S M L

भारत-आसियान संबंधों में रामकथा करेगी रामसेतु का काम

राम दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी भक्ति का केंद्र हैं तभी हजारों साल पुरानी रामकथा का मंचन आज भी जारी है

Updated On: Jan 20, 2018 09:27 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

0
भारत-आसियान संबंधों में रामकथा करेगी रामसेतु का काम

एक अनीह अरूप अनामा।अज सच्चिदानन्द पर धामा।

ब्यापक विश्वरूप भगवाना।तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।

अर्थात प्रभु एक हैं, उनका कोई रूप या नाम नहीं,उन्हें कोई इच्छा नहीं, वे अजन्मा और परमानंद परमधाम हैं, सर्वव्यापी विश्वरूप हैं. उन्होंने अनेक रूप और शरीर धारण कर कई लीलाएं की हैं. प्रभु राम के प्रति तुलसीदास की भक्ति कहती है कि ईश्वर को किसी एक रूप या नाम से बांधा नहीं जा सकता. वो सर्वत्र व्याप्त हैं. राम के सर्वत्र व्याप्त होने की आस्था को सिर्फ एक देश तक ही सीमित नहीं किया जा सकता. दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में भी लोगों के जेहन में राम जीवित हैं, रामकथा गूंजती हैं और राम की भक्ति से जुड़े तमाम मंदिर और निशानियों के हजारों साल पुराने सिलसिले मिलते हैं. मलेशिया में कुआलालंपुर से पचास किमी दूर थाईलैंड की सीमा के पास साल 1989 में प्रभु राम का सबसे भव्य मंदिर बनाया गया है जहां रामकथा से जुड़ी एक हजार एक प्रतिमाएं और तस्वीरें लगाई गईं हैं.

गणतंत्र दिवस के मौके पर आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष होंगे शामिल

दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की रामकथा का मंचन अब देश में होने जा रहा है. भारत-आसियान संबंधों में ‘राम लहर’ दिखाई दे रही है. इसकी बड़ी वजह ये है कि आसियान के दस देशों के 120 कलाकार राम-कथा का मंचन करेंगे. दिल्ली में होने वाले रामायण महोत्सव में मलेशिया, फिलिपींस, थाईलैंड, इंडोनेशिया,म्यांमार, ब्रुनेई, लाओस और सिंगापुर राम कथा का मंचन करेंगे.

राम कथा के जरिए पहली बार भारत और आसियान देशों के रिश्तों में एक नया अध्याय जुड़ेगा. भारत की लुक ईस्ट पॉलिस के बाद एक्ट ईस्ट पॉलिसी में देशों के रिश्तों में राम-कथा ‘राम सेतु’ का काम करेगी.

Ramayan

आसियान दस दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का समूह है. इस समूह का मकसद आपसी देशों में आर्थिक विकास और व्यापार को बढ़ावा देने के साथ क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम रखना है. आसियान की स्थापना 8 अगस्त 1967 को बैंकॉक में की गई थी. पहली बार गणतंत्र दिवस के मौके पर आसियान देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हो रहे हैं.

यह भी पढ़ें: केजरीवाल सरकार के ‘स्पेशल 20’ हुए अयोग्य, चुनाव आयोग ने चला दी 'झाड़ू'

राम के देश में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को रामकथा सुनाने का मौका मिल रहा है. इसके जरिए रामकथा की विविधाताओं की झलक मिलेगी. कहीं रामायण का नाम अलग है तो कहीं कथा में कुछ अंतर है. लेकिन राम के नाम के साथ कहीं बदलाव नहीं. यानी जो राम हिंदुस्तान में करोड़ों आस्था का केंद्र हैं वहीं राम दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी भक्ति का केंद्र हैं तभी हजारों साल पुरानी रामकथा का मंचन आज भी जारी है.

