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गुजरात का सरदार तय करेंगे पटेल, बाकी जातियां अपनी ही गणित में उलझीं

जातियों की टेक्टोनिक प्लेटें टकरा रही हैं और अलग-अलग टापू-टीले उभर आ रहे हैं लेकिन असली उठापटक पटेल-पाटीदारों के गढ़ में दिखाई दे रही है

Updated On: Dec 08, 2017 05:29 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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गुजरात का सरदार तय करेंगे पटेल, बाकी जातियां अपनी ही गणित में उलझीं

देश की राजनीति में सियासी उथलपुथल का एपिसेंटर बन चुका है गुजरात. गुजरात में एक भी बयान या गुजरात पर एक भी फिसली जुबान दिल्ली की सियासत को हिला सकती है.

मणिशंकर अय्यर गुजरात की राजनीति का बोझ नहीं उठा सके और अपने ही ‘बनाए-ढहाए’ बयानों के किले में दब गए. मणिशंकर अय्यर के निलंबन से समझा जा सकता है कि गुजरात का रण किस हद तक आन-बान-शान का मसला बन चुका है. इस रण में खिलजी, तुगलक, औरंगजेब तक उतर चुके हैं क्योंकि गुजरात पर समझौता करने के मूड में कोई भी नहीं है.

बयानों के तूफान से हवाओं का रुख हर दिन बदलते दिख रहा है. भले ही रैलियों के मंच से बयानों के अलग अलग तूफान उठ रहे हों लेकिन असली भूगर्भीय हलचल जातियों की ज़मीन के भीतर चल रही है. जातियों की टेक्टोनिक प्लेटें टकरा रही हैं और अलग-अलग टापू-टीले उभर आ रहे हैं.

असली उठापटक पटेल-पाटीदारों के गढ़ में दिखाई दे रही है. जाति के गणित में पटेल समुदाय की भूमिका सत्ता के कैलकुलेटर से कम नहीं. यही वजह है कि बीजेपी पटेलों के लेकर कोई कसर नहीं छोड़ रही क्योंकि पटेलों को बीजेपी से दूर करने की कोशिश में खुद एक पटेल नेता जुटा हुआ है. बीजेपी के खिलाफ पटेलों को लामबंद करने के लिये हार्दिक पटेल ने संकल्प यात्रा निकाली तो खोडल धाम मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन नरेश भाई पटेल से मुलाकात भी की.

पटेलों में भी उप-जातीय राजनीति

हार्दिक पटेल खुद कड़वा पटेल समुदाय से आते हैं लेकिन नरेश पटेल के साथ उनकी राजनीतिक सुगबुगाहट ने बीजेपी के कान खड़े कर दिए थे. हालांकि हार्दिक पटेल ने अपनी मुलाकात के पत्ते नहीं खोले थे. इसके बाद बीजेपी ने भी नरेश पटेल से मुलाकात कर दावा किया है कि नरेश पटेल अपने समुदाय के लोगों से बीजेपी के पक्ष में वोट डालने की अपील करेंगे.

कथित 'सेक्स सीडी' के बाद हार्दिक के लिए ये दूसरा बड़ा झटका होगा. दरअसल नरेश पटेल लेउवा पटेल नेता हैं और गुजरात में पाटीदार वोटरों में 60 फीसदी लेउवा पटेल हैं तो 40 फीसदी कड़वा पटेल. लेउआ पटेल बड़े किसान माने जाते हैं. मध्य गुजरात और दक्षिणी गुजरात में लेउआ पटेलों की काफी मौजूदगी है. वहीं कड़वा पटेल मझोले किसान माने जाते हैं जिनकी मौजूदगी उत्तर गुजरात और सौराष्ट्र में काफी मजबूत है.

People from India's Patidar community attend a public meeting with Hardik Patel, leader of the Patidar community, after his return from Rajasthan’s Udaipur, in Himmatnagar, in the western Indian state of Gujarat, India January 17, 2017. REUTERS/Amit Dave - RC18CC91E400

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में लेउवा पटेल के 63 फीसदी वोट बीजेपी को मिले थे जबकि कड़वा पटेल के 82 फीसदी वोट मिले थे. गुजरात की मौजूदा कैबिनेट में 7 मंत्री पटेल समुदाय से हैं तो वहीं 40 विधायक भी पटेल समुदाय से हैं.

