरल पार्टी ब्रिटेन की राजनीति के अग्रणी मोर्चे से बाहर ही बाहर चल रही है. तो क्या भारत में कांग्रेस का भी वही हश्र होने जा रहा है जो लिबरल पार्टी का हुआ ?

साल 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस सदन में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी तो है, लेकिन उसे प्रमुख विपक्षी दल की हैसियत हासिल नहीं क्योंकि पार्टी संसद में प्रमुख विपक्षी दल कहलाने के लिए जरूरी सदस्य संख्या (सदन के कुल सदस्यों का 1\10 हिस्सा) नहीं जुटा पायी.

साल 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद एक-एक करके विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और पार्टी तकरीबन हर सूबे में अपनी जमीन तेजी से खोती जा रही है.

आसार इस बात के हैं कि 2019 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी के सांसदों की संख्या और भी ज्यादा कम हो जाए-अब भी कांग्रेस के सदस्यों की संख्या कुल मिलाकर 44 ही है.

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यूपी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन काफी खराब रहा

क्षेत्रीय पार्टी

यह बात लगातार साफ होते जा रही है कि कांग्रेस को बिहार, उत्तरप्रदेश और तमिलनाडु की तरह केंद्र में भी किसी ना किसी क्षेत्रीय पार्टी का पिछलग्गू बनकर रहना पड़ेगा.

उत्तराखंड की हार के बाद कांग्रेस का शासन सिर्फ पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों(मेघालय, मिजोरम, मणिपुर), हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और संघशासित प्रदेश पुद्दुचरी में बचा है.

इनमें सिर्फ कर्नाटक के बारे में माना जा सकता है कि वहां सरकार का होना राजनीतिक रुप से महत्वपूर्ण है. तमाम संकेत यही बताते प्रतीत होते हैं कि नई ऊर्जा से लबरेज बीजेपी 2018 के विधानसभा चुनावों में यह सूबा भी कांग्रेस के हाथ से झटक लेगी.

तो क्या यह सब उस पार्टी के हमेशा के लिए खात्मे की सूचना है जिसे कभी भारतीय लोकतंत्र का पर्याय समझा गया? कांग्रेस के हिमायती कहेंगे कि कांग्रेस थोड़े समय के लिए अवसान की तरफ जाते हुए दिख रही है लेकिन आज नहीं तो कल उसे एक बार फिर से वापस आना ही है.

वे ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी का उदाहरण देंगे जिसे 1845 से 1874 के बीच चार दशक तक लिबरल पार्टी ने एकदम हाशिए पर कर दिया था लेकिन इस पार्टी ने 1885 में फिर से वापसी की और लिबरल्स को दो दशक तक सत्ता से बाहर रखा.

आखिरकार, अगले कुछ सालों में लिबरल पार्टी का सूरज ब्रिटेन के राजनीतिक आकाश में हमेशा के लिए डूब गया. क्या कंजर्वेटिव पार्टी की तरह कांग्रेस भी अपनी खस्ताहाली से उबरेगी या फिर वह आत्मघात के उसी रास्ते पर जायेगी जिसपर कभी लिबरल पार्टी गई?

साल 1846 में कंजर्वेटिव पार्टी के दो फाड़ हुए थे. उस वक्त यह पार्टी मुख्य रूप से धनी खेतिहरों की पार्टी थी और पार्टी का दो-फाड़ देश में उपजाये गेहूं को संरक्षण देने के सवाल पर हुआ था.

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गुजरते वक्त के साथ कंजर्वेटिव पार्टी का अवाम के साथ रिश्ता कमजोर होते जा रहा था क्योंकि ब्रिटेन में गरीब जन को राजनीतिक अधिकार मिल रहे थे....और इस राजनीतिक अधिकार के साथ ब्रिटिश लोकतंत्र में गरीब जनता का जोर बढ़ता जा रहा था.

लेकिन बेंजामिन डिजरायली ने पार्टी के सौभाग्य के सूरज को डूबने से बचा लिया. उन्होंने ब्रिटेन के धनी लोगों को गरीबों के पक्ष में बात रखने को राजी किया और अंत में कंजर्वेटिव पार्टी ने  साल 1885 में सत्ता में वापसी की.

लोकतंत्र में कामयाब होने के लिहाज से लिबरल पार्टी हर तरह से फायदे की हालत में थी. इसे धनी लोगों का संरक्षण हासिल था, सियासी कामयाबी का एक लंबा इतिहास इस पार्टी के साथ था, कई कद्दावर नेता मौजूद थे और सबसे अहम बात यह कि लिबरल पार्टी के समर्थकों की तादाद भी अच्छी-खासी थी.

