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आशीष खेतान का इस्तीफा: सब चले जाएंगे सिर्फ केजरीवाल और सिसोदिया रह जाएंगे!

अब पार्टी से जिस तरह से बड़े, पुराने और संस्थापक नाम जा चुके हैं कि उसे देखकर लगता है कि आम आदमी पार्टी के AAM में अब सिर्फ A और M यानी अरविंद और मनीश ही रह गए हैं

Updated On: Aug 22, 2018 05:43 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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आशीष खेतान का इस्तीफा: सब चले जाएंगे सिर्फ केजरीवाल और सिसोदिया रह जाएंगे!

तीन साल पहले जिस तरह से आप के नामी चेहरों का पार्टी छोड़ने का सिलसिला योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ शुरू हुआ था, वो आजतक जारी है. पत्रकार आशुतोष के बाद अब पत्रकार आशीष खेतान ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया. अब पार्टी से जिस तरह से बड़े, पुराने और संस्थापक नाम जा चुके हैं, उसे देखकर लगता है कि आम आदमी पार्टी के AAM  में अब सिर्फ A और M यानी अरविंद और मनीष ही रह गए हैं.

पत्रकार आशुतोष की ही तरह आशीष खेतान का भी इस्तीफा किसी कॉरपोरेट ऑफिस में कर्मचारी के लिखे इस्तीफे जैसा ही है. यहां भी इस्तीफे के पीछे निजी कारणों का हवाला दिया है. आशीष खेतान ने अपने ट्वीट में लिखा है कि कानून की उच्च शिक्षा के लिये ही वो आम आदमी पार्टी से छुट्टी ले रहे हैं.

ASHISH KHETAN AAP

इस इस्तीफे से पहले आशीष खेतान एक इस्तीफा और दे चुके थे. दिल्ली डायलॉग कमीशन के उपाध्यक्ष के पद से भी वो इस्तीफा दे चुके थे. शायद वो भीतर की दबी-छुपी नाराजगी को उस वक्त अपने इस्तीफे से जाहिर करना चाहते रहे हों लेकिन पार्टी आलाकमान ने उस वक्त कोई तवज्जो नहीं दी. नतीजतन अब वकालत की पढ़ाई का बहाना कर आशीष खेतान ने आम आदमी पार्टी को ही अलविदा कह दिया.

लेकिन बड़ा सवाल उठता है कि आशुतोष के बाद आशीष खेतान का इस्तीफा आखिर कहना क्या चाहता है? अगर ये निजी फैसला नहीं है तो फिर इसके सियासी मायने क्या हो सकते हैं? जाहिर तौर पर पंद्रह अगस्त से लेकर अबतक यानी एक हफ्ते में दो इस्तीफे बिना किसी वजह नहीं हो सकते.

सवाल उठता है कि आखिर वकालत की पढ़ाई करने का जुनून लोकसभा चुनाव से पहले ही क्यों जागा? कहीं खेतान के इस्तीफे के पीछे की वजह लोकसभा चुनाव ही तो नहीं? दरअसल, सियासी गलियारों में ऐसी सुगबुगाहट है कि खेतान नई दिल्ली लोकसभा सीट से दूसरी बार भी लोकसभा का टिकट चाहते थे. लेकिन आम आदमी पार्टी इस बार उन पर दांव लगाने को तैयार नहीं है. टिकट न मिलने की पक्की और पुख्ता खबर मिलने की वजह से ही आशीष खेतान ने इस्तीफा भेज दिया.

फोटो: ट्वीटर

फोटो: ट्वीटर

अब पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल पर दो लोगों को मनाने का मनोवैज्ञानिक दबाव है. आशुतोष के इस्तीफे पर अरविंद केजरीवाल कह ही चुके हैं कि वो इस जनम में तो इस्तीफा मंजूर नहीं करेंगे. अब आशीष खेतान को भी वो पार्टी न छोड़ने के लिये मनाएंगे. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर मनाने के हालात क्यों आए? आखिर क्यों लोगों को अब सरजी के प्यार से डर लगने लगा है?

ऐसा लगता है कि पत्रकारों या फिर दूसरे क्षेत्रों के बड़े चेहरों को पार्टी सिर्फ टीवी डिबेट में प्रवक्ता का चेहरा ही बना कर रखना चाहती है. ऐसे में पार्टी से जुड़े जिन भी लोगों को अपनी उपयोगिता, प्रासंगिकता और महत्वाकांक्षा का भविष्य नहीं दिखा वो लोग पार्टी छोड़ने पर विवश होने लगे. पहले अलग अलग क्षेत्रों के चेहरों के ज़ोर से आम आदमी पार्टी रोशन हुई तो अब ये पार्टी पुराने चेहरों से बड़ी हो गई.

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दरअसल, जिस तरह से पार्टी के दिग्गज चेहरे एक एक कर जाते जा रहे हैं उससे एक ही संदेश जा रहा है. ऐसा लग रहा है कि अब पार्टी को उन चेहरों की जरुरत है जिनसे पार्टी को हर तरह का फायदा मिले. राज्यसभा की सीटों के मामले में बिज़नेसमैन सुशील गुप्ता को उम्मीदवार बनाकर पार्टी ने यही साबित किया है. आम आदमी पार्टी भी राजनीति के उद्योग को कम ही समय में पूरा समझ चुकी है.

