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ओवैसी के हज सब्सिडी, लड़कियों की पढ़ाई पर रुख से बदलेगी फिजा

450 करोड़ की हज सब्सिडी का इस्तेमाल मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई के लिए

Updated On: Jan 14, 2017 08:42 AM IST

Sreemoy Talukdar

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ओवैसी के हज सब्सिडी, लड़कियों की पढ़ाई पर रुख से बदलेगी फिजा

ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बयान दिया है कि मुसलमानों को सरकार की तरफ से दी जाने वाली हज सब्सिडी बंद कर दी जानी चाहिए. इस पैसे का इस्तेमाल मुस्लिम महिलाओं की पढ़ाई-लिखाई के लिए किया जाना चाहिए. ओवैसी का ये बयान बेहद तरक्कीपसंद है.

इस सुझाव का खुले दिल से स्वागत और समर्थन होना चाहिए. मुस्लिम समुदाय की इस दिक्कत की बरसों से अनदेखी हो रही है.

ओवैसी ने इसे उजागर करके मुस्लिम समुदाय का भला भी किया है और भारतीय मुसलमानों के बारे में होती रही चर्चा का रुख भी बदलने की कोशिश की है. मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई ऐसा मुद्दा है जिसकी और अनदेखी नहीं की जा सकती.

ये भारतीय राजनीति की बड़ी विडम्बना है कि तमाम नेता मुस्लिम हितों की लंबी-चौड़ी बातें करते रहे हैं. मगर मुसलमान आज भी दड़बे की तरह की बंद बस्तियों में ही रह रहे हैं.

उनके कल्याण का जिक्र तो खूब होता है. मगर उनकी भलाई के लिए होने वाले कामों में कतई गंभीरता नहीं दिखती. राष्ट्र के निर्माण में मुसलमानों का योगदान सिर्फ वोट करने तक सीमित रहा है.

25 ग्रेजुएट लोगों में सिर्फ एक मुस्लिम 

मुस्लिम समुदाय ने अपनी तरफ से उन नेताओं को चुना, जिनके बारे में उन्हें यकीन था कि वो मुसलमानों के हितों की बात करेंगे. वहीं राज्य और केंद्र की सरकारों ने समुदाय से कुछ ऐसे लोगों को अपने पाले में कर लिया, जो बात तो मुस्लिम हितों की करें, मगर गुण गाएं सरकार के.

जमीनी हालात बदलें न बदलें, ये मुस्लिम नेता सरकार के हितों की रक्षा करते रहे. अपने समुदाय का भला करने की जिम्मेदारी ऐसे मुस्लिम नेताओं की प्राथमिकता ही नहीं रही.

इस वजह से देश में मुस्लिम तुष्टीकरण की एक परंपरा बन गई है. इसका नुकसान ये हुआ है कि देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय होने के बावजूद, भारतीय राजनीति और देश की तरक्की में मुस्लिम समुदाय की नुमाइंदगी बेहद कम है.

आर्थिक स्थिति हो या शिक्षा हर मोर्चे पर मुस्लिम समुदाय बाकी देश से पीछे है. कई मामलों में तो मुसलमानों की हालत दलितों और आदिवासियों से भी बुरी है.

2006 में आई जस्टिस राजिंदर सच्चर की रिपोर्ट के मुताबिक प्राइमरी शिक्षा के बाद ही औसत मुस्लिम बच्चे पढ़ाई करना छोड़ देते हैं. ये एक बीमारी जैसा है.

MuslimWomen

इंटरनेशनल इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के आंकड़े बताते हैं कि 6 से 14 बरस की उम्र के एक चौथाई मुस्लिम बच्चे या तो कभी स्कूल नहीं गये, या फिर बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी.

इसी वजह से मुस्लिम ग्रेजुएट्स की तादाद बेहद कम है. आज देश के 25 ग्रेजुएट लोगों में से सिर्फ एक मुसलमान है, वहीं पोस्ट ग्रेजुएट की बात करें तो ये आंकड़ा पचास में एक मुस्लिम का है.

मुसलमान देश की कुल आबादी का 14 फीसदी हैं. लेकिन सेना में केवल तीन फीसदी जवान ही मुस्लिम हैं. रेलवे में केवल पांच फीसदी कर्मचारी मुस्लिम हैं. वहीं बैंकिंग में ये तादाद केवल 3.5 प्रतिशत है.