बीजेपी को 22 साल से गुजरात में मिली सत्ता के पीछे पटेलों को बड़ा हाथ है. यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ‘मिशन गुजरात’ की शुरुआत सरदार पटेल के गांव करमसद से कर पार्टी में पटेलों की पुन: प्राणप्रतिष्ठा की तो गुजरात के उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने गौरव यात्रा निकाल कर पटेलों का आह्वान किया.  नितिन पटेल और जीतू वाघाणी को पटेल-पाटीदार सेना की कमान सौंपी गई है और कोशिश है कि पाटीदार आरक्षण आंदोलन के वक्त बने घाव चुनाव में फिर से न उभर आएं.

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सूबे के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने नामाकंन भरने से पहले गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के कद्दावर नेता रहे केशुभाई पटेल से उनके घर जाकर आशीर्वाद लिया था. इस आशीर्वाद के मायने पटेलों के अलावा कांग्रेस भी बेहतर समझ सकती है.

हालांकि कांग्रेस हार्दिक पटेल के बूते उम्मीदों की हांडी पका रही है. हार्दिक के कांग्रेस का हाथ थामने से पटेल समीकरण साधने की उम्मीद जगी है. लेकिन कांग्रेस ये भूल रही है कि उसी के पूर्व मुख्यमंत्री की वजह से ही पटेल समुदाय ने बीजेपी का पक्का साथ थामा था. कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने जिस 'खाम फॉर्मूले' को तैयार कर पटेलों के राजनीतिक वर्चस्व को खत्म करने की कोशिश की थी तो वहीं खाम यानी क्षत्रिय,दलित और आदिवासियों को तत्तकालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के साथ जोड़ने का करिश्मा किया था.

दरअसल सोलंकी ने ही साल 1981 में गुजरात में आरक्षण का ऐसा तूफान पैदा किया था जिसके बाद सड़कों पर पटेल-दलित और पटेल-ओबीसी दंगों का रूप दिखाई दिया. बाद में पटेल समुदाय कांग्रेस का हाथ झटक कर बीजेपी से जुड़ा और सत्ता का भागीदार बना. बीजेपी बेहतर जानती है कि राज्य के एक करोड़ पटेल मतदाता उसकी सत्ता के लिए कितने निर्णायक हैं. बीजेपी पटेल वोटों को खोने की कोई गलती नहीं कर सकती. केवल साल 2015 में पाटीदार आरक्षण आंदोलन ही उसकी सत्ता में एक ऐसा अध्याय जुड़ गया जिसकी वजह से 22 साल में पहली बार सत्ता के लिए बीजेपी को संघर्ष देखना पड़ रहा है. हालांकि राज्य की बीजेपी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर पाटीदारों के लिये आरक्षण का एलान किया लेकिन अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.

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एक-एक कर साथी छोड़ रहे हार्दिक का साथ

बीजेपी के लिए राहत की बात ये है कि हार्दिक पटेल के दम पर पटेल-पाटीदारों की कांग्रेस में वापसी आसान नहीं है क्योंकि हार्दिक पटेल न तो अपनी बढ़ती साख को पचा सके और न ही अब गिरती साख को बचा पा रहे हैं.  यहां तक कि पाटीदार नेताओं के बीच की दरार भी खुलकर सामने आ गई और हार्दिक पटेल के खिलाफ अंदर से आवाजें उठने लगीं. पाटीदार आरक्षण आंदोलन में जुड़े बाकी साथी भी धीरे-धीरे हार्दिक का साथ छोड़ने लगे.

हार्दिक फैक्टर की वजह से ही इस बार बीजेपी ने कुल 52 पाटीदार उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो साल 2012 विधानसभा चुनाव की लिस्ट से 7 ज्यादा है.

भले ही पाटीदार आरक्षण चुनाव में एक फैक्टर है लेकिन बीजेपी के तरकश में ओबीसी का भी तीर है. पहले जब केशुभाई पटेल ने बीजेपी से नाराज़ हो कर अपनी अलग पार्टी बना ली थी तो बीजेपी ने ओबीसी कार्ड खेलकर चुनाव जीत लिया था. इस बार भी बीजेपी ने बड़ी जीत के लिए ओबीसी कार्ड चलते हुए 61 ओबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया है.

अब ये चुनाव तभी रोमांचक होंगे अगर दलित,आदिवासी और मुस्लिम वोटरों के साथ पाटीदार वोटबैंक भी कांग्रेस के हाथ में अपना भविष्य देखे. फिलहाल बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही ‘पटेल पावर’ पाने के लिये सियासी कसरत में जुटी हुई हैं क्योंकि बाकी जातियों के मोहरे सिर्फ चक्रव्यूह के काम आएंगे.

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