पहले आम आदमी पार्टी को अपनी ब्रांड इमेज बनाने की चिंता थी. तभी पत्रकार, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, समाजिक कार्यकर्ताओं का आम आदमी पार्टी में 'इनवेस्टमेंट' किया गया. लेकिन अब पार्टी को अपनी आर्थिक सेहत का ख्याल है. इस वजह से वो अब चेहरों पर निर्भर नहीं है.

हालांकि, आशीष खेतान को पार्टी में स्पेशल ट्रीटमेंट ही मिला है. उन्हें  दिल्ली डायलॉग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया गया था. सरकार के बाहर रहने के बावजूद तमाम सरकारी सुविधाएं मिली थीं. उन्हें नई दिल्ली लोकसभा सीट से टिकट भी मिला था. वो चुनाव हार गए थे. ये तक कहा जाता है कि शाजिया इल्मी की जगह आशीष खेतान को पार्टी ने तरजीह दी थी.

ऐसे में आशीष खेतान के मामले में किसी नाइंसाफी का कोई मामला फिलहाल दिखाई नहीं देता है. उन्हें आम आदमी पार्टी से जो भी मिला वो भरपूर ही मिला. लेकिन टिकट न मिलने पर पार्टी छोड़ने का फैसला करने वाले आशीष खेतान जाते-जाते दबाव बनाना चाहते हैं, तभी वो इस्तीफे को निजी कारण बताते हुए लौटने का दरवाजा भी खुला रखना चाहते हैं जिसकी उम्मीद कम ही लगती है.

सत्येंद्र जैन के साथ अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और स्वाति मालिवाल

सत्येंद्र जैन के साथ अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और स्वाति मालिवाल

दरअसल, इसकी बड़ी वजह ये है कि अब आम आदमी पार्टी दिल्ली में लोकसभा की लिमिटेड सीटों पर राज्यसभा की तरह ही उम्मीदवारी का बड़ा फैसला करना है. पार्टी ये जान चुकी है कि पुराना वक्त जा चुका है. अब पार्टी लोकसभा सीटों पर ऐसे उम्मीदवार चाहती है जिनकी हार से पार्टी को नुकसान भी न हो. शायद ये इशारा आशीष खेतान जल्द समझ गए. तभी उन्होंने इस्तीफा देकर विरोध जताने की राजनीति की. उन्हें लगा कि शायद ये तरीका आम आदमी पार्टी के भीतर भूचाल ला दे. लेकिन आप को अब झटकों की आदत हो गई है. ये पार्टी झटके खाते हुए और झटके देते हुए ही बड़ी हुई है. इसके झटकों को पार्टी के बाहर दिल्ली के एलजी और केंद्र सरकार तक ने झेला है.

आशीष खेतान इससे पहले गुलेल डॉट कॉम में खोजी पत्रकारिता करते थे. पार्टी के लिये भी आशीष खेतान बड़ी खोज थे. लेकिन आम आदमी पार्टी के बदलते चरित्र में बड़ी खोज कब बोझ बन जाए ये कुमार विश्वास से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता. तभी उन्होंने आशुतोष के इस्तीफे पर ट्वीट कर अपनी कथा-व्यथा सुना डाली थी. उन्होंने ट्वीट किया, 'हर प्रतिभा संपन्न साथी की षड्यंत्रपूर्वक निर्मम राजनैतिक हत्या की जा रही है.'

कुमार विश्वास को जब राज्यसभा का टिकट नहीं मिला तब उन्होंने अपनी आत्मा में छिपे 'केजरीवाल काव्य-कोष' के पन्नों को खोलते हुए बताया था कि केजरीवाल ने उनसे वादा किया था कि वो उनको शहीद नहीं होने देंगे. तभी तमाम बगावत के बावजूद कुमार विश्वास को पार्टी से निकाला नहीं गया. ये केजरीवाल की पॉलिटिक्स का 'एडवांस्ड वर्ज़न' है. वो अब विरोधियों को या तो पार्टी से निकालते नहीं हैं या फिर स्वेच्छा से ही छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं.

Kapil Mishra Arvind Kejriwal

कुमार विश्वास,आशुतोष और आशीष खेतान के मामले में इसे समझा जा सकता है. किसी ने पार्टी छोड़ना मुनसिब समझा तो कोई पार्टी में रह कर ही खास मौकों पर अपनी नाराजगी का इजहार करता है.कपिल मिश्रा आम आदमी पार्टी के विधायक हैं और वो केजरीवाल के खिलाफ ही बोलने के लिये जाने जाते हैं. वहीं पार्टी छोड़कर जाने वाले पुराने नामों में शाजिया इल्मी, गुरप्रीत सिंह 'घुग्गी' और विनोद कुमार बिन्नी जैसे नेता हैं जिन्होंने केजरीवाल एंड टीम के फैसलों के खिलाफ पार्टी छोड़ी.

बहरहाल, आम आदमी पार्टी में इस्तीफों का दौर जारी है. अब लगभग सारे पुराने और संस्थापक चेहरे आप को अलविदा कह चुके हैं. ऐसे में सीएम अरविंद केजरीवाल और डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया की पार्टी से अब किसी नए नाम के आप छोड़ने की उम्मीद कम है. कह सकते हैं कि पार्टी अब धीरे धीरे सेटल हो गई है और जो खुद को सेटल नहीं कर सके वो पार्टी छोड़कर जा चुके हैं. कह सकते हैं कि आम आदमी पार्टी को अब पत्रकार,वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, आईपीएस, कवि-साहित्यकार या प्रोफेसर नहीं बल्कि उद्योगपति चाहिये ताकि पार्टी यूं ही चलती रहे.

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