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अशोक गहलोत का संगठन महासचिव बनना, खुशखबरी या...?

मार्च-अप्रैल की तेज होती गरमी के बीच अशोक गहलोत को राष्ट्रीय संगठन महासचिव बनाने से राजस्थान में कई चेहरे बसंत के मौसम से खिल उठे हैं

Updated On: Mar 31, 2018 08:31 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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अशोक गहलोत का संगठन महासचिव बनना, खुशखबरी या...?

कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से राहुल गांधी बड़े फैसले और फेरबदल कर रहे हैं. गुजरात में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की कमान युवा हाथों में देने के बाद अब राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े बदलाव किए गए हैं. ये ऐसे बदलाव हैं जो देश के साथ-साथ देश के सबसे बड़े राज्य यानी राजस्थान की राजनीति पर भी गहरा असर डालेंगे.

राजस्थान में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता अशोक गहलोत को राष्ट्रीय संगठन महासचिव बना दिया गया है. अभी तक इस पद पर पिछले कई साल से 10 जनपथ के विश्वासपात्र जनार्दन द्विवेदी विराजमान थे. राजस्थान के ही एक और कद्दावर नेता और राहुल गांधी के खास माने जाने वाले भंवर जितेंद्र सिंह को भी राज्य से बाहर ओडिशा का प्रभारी बनाया गया है.

इस वक्त दिल्ली से लेकर जयपुर तक तमाम लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा अशोक गहलोत के कांग्रेस के संगठन महासचिव बनने को लेकर है. ये एक ऐसा कदम है, जिसने खासकर राजस्थान में कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी तक में कईयों के चेहरों पर मुस्कान ला दी है. इन चेहरों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को भी शामिल किया जा सकता है तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भी शामिल किया जा सकता है.

कांग्रेस में कार्यकर्ता कम, नेता ज्यादा

राजस्थान में आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत की संभावनाएं बहुत ज्यादा मानी जा रही हैं. बीजेपी की सत्ता का पांचवा साल चल रहा है और लोगों में राजे सरकार को लेकर गहरी नाराजगी साफ देखी जा सकती है. हाल ही में लोकसभा, विधानसभा और यहां तक कि स्थानीय निकायों के उपचुनावों में भी कांग्रेस उम्मीदवारों की बंपर जीत इसका इशारा बखूबी देती है. सरकार बनने की संभावनाओं ने कांग्रेस में खुशी भी भर दी है.

लेकिन जैसा कि लोगों के बीच मजाक में कही जाने वाली कहावत है कि कांग्रेस में कार्यकर्ता से ज्यादा नेता हैं और हर नेता बड़ा नेता बनने की महत्वाकांक्षा भी पाले रहता है. राजस्थान कांग्रेस में भी जीत की संभावनाएं जगते ही मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हो गए हैं. 2 बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत इस पद के स्वाभाविक प्रत्याशी हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की दावेदारी भी लगातार मजबूत हो रही है. 2008 में एक वोट से हार के बाद मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए सी पी जोशी भी पीछे नहीं हैं. यूपीए सरकार में मंत्री रहे भंवर जितेंद्र सिंह भी सीएम बनने का सपना देख लेते हैं.

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इस जंगल में 2 शेर, उठापटक तेज

सीएम पद की दावेदारी कई जताते हैं लेकिन मुख्य टक्कर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच ही है. दोनों ही जानते हैं कि दोनों के एक जगह रहते दोनों में से कोई एक ही मुख्यमंत्री बन सकेगा. एक को बाहर किए बिना दूसरा मुख्यमंत्री नहीं बन सकता. इसीलिए दोनों ही खेमे एक दूसरे को अपनी-अपनी ताकत का अहसास कराने में पीछे नहीं रहे हैं.

अशोक गहलोत जहां सोनिया गांधी और अहमद पटेल के करीब माने जाते हैं तो सचिन पायलट पर राहुल गांधी का हाथ बताया जाता है. 1977 से चुनाव लड़ रहे गहलोत की राजनीतिक जादूगरी के किस्से पायलट ने भी सुन रखे हैं. इसीलिए प्रदेश अध्यक्ष बन कर राजस्थान आने के बाद से ही वे लगातार इस कोशिश में हैं कि किसी भी तरह गहलोत को राज्य से राष्ट्रीय राजनीति की तरफ भेज दिया जाए.

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दूसरी तरफ, अशोक गहलोत गुट की ये कोशिश रहती है कि हाईकमान की नजर में कैसे भी करके सचिन पायलट के नंबर कम करवाए जाएं. इसीलिए उपचुनावों के समय कई बार आरोप लगता है कि पायलट को सीनियर नेताओं खासकर गहलोत का सहयोग नहीं मिलता. पिछले साल धौलपुर उपचुनाव में बीजेपी की जीत का क्रेडिट बीजेपी से ज्यादा गहलोत की 'मेहनत' को दिया गया.

