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गुजरात चुनाव 2017: कांग्रेस को सबक सिखाने में लगे हैं गुजरात के ये 'बापू'

शंकर सिंह वाघेला उत्तरी गुजरात को बेहतर तरीके से समझते हैं, वह वहां कांग्रेस को प्रभावित कर सकते हैं

Updated On: Dec 07, 2017 07:23 PM IST

FP Staff

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गुजरात चुनाव 2017: कांग्रेस को सबक सिखाने में लगे हैं गुजरात के ये 'बापू'

गुजरात चुनाव के पहले चरण के चुनाव के लिए प्रचार का गुरुवार को अंतिम दिन था. ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एक के बाद एक कई रैलियों को संबोधित किया, लेकिन इस पूरे अभियान में 'गुजरात के बापू' कहे जाने वाले शंकर सिंह वाघेला कहीं नजर नहीं आ रहे हैं.

शंकर सिंह वाघेला गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इस साल जुलाई में कांग्रेस से अलग हो कर उन्होंने अपनी पार्टी 'जन विकल्प मोर्चा' का गठन किया. चुनाव में उनकी उतनी चर्चा नहीं हो रही है, लेकिन ऐसा नहीं है कि वह प्रदेश में घूम नहीं रहे हैं. वह रैली करने की जगह अपने समर्थकों के साथ मीटिंग कर रहे हैं. इस दौरान वह दशकों से बनाए रिश्ते और नेटवर्क को भुनाने की पूरी कोशिश में लगे हैं.

किंगमेकर बनना है लक्ष्य

इस चुनाव में वाघेला का मकसद किंग नहीं बल्कि किंगमेकर बनना लग रहा है. उन्होंने 76 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और उन्हें उम्मीद है कि वह किंगमेकर के रूप में सामने आएंगे. उनका स्पष्ट उद्देश्य वैकल्पिक राजनीति के मॉडल को उभारना है.

वह नए तरह के आइडिया को सामने ला रहे हैं. हाल ही में उन्होंने घोषणा की थी कि उनकी पार्टी से टिकट चाहने वाले इंटरनेट पर अप्लाई कर सकते हैं. पार्टी ने तीन पेज का फॉर्म भी वेबसाइट पर अपलोड किया था. फॉर्म भरने के बाद प्रत्याशियों को शॉर्टलिस्ट किया गया और इसके बाद उन्हें संदेश देकर जन विकल्प मोर्चा के पार्लियामेंट्री बोर्ड के सामने बुलाया गया.

एक सूत्र ने कहा, आपको यह समझना होगा कि बापू को कांग्रेस में अपमानित किया गया. वह पार्टी नहीं छोड़ना चाहते थे. सोनिया के करीबी अहमद पटेल और मधूसुदन मिस्त्री गुजरात में उनके प्रभाव से डरे हुए थे. इसलिए उन्होंने प्रभाव से बापू को बाहर कर दिया.

वाघेला के एक अन्य सूत्र ने कहा, वह 'कांग्रेस को सबक सिखाने' के लिए काम कर रहे हैं. उनके एक करीबी के मुताबिक, पिछले विधानसभा चुनाव के बाद ही वाघेला का पार्टी से मोहभंग हो गया था. साल 2012 में वह अपने गृह जिले से चुनाव लड़ना चाहते थे. लेकिन पार्टी ने उन्हें खेड़ा जिले के कपाडवंज सीट से चुनाव लड़ने के लिए कहा. वह सिर्फ इससे सहमत ही नहीं हुए, बल्कि उनके बल पर पार्टी को मध्य गुजरात में 32 सीटें मिली. कांग्रेस उन सीटों को बापू के प्रभाव के बिना नहीं जीत सकती.

जल्द ही उनके करीबियों ने पार्टी छोड़ना शुरू कर दिया और बीजेपी ज्वाइन करने लगे. वाघेला ने दावा किया कि उन्होंने समर्थकों को रोकने के प्रयास किया, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने सहयोग नहीं किया. उस समय तक वाघेला यह सोचते थे कि विजय रुपानी के खिलाफ वह मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होंगे. वाघेला चाहते थे कि उन्हें चुनाव में फ्री हैंड दिया जाए. कुछ सूत्र कहते हैं कि वह राज्यसभा की सीट चाहते थे. लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि यह सीट अहमद पटेल को मिलेगी तो उन्हें लेकर पार्टी का रुख स्पष्ट हो गया.

shankar singh

अहमद पटेल को मिली जीत से ताजा हुए घाव

एक महीने बाद वाघेला ने पार्टी छोड़ दी. अहमद पटेल को राज्यसभा में जीत मिली. पटेल की जीत ने बापू के पुराने घाव को ताजा कर दिया. एक सूत्र ने उदाहरण देते हुए कहा, एक विधायक ने कहा था कि वह बापू के खिलाफ वोट करेगा, लेकिन अंत में उसने ऐसा नहीं किया. बापू इसे नहीं भूल सकते. इस बार बापू ने उसके खिलाफ एक उम्मीदवार उतारा है. ऐसा उन्होंने कई सीटों पर किया है.

वाघेला उत्तरी गुजरात को बेहतर तरीके से समझते हैं. वह वहां कांग्रेस को प्रभावित कर सकते हैं. उत्तरी गुजरात में वाघेला के इस प्रभाव से बीजेपी को फायदा हो सकता है. गुजरात के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, जैसे तेंदुआ अपने स्पॉट को नहीं बदल सकता. वैसे ही संघ में रहा व्यक्ति पूरी तरह उसे छोड़ नहीं सकता है. कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने से पहले वाघेला बीजेपी में थे. शुरुआत के दिनों में वह आरएसएस के प्रचारक थे और भारतीय जन संघ के माध्यम से वह राजनीति में आए. विपक्ष के नेता से इस्तीफा देने के बाद वह नरेंद्र मोदी का खुलकर आलोचना नहीं करते थे.

लेकिन यदि वाघेला के बिना कांग्रेस संघर्ष कर रही है तो वाघेला अपने पुराने सहयोगियों की छांव में हैं. सूत्रों के अनुसार, वह रैली नहीं कर रहे हैं और सभी सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतार रहे हैं इसका कारण है कि उनकी पार्टी के पास उतना फंड नहीं है. यहां ऐसी भी अफवाह है कि वाघेला के बेटे महेंद्र सिंह वाघेला को बीजेपी में जाना चाहते थे.

लेकिन गुजरात की राजनीति में अब वाघेला कहां होंगे यह बड़ा सवाल है? उनके एक करीबी के मुताबिक, उन्हें जीवन में किसी चीज की जरूरत नहीं है. वह विधायक, मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता और सांसद रह चुके हैं. वह जल्दबाजी करने वाले आदमी नहीं हैं.

(न्यूज18  के लिए उदय सिंह राणा की रिपोर्ट)

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