अयोध्या, दिल्ली, अहमदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद और कोलकाता में होगी रामकथा

थाईलैंड के कलाकार भगवान राम द्वारा मृग मारीच का पीछा करने, सीता हरण और राम-रावण युद्ध का मंचन करेंगे. म्यांमार के कलाकार भगवान राम की जन्मकथा और सीता स्वयंवर का मंचन करेंगे तो सिंगापुर के कलाकार अशोक वाटिका में हनुमान जी के पहली बार मां सीता के दर्शन की कथा का मंचन करेंगे. इंडोनेशिया के कलाकार लखनऊ में सुग्रीव-बाली युद्ध का मंचन करेंगे तो अयोध्या में थाईलैंड के कलाकार राम रावण युद्ध का मंचन करेंगे. कोलकाता में फिलीपींस और ब्रुनेई के कलाकार रामलीला का मंचन करेंगे. फिलीपींस के कलाकार मां सीता की अग्नि परीक्षा का मंचन करेंगे.

अयोध्या, दिल्ली, अहमदाबाद, लखनऊ, हैदराबाद और कोलकाता जैसे शहरों में आसियान देशों की रामकथा का मंचन होगा.

राम कथा ने धर्म,कर्म,समर्पण,आस्था, निष्ठा और माता-पिता के प्रति कर्तव्य के संदेश का प्रचार-प्रसार किया है. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में रामकथा के अनेक रूप मौजूद हैं. रामकथा वहां के जीवन और संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की लोकसंस्कृति में रामायण एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. थाइलैंड में इसे रामकियन यानी रामकीर्ति, कंबोडिया में रामकेर, म्यांमार में रामवत्थु, रामवस्तु और रामाथग्गियन, मलेशिया में हेकायत और लाओस में फ्रलक फ्रराम यानी श्री लक्ष्मण-श्रीराम कहा जाता है. सिर्फ इंडोनेशिया में ही रामकथा के लिए रामायण शब्द का उपयोग किया गया है और इसे रामायण ककविन यानी रामायण-काव्य कहा जाता है.

यह भी पढ़ें: जय भारत-जय इजरायल से क्यों डरा पाकिस्तान? मोसाद तो नहीं असली वजह?

खास बात ये है कि दक्षिण पूर्वी देशों में कई मुस्लिम देश हैं जो पूर्ण श्रद्धा के साथ रामकथा का मंचन करते हैं. इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने एक बार कहा था कि उन्होंने धर्म बदला है लेकिन अपनी संस्कृति नहीं. यानी राम इन देशों की संस्कृति के प्राण हैं.

इंडोनेशिया में हिंदू मंदिर (फोटो: Wikimedia)

इंडोनेशिया में हिंदू मंदिर (फोटो: Wikimedia)

रामायण में रामेश्वरम से ही श्रीलंका तक सेतु बनाने का जिक्र क्यों हैं?

देश के भीतर राम नाम की बहस अदालत के चौखट पर तारीखों की शक्ल में नजर आती है. राम के अस्तित्व पर सवाल उठते हैं और आस्था को पुराणों के हवाले से खारिज तक किया जाता रहा है. सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट को लेकर पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने एक हलफनामा दाखिल करते हुए राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था. ये तक कहा गया था कि राम नाम का कोई इंसान कभी जन्मा ही नहीं तो राम सेतु कैसे बना?

जबकि राम कथा को देश भर में मौजूद हजारों साल पुराने साक्ष्य ही साबित करने का काम करते हैं. अगर ये आस्था का विषय न होता तो भी राम के वजूद की सैकड़ों निशानियां उनकी आस्था को गहराने का काम करतीं. सेतु समुद्रम भी एक उदाहरण ऐसा है जिसे सैटेलाइट इमेज ने सबके सामने नए रूप में रखा तो रिसर्चरों की टीम ने उस पुल को मानव निर्मित ही करार दिया. वहीं पुल पर सवाल उठाने वाले ये नहीं बता सके की आखिर रामायण में रामेश्वरम से ही श्रीलंका तक सेतु बनाने का जिक्र क्यों हैं? जिस सेतु को लेकर करोड़ों लोगों की आस्था पर सवाल उठाए गए तो वो रामायण की तहरीरों के अलावा रामेश्वर के किनारे पर कैसे मौजूद है?

राम की आस्था ही उनको प्रमाणित करती आई है इसके बावजूद सियासत की नजरों ने इस शब्द को राम-राम करना ही बेहतर समझा. ये विडंबना ही है या फिर विधि का विधान कि जिस समय देश की सर्वोच्च अदालत में राम मंदिर को लेकर फैसला लंबित है तो उसी वक्त दूरस्थ देश से लोग भारत आ कर रामकथा का मंचन कर रहे हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi