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किसिम किसिम के गरीब: सीएम को भी सताती है 'गरीबी'

देश में गरीबी के इतने प्रकार हैं कि पीएचडी की जा सकती है

Piyush Pandey Updated On: Apr 05, 2017 09:09 AM IST

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किसिम किसिम के गरीब: सीएम को भी सताती है 'गरीबी'

ये देश रसातल में जा रहा है. यहां मुख्यमंत्री तक का विकास नहीं हो पा रहा तो जनता का क्या खाक होगा? यहां मुख्यमंत्री को भी गरीब होने का तंज सुनना पड़ रहा है.

गरीब मुख्यमंत्री अपना केस तक नहीं लड़ सकता. अल्ल-बल्ल बोलने के बाद कोर्ट में मामला पहुंचा तो जनता के पैसे से केस लड़ने का प्रोग्राम बनाया. चूंकि मुख्यमंत्री जनता का, पैसा जनता का तो केस भी जनता का. इस लॉजिक के हिसाब मानहानि केस में वकील का पैसा जनता को ही भरना चाहिए. लेकिन उपराज्यपाल साहब जनता से कटे हुए हैं. कोई केस भी उन्होंने खुद पर ठुकवा नहीं रखा है. तो उन्होंने ऐसा होने नहीं दिया. नतीजा-जनता का मुख्यमंत्री 'गरीब' होने का तंज सह रहा है.

लेकिन मुद्दा सिर्फ दिल्ली के मुख्यमंत्री के गरीब होने का नहीं है. इस देश का हर शख्स गरीब ही लगता है. देखिए, विजय माल्या भी कितना गरीब निकला. फकत 9000 करोड़ रुपए चुकाने थे. एक जमाने में इत्ते रुपए तो वो सुंदरियों के कैलेंडर पर लुटा दिया करते थे. लेकिन-गरीबी आई तो सुंदरियां और कैलेंडर सब छूट गए. समाज के एक बड़े वर्ग की सेवा में निकाले जाने वाले कैंलेंडर छपना बंद हो गए. गरीबी ने सब बंद करवा दिया. माल्या साहब गरीबी की अवस्था में ही देश छोड़ने को मजबूर हो गए. क्या करें. जानते हैं कि गरीब की कोई नहीं सुनता. कोर्ट भी नहीं सुनेगा.

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दरअसल, गरीबी किसिम किसिम की है. अब कल ही पड़ोसी चोपड़ा साहब घर आए तो बोले-

‘यू नो, फंड का क्राइसिस है. मुंबई और दिल्ली के फ्लैट की किस्त देने में पसीने छूट रहे हैं. बेटे ने जन्मदिन पर कार की डिमांड की थी. महीना बीत गया लेकिन डिमांड पूरी नहीं कर पा रहा. बीवी अलग नाराज है. बैंकॉक की ट्रिप पर गए छह महीने बीत गए. लंदन का वादा था...लेकिन उफ.... यार,  बहुत गरीबी है.'

चोपड़ा साहब इन्हीं भावुक शब्दों में अपनी गरीबी की व्याख्या करते हुए हमारी गरीबी पर चार लात लगा गए. चोपड़ा साहब जैसी अपनी गरीबी होती तो अपन पूरी फैमिली के साथ मां के दरवाजे मत्था टेकने चले जाते. लेकिन, चोपड़ा साहब की गरीबी रॉयल है.

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अपनी गरीबी भी गरीब टाइप की है.

गाड़ी को हफ्ते में सात के बजाय चार दिन बाहर निकालना पड़ रहा है. रेस्तरां तो महीने का आयोजन हो गया है. न्यूयॉर्क-लंदन तो बहुत दूर बेंगलोर-चेन्नई का प्रोग्राम भी पेडिंग की मुद्रा से कई बार गुजरने के बाद आखिरकार ‘द एंड’ की परममुद्रा में समाहित हो लिया है. इधर, कामवाली झटके में 400 रुपए बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल पर जाने की धमकी दे चुकी है. घर की संसद में सिर्फ हम मियां-बीवी हैं, लिहाजा कामवाली की वेतन वृद्धि का प्रस्ताव चाहकर भी शीतकालीन सत्र तक के लिए अटका नहीं सकते.

कामवाली की अपनी गरीबी है. गांव में मकान लिया है, तो उसके लिए पच्चीस हजार रुपए का बंदोबस्त करना है. उसका छोरा अड़ा है बाइक के लिए तो उसकी जुगाड़ करनी है. बेटी का ब्याह करना है, तो उसमें भी पचास-पचहत्तर हजार से कम क्या खर्च होंगे? कश्मीर के दिहाड़ी पत्थरबाजों की अपनी गरीबी है. कहते हैं इत्ती मेहनत से पत्थर फेंकते हैं. पुलिस के जवानों को घायल करते हैं. लेकिन आका सिर्फ 6-7 हजार रुपए पकड़ाकर टरका देते हैं. कई साल से कोई इंक्रीमेंट नहीं.

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गरीबी से सभी को शिकायत है. एक नेताजी ने संपत्ति की घोषणा में 12000000000000 करोड़ रुपए की रकम खाते में दिखायी. लेकिन, वह भी गरीब हैं. कहते हैं-खाते