इसी तरह पार्टी की एक बैठक के दौरान विश्वेंद्र सिंह ने नेताओं से हाथ खड़े करवाकर ये कहलवाया कि अगले मुख्यममंत्री के रूप में सचिन पायलट को पूरा समर्थन दिया जाएगा. तब गहलोत गुट ने ऐसे हालात बना दिए कि राजस्थान प्रभारी गुरुदास कामत को न सिर्फ बाहर जाना पड़ा बल्कि राजनीति तक छोड़ने का ऐलान करना पड़ा. ये अलग बात है कि बाद में उन्होने 'अंतरात्मा' की आवाज पर अपना फैसला बदल दिया.

राजनीति के 'अशोक' हैं गहलोत

2013 में हार के बाद राज्य में कांग्रेस के भीतर जितनी भी उठापटक चल रही है, वो अगले मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी पुख्ता करने और अपने प्रतिद्वंद्वी की दावेदारी कमजोर करने की कोशिश ही हैं. इसमें कभी सचिन पायलट कमजोर पड़ते दिखते हैं तो कभी गहलोत के हाथ से बाजी निकलती सी दिखती है. पिछले साल अशोक गहलोत को पंजाब चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का प्रमुख बनाया गया. वहां कांग्रेस की जीत के दावे कम ही थे और माना जा रहा था कि पंजाब में कांग्रेस की हार राजस्थान में सचिन पायलट के लिए खुशी की खबर बनकर आएगी.

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तस्वीर: अशोक गहलोत के फेसबुक से

पर पंजाब में हो गया उलटा-पुलटा. कांग्रेस ने न सिर्फ जीत हासिल की बल्कि त्रिशंकु विधानसभा के दावों को खारिज करते हुए सरकार भी बनाई. इसके बाद अशोक गहलोत को गुजरात जैसे मुश्किल रण की जिम्मेदारी दी गई. चर्चा थी कि उन्हें गुजरात भेजने के लिए पायलट ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था. पायलट गुट को उम्मीद थी कि गुजरात में कांग्रेस किसी भी हालत में जीत नहीं पाएगी और इस तरह हाईकमान के सामने गहलोत कमजोर पड़ जाएंगे.

लेकिन गहलोत खुद को राजनीति का बाजीगर यूं ही नहीं कहते. उन्होंने न सिर्फ अहमद पटेल को राज्यसभा चुनाव में चक्रव्यूह से निकाला बल्कि 30 साल में पहली बार कांग्रेस को इतना मजबूत बना दिया कि हार को भी लोगों ने नैतिक जीत का तमगा दिया. इसके बाद हाईकमान की नजर में गहलोत की ताकत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष को मुख्यमंत्री बनने का सपना न पालने की नसीहत भी दे डाली.

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राजस्थान से बाहर गहलोत की लगातार कामयाबी पायलट खेमे में खलबली मचा रही थी कि जनवरी में हुए उपचुनाव के नतीजों ने पहली बार पायलट को मुस्कुराने का मौका दे दिया. इन उपचुनावों में जीत ने कम उम्र के पायलट की छवि को एक जिम्मेदार और मुख्यमंत्री पद के लायक उम्मीदवार की छवि में बदल दिया. हाईकमान के सामने ये बात भी पहुंचाई गई कि किस तरह गहलोत के असहयोग के बावजूद पायलट ने अपनी रणनीति और कौशल से कांग्रेस के जहाज को पार पहुंचाया.

Ashok Gehlot And Rahul Gandhi

गहलोत का अब मुख्यमंत्री बनना नामुमकिन!

कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी की ताजपोशी और हाल ही में दिल्ली अधिवेशन में युवाओं को आगे आने देने की उनकी नसीहत के बाद पायलट के पक्ष में 'कुछ' होने के कयास लगाए जाने लगे थे. मार्च खत्म होने से पहले गहलोत की राजस्थान से विदाई की खबर भी आ गई. निश्चित रूप से अशोक गहलोत का राष्ट्रीय राजनीति में कद बढ़ाया गया है लेकिन राज्य की राजनीति से अब उनको लगभग बाहर कर दिया गया है. अगर अब भी उनके चाहने वाले मुख्यमंत्री पद का सपना पाले बैठे हों तो ये गालिब के शब्दों में 'खुश रहने के लिए ख्याल अच्छा है' वाली बात ही कही जा सकती है.

अशोक गहलोत का कद अब इतना बढ़ा दिया गया है कि मुख्यमंत्री पद उसके आगे नैतिक रूप से मायने नहीं रखता. एक तरह से गहलोत अब कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी के बाद तीसरे नंबर के नेता हो गए हैं. ऐसे में 7 महीने बाद कांग्रेस अगर राजस्थान में जीत जाती है तो इतना बड़ा पद छोड़कर एक राज्य का मुख्यमंत्री बनने का फैसला करना उनके लिए जिंदगी की सबसे बड़ी दुविधा बनकर रह जाएगा. निश्चित रूप से वे चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाएंगे.

