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गुजरात चुनाव: ईवीएम में गड़बड़ी से चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

ईवीएम को लेकर मतदाताओं का संदेह भले ही पुख्ता हो या न हो, लेकिन उनके इस संदेह को निराधार नहीं माना जा सकता है

Updated On: Dec 10, 2017 02:17 PM IST

Parth MN

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गुजरात चुनाव: ईवीएम में गड़बड़ी से चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

भारत आज तिरुनेलई नारायण अय्यर शेषन यानी टीएन शेषन को शिद्दत से याद कर रहा है. शेषन देश के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त थे. उनका कार्यकाल 1990 से लेकर 1996 तक रहा.

शेषन ने देश में स्वच्छ एवं निष्पक्ष मतदान कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्होंने लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण अंग (मतदान प्रक्रिया) को शुद्ध करने के लिए चुनाव आयोग को मिलीं सभी शक्तियों को लगा दिया था. शेषन के दृढ़ संकल्प ने चुनाव आयोग पर लोगों के विश्वास को बहाल करने में मुख्य भूमिका निभाई थी. शेषन को रिटायर हुए अब दो दशक बीत चुके हैं. लिहाजा वक्त के साथ कई चीजों में बदलाव आ चुका है. चुनाव आयोग का रवैया भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहा है. चुनाव आयोग का मौजूदा रवैया शायद टीएन शेषन को रास नहीं आता.

ईवीएम पर अविश्वास

आज गुजरात समेत पूरे देश में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में छेड़छाड़ को लेकर चर्चा गर्म हैं. कोई तर्क देता है कि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव नहीं, वहीं दूसरा कहता है कि ऐसा करना मुमकिन है. किसी पार्टी के उम्मीदवार को जब अपनी जीत की थोड़ी बहुत भी उम्मीद नजर आती है, तो वह यह मन्नत मांगता दिखता है कि 'बस ईवीएम में कुछ गड़बड़ नहीं होना चाहिए.' लोगों की यह चिंता वाकई परेशान करने वाली है. इसने चुनाव आयोग की विश्नसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया है.

अभी तक, इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि ईवीएम में छेड़छाड़ करके किसी खास राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाया जा सकता है. लेकिन फिर भी, ईवीएम की वजह से चुनाव प्रक्रिया में लोगों का विश्वास कम हो रहा है. देश की लोकतांत्रिक छवि के लिए यह चिंताजनक बात है. ईवीएम को लेकर मतदाताओं का संदेह भले ही पुख्ता हो या न हो, लेकिन उनके इस संदेह को निराधार नहीं माना जा सकता है.

कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए निकाय चुनावों में एक निर्दलीय उम्मीदवार को एक भी वोट नहीं मिला. यह घटना वाकई बहुत हास्यास्पद मालूम होती है, क्योंकि अगर कोई व्यक्ति खुद को चुनाव लड़ने के योग्य समझता है, तो वह निश्चित रूप से कम से कम अपना वोट तो खुद को देगा ही. उस निर्दलीय उम्मीदवार की भी यही शिकायत थी. उसका आरोप था कि उसने खुद को अपना वोट डाला था, लेकिन ईवीएम में गड़बड़ी के चलते उसे अपना वोट तक हासिल नहीं हो सका.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक मतदाता ने जब बीएसपी के लिए बटन दबाया, तो वोट बीजेपी के खाते में चला गया. महाराष्ट्र के एक जिलाधिकारी ने एक आरटीआई का जवाब देते हुए इस बात की पुष्टि की थी कि ईवीएम से छेड़छाड़ करना संभव है. यह सभी महज अफवाहें नहीं हैं, बल्कि खबरें हैं. आज के युग में ऐसी खबरों को फैलने में देर नहीं लगती है. लिहाजा इन खबरों और देश की जनता पर पड़ने वाले इनसे प्रभाव ने लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है.

ईवीएम में गड़बड़ियों की शिकायतें पहले भी मिलती रही हैं. बीजेपी समेत कई राजनीतिक दल अतीत में इसी तरह के आरोप लगा चुके हैं. उस समय, चुनाव आयोग की स्वायत्तता और विस्तृत प्रभाव की वजह से उन आरोपों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया. लेकिन आज चुनाव आयोग की विश्वसनीयता संकट के दौर से गुजर रही है. ऐसे में इन आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है. अहम बात यह है कि अपनी विश्वसनीयता में आई कमी के लिए खुद चुनाव आयोग ही जिम्मेदार है.