देश के प्रशासनिक ढांचे में भी मुसलमानों की भागीदारी बेहद कम है. आईएएस और आईपीएस में केवल तीन प्रतिशत मुसलमान हैं. हर 5.73 लाख मुसलमान में एक आईएएस या आईपीएस हैं.

बाकी समुदायों की बात करें तो प्रति 1.08 लाख आबादी पर एक आईएएस या आईपीएस होता है.

देश के मुसलमानों की इस बुरी स्थिति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी कांग्रेस की है, क्योंकि उसी ने देश पर सबसे ज्यादा वक्त तक राज किया है.

कांग्रेस ने मुसलमानों के नाम का इस्तेमाल तो खूब किया, लेकिन असल में उनकी तरक्की के लिए ठोस कदम कभी नहीं उठाया. सिर्फ नाम के लिए मुसलमानों की भलाई की बातें कांग्रेस करती रही है.

आज बहुत सी पार्टियों ने कांग्रेस की इस मुस्लिम नीति को अपनाया हुआ है और मजे से सिर्फ मुसलमानों के हितों की बात कर-करके पल्ला झाड़ लेते हैं. जबकि जमीनी हालात सुधरते ही नहीं.

कांग्रेस भी है मुस्लिम तुष्टीकरण की जिम्मेदार

2006 में सच्चर रिपोर्ट आने के बाद 2013 में अर्थशास्त्री अबू सालेह शरीफ ने एक रिपोर्ट तैयार की. अबू सालेह अमेरिका-इंडिया पॉलिसी इंस्टीट्यूट से जुड़े स्कॉलर हैं. उनकी रिपोर्ट का नाम था: सिक्स इयर आफ्टर सच्चर-अ रिव्यू ऑफ इनक्लूसिव पॉलिसीज इन इंडिया.

ये रिपोर्ट कहती है कि सच्चर रिपोर्ट आने के छह साल बाद भी मुसलमानों की हालत में रत्ती भर का फर्क नहीं आया. इस दौरान कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार का राज था.

मनमोहन सरकार ने सच्चर रिपोर्ट का खुलकर समर्थन किया था. तब की सरकार ने कहा था कि वो मुसलमानों की हालत सुधारने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगी ताकि वो मुख्यधारा से जुड़ सकें. देश की तरक्की में हिस्सेदार बन सकें. उन्हें सरकारी योजनाओं का फायदा मिल सके. मगर अबू सालेह की रिपोर्ट के मुताबिक, मनमोहन सरकार ने मुसलमानों की भलाई के लिए कुछ भी नहीं किया, सिवाय बातों के.

Owaisi

ऐसे में ओवैसी का ये बयान कि हज सब्सिडी के तौर पर दिये जाने वाले 450 करोड़ रुपयों का बेहतर इस्तेमाल मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई के लिए किया जाए, एक स्वागतयोग्य बयान है. इसके दूरगामी नतीजे हो सकते हैं.

बुधवार को ओवैसी ने कहा था, '450 करोड़ की हज सब्सिडी का इस्तेमाल मुस्लिम लड़कियों की पढ़ाई के लिए, उनके लिए स्कूल खोलने और हॉस्टल बनाने के लिए होना चाहिए. 450 करोड़ रुपए बड़ी रकम है. एक मुसलमान के तौर पर मैं हज पर जाने के लिए कोई सब्सिडी नहीं पाता.'

'हज करने जाना उस मुसलमान के अनिवार्य है, जिसके पास इसका खर्च उठाने के पैसे हैं. हमें हज के लिए कोई सब्सिडी नहीं चाहिए. इस पैसे को मुस्लिम लड़कियों को वजीफे के तौर पर दे देना चाहिए. इससे मुस्लिम समुदाय का ज्यादा भला होगा.'

हाल के दिनों में मुस्लिम महिलाओं ने समुदाय की पुरानी परंपराओं के खिलाफ जोर-शोर से आवाज उठाई है. ऐसे में उनका शिक्षित होना, समुदाय में इंकलाबी बदलाव ला सकता है. इसे मुसलमानों को लेकर होने वाली राजनीति में भी बदलाव आएगा.

सऊदी अरब ने हज पर जाने वाले भारतीय मुसलमानों का कोटा बढ़ा दिया है. उसके बाद सरकार ने हज सब्सिडी की समीक्षा के लिए 6 सदस्यों की एक कमेटी बनाई है. इस कमेटी को ओवैसी के सुझाव पर भी विचार करना चाहिए. ये एक क्रांतिकारी कदम होगा.

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