गहलोत के लिए पायलट के प्लान A और B

मार्च-अप्रैल की तेज होती गरमी के बीच अशोक गहलोत को राष्ट्रीय संगठन महासचिव बनाने से राजस्थान में कई चेहरे बसंत के मौसम से खिल उठे हैं. इनमें सचिन पायलट को सबसे ऊपर रखा जा सकता है. आखिर उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी रास्ते से हट गया है. अब पायलट को राजस्थान में फ्री हैंड मिल सकेगा. हालांकि उन्हें सीपी जोशी और जाट नेताओं की तरफ से खतरा बरकरार है. लेकिन ये खतरा उतना बड़ा नहीं है और इनसे निपटना जादूगर गहलोत से निपटने से कम मुश्किल होगा.

सचिन पायलट इसलिए भी खुश होंगे क्योंकि उन्हें पता था कि गहलोत के रहते वे विधानसभा चुनाव लड़ने का जोखिम भी नहीं ले सकते थे. पायलट खेमे के एक नेता के मुताबिक गहलोत की कार्यशैली ऐसी है कि वे अपने प्रतिद्वंद्वी नेता की बाड़ेबंदी कर देते हैं. इस तरह उनका 'शत्रु' अपनी ही जंग में उलझ कर रह जाता है. दूसरा, गहलोत अपने गुट के नेताओं को दूसरे खेमे से टिकट दिलवा देते हैं. चुनाव से पहले तक दूसरा खेमा खुशफहमी पाले रहता है कि उसने गहलोत के 'आदमी' को 'तोड़' लिया लेकिन चुनाव के बाद ये 'टूटा हुआ' आदमी ही मुख्यमंत्री पद के लिए गहलोत का समर्थन कर देता है.

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इस तरह सचिन पायलट को भी डर था कि वे चुनाव लड़े तो सीपी जोशी की तरह फंस सकते हैं और चुनाव जीत भी गए तो सीएम ठीक वैसे ही नहीं बन पाएंगे जैसे 1998 में परसराम मदेरणा. लिहाजा उन्होने गहलोत से निपटने के लिए 2 प्लान तैयार किए थे. पायलट के एक नजदीकी नेता बताते हैं कि प्लान A के तहत गहलोत को राजस्थान से बाहर भिजवाना प्राथमिकता थी. अगर ये कामयाब नहीं रहता तो प्लान B के तहत पायलट युवाओं को मौका देने के नाम पर सीनियर नेताओं को चुनाव से बाहर रखने का शिगूफा छोड़ते.

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सचिन ही नहीं, वसुंधरा भी हुई खुश

सचिन पायलट की तरह बीजेपी और वसुंधरा राजे भी कम खुश नहीं हैं. आखिर बीजेपी और सत्ता में वापसी के बीच गहलोत की राजनीतिक जादूगरी ही सबसे बड़ा रोड़ा हो सकती थी. मुख्यमंत्री के नजदीकी एक नेता ने ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में बताया कि वसुंधरा राजे अपने सामने सचिन पायलट को नौसिखिया ही मानती हैं. निश्चित रूप से पायलट के पास कम अनुभव है और ऐसे में अगर गहलोत राजस्थान में रहते तो वसुंधरा राजे के लिए चुनौती ज्यादा बड़ी हो सकती थी.

बहरहाल, पायलट को प्लान B की जरूरत नहीं पड़ी. अब उनके पास फ्री हैंड है और शॉट लगाने के लिए सामने खुला मैदान. बीजेपी के रूप में विपक्षी टीम की बॉलिंग भी फिलहाल तो कुंद नजर आ रही है. गहलोत के जाने से उनके चहेतों को टिकट भी कम मिलने के आसार हैं. ऐसे में ज्यादा विधायक पायलट खेमे के होंगे और उन्हे मुख्यमंत्री का पद तश्तरी में पेश किया जा सकता है.

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हालांकि, गहलोत आज की राजनीति में उन खांटी नेताओं में से एक हैं जो इतनी आसानी से हार नहीं मानेंगे. गहलोत पर सोनिया गांधी का हाथ है तो अहमद पटेल उनके एहसान तले दबे हैं. और अब तो वे 10 जनपथ के और ज्यादा नजदीक पहुंच गए हैं. ऐसे में वे अपनी जादूगरी और बेहतर तरीके से भी दिखा सकते हैं. हो सकता है वे ऐसा दांव चल जाएं कि मुख्यमंत्री वे नहीं तो सचिन भी नहीं बन पाएं. देखना है क्लाइमैक्स क्या होता है, अभी तो पिक्चर शुरू हुई है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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