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चुनावों का देर से ऐलान

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिस तरीके से गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखों के एलान में देरी हुई, और फिर जिस तरीके से उसके लिए सफाई दी गई, उसने चुनाव आयोग के कामकाज के तरीके पर लोगों को उंगली उठाने का मौका दे दिया. 8 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक जनसभा के दौरान चुनाव आचार संहिता के कथित उल्लंघन का आरोप लगा. उन्होंने 9 दिसंबर को गुजरात के पहले चरण के मतदान में बीजेपी को वोट देने की अपील की थी. लेकिन तब भी चुनाव आयोग ने अपनी जुबान बंद रखी है. इस मामले में अबतक चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया नहीं आई है.

दिलचस्प बात यह है कि चुनाव आयोग अपनी विश्वसनीयता के संकट और अपनी मौजूदा छवि से बखूबी वाकिफ है. यही वजह है कि गुजरात चुनाव से पहले चुनाव आयोग को बाकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करना पड़ी. जिसमें चुनाव आयोग ने बताया कि चुनाव में ईवीएम के साथ वीवीपीएटी का भी इस्तेमाल किया जाएगा. यही नहीं, मतदाताओं को आश्वस्त करने की कोशिश के तहत चुनाव आयोग की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की गई.

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गुजरात में 9 दिसंबर को पहले चरण का मतदान हो चुका है. पहले चरण में सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के कुछ हिस्सों में वोट डाले गए. इस दौरान राजकोट में 33 ईवीएम में तकनीकी खामियां पाई गईं. इस बात की सूचना स्थानीय मीडिया ने दी.

वीटीवी गुजराती न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, द्वारका के बूथ नंबर 168 में मतदाता जब ईवीएम में कांग्रेस का बटन दबा रहे थे, तब बीजेपी का चुनाव चिन्ह प्रकट हो रहा था. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के कई जिलों में ईवीएम और वीवीपीएटी में गड़बड़ी और खामियां पाई गईं. अकेले सूरत में ही लोगों ने 70 ईवीएम में समस्या की शिकायत की.

चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण

डीएनए की रिपोर्ट के मुताबिक, पोरबंदर में लोगों ने तीन ईवीएम के ब्लूटूथ डिवाइस से जुड़े होने का आरोप लगाया. कांग्रेस नेता अर्जुन मोढवाडिया ने इस मामले में चुनाव आयोग में शिकायत भी दर्ज कराई. लेकिन चुनाव आयोग ने कथित जांच करवा कर कांग्रेस की शिकायत को खारिज कर दिया.

पहले चरण के मतदान के दौरान ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत पर गुजरात चुनाव आयोग के प्रमुख ने एनडीटीवी को अपना स्पष्टीकरण दिया. उन्होंने कहा कि 'केवल सात बूथों पर ईवीएम में समस्याएं पाई गईं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी की जिन ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतें की गईं, उन्हें तकनीकी सहायता की जरूरत नहीं है. मैं शाम 5.45 बजे राजकोट के कलेक्टर से मिला, जिन्होंने बताया कि शिकायतें मिलने के बाद पूरे जिले में कुल 31 वीवीपीएटी और 27 ईवीएम को बदल दिया गया था.'

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इस बात से यह तो साफ हो ही जाता है कि ईवीएम में खामियों के चलते मतदान प्रक्रिया में घंटों तक व्यवधान बना रहा. इस व्यवधान की वजह से लोगों को वोट डालने में देरी हुई.

सौराष्ट्र इलाके में बीजेपी की स्थिति कमजोर है. वहां किसान और पाटीदार समुदाय बीजेपी से बहुत नाराज है. राज्य के मुख्यमंत्री विजय रूपानी खुद अपने निर्वाचन क्षेत्र राजकोट में कड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं. वहीं सूरत के हालात भी जुदा नहीं हैं. बीते कुछ महीनों से सूरत सरकार के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शनों का केंद्र रहा है. अब इन्हीं इलाकों में ईवीएम में बड़े पैमाने पर पाई गई खामियों ने चुनावों की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिया है. जिससे चुनाव आयोग पर मतदाताओं का आत्मविश्वास डगमगा गया है. चुनाव आयोग की विश्वसनीयता के खिलाफ उठ रहे इन सुरों को नजरअंदाज करना अब नुकसानदेह साबित हो सकता है.

लिहाजा चुनाव आयोग को अब अपनी साख बचाने के लिए तेजी से काम करना होगा. ताकि लोकतंत्र की सबसे अहम संस्था में लोगों के ढुलमुल होते विश्वास को फिर से मजबूत किया जा सके.

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