Rahul Gandhi and Mamata Banerjee at PC

तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के साथ राहुल गांधी

लेकिन दुर्भाग्य कहिए कि लिबरल पार्टी वक्त के साथ अपने को बदलने में कामयाब ना हो पायी. तेजी से बदलते आर्थिक और सामाजिक हालत से पार्टी तालमेल ना रख सकी. पार्टी ने मुक्त बाजार की नीति की पैरोकारी की और उसे पूंजीपतियों का समर्थन हासिल हुआ.

लेकिन जब उद्योगपतियों ने मुक्त-व्यापार की नीति से हाथ खींच लिया और यूरोप के मुल्कों खासकर जर्मनी से आने वाले सामान के खिलाफ संरक्षण की मांग की तो लिबरल पार्टी के पास उनको जवाब देने के लिए विचार की कोई पूंजी नहीं बची थी.

गरीब जन को राजनीतिक हक-हकूक मिलने के साथ लिबरल पार्टी पर उनके फायदे के सरकारी कार्यक्रम शुरु करने का दबाव बढ़ा. इससे मुक्त-व्यापार की लिबरल पार्टी की नीति को और ज्यादा चोट पहुंची जबकि मुक्त-व्यापार की नीति ही एक तरह से लिबरल पार्टी का वैचारिक आधार थी.

सामाजिक आंदोलन का दौर

दुर्भाग्य कहिए कि आर्थिक और सामाजिक आंदोलन के ऐसे उथल-पुथल भरे वक्त में पार्टी के पास ऐसा कोई नेता ना था जो उसकी डगमगाती नैया को अपनी बुद्धिमत्ता के सहारे पार लगा सके. पार्टी के भीतर मतभेद के स्वर बढ़ने लगे और नेता असंतुष्ट होकर एक-दूसरे से लड़ते नजर आने लगे.

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यूपी विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी

इसी वक्त लेबर पार्टी का उभार हुआ. लेबर पार्टी के पास ब्रिटिश अवाम खासकर आगे बढ़ने के ख्वाहिशमंद मजदूर तबके की नजर में जंचने वाला आर्थिक और सामाजिक सिद्धांत था.

अगर लेबर पार्टी ने दो दलीय व्यवस्था के भीतर लिबरल पार्टी को धकियाकर अपने लिए जगह बनायी तो उसकी बड़ी वजह थी कि उसने वक्त की जरुरत को भांपकर अपने सिद्धांत बनाये थे.

क्या कांग्रेस वक्त की जरुरत को समझ पा रही है? अवाम के बीच नरेन्द्र मोदी का आकर्षण बरकरार है क्योंकि मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े जुझारू तेवर से लड़ते नजर आ रहे हैं. जबकि, कांग्रेस के बारे में लोगों के बीच अब भी यह धारणा बनी हुई है कि अपने दशकों के शासन में उसने भ्रष्टाचार को एक लिहाज से नियम की तरह बरता.

क्या राहुल गांधी और उनकी टीम के पास ऐसी कोई ठोस योजना है जिसके सहारे वे मतदाताओं को समझा सकें कि भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए उनकी पार्टी कुछ सख्त नीतिगत उपाय करेगी. ऐसे सख्त उपाय जिन्हें अपनाने में शायद पल भर को नरेन्द्र मोदी भी हिचकिचाएं.

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क्या कांग्रेस पार्टी सूचना का अधिकार कानून के दायरे में आने की हिम्मत दिखा सकेगी? साल 2005 में अमल में आया यह कानून भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में मील का पत्थर माना जाता है. क्या कांग्रेस पार्टी सरकार पर दबाव डालेगी कि वह व्हीसल-ब्लोअर एक्ट में बिना कोई हेरफेर किए उसे पास करे.

यह एक्ट कांग्रेस के शासन के समय ही संसद में पास हुआ था लेकिन लागू नहीं हो पाया. एक विधेयक नागरिकों को सेवा और सामान समय पर उपलब्ध कराने के बारे में है.

यह विधेयक कांग्रेस के शासन काल में ही चर्चा में आया था लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस विधेयक को पारित कराने से हाथ खींच लिए और अब बीजेपी भी हिचकिचा रही है. क्या कांग्रेस सेवा और सामान समय से मुहैया कराने के इस विधेयक को कानून बनाने के लिए जोर लगायेगी?

नरेन्द्र मोदी की सरकार ने भ्रष्टाचार-विरोधी इन ठोस उपायों से अपने को अभी अलग रखा है. बीजेपी अभी भ्रष्टाचार-विरोध के नाम पर प्रतीकों की राजनीति कर रही है. अगर राहुल गांधी की कांग्रेस अपने को फिर से खड़ा करना चाहती है तो उसे दिखावे की नहीं बल्कि असली मुद्दों की असली लड़ाई लड़नी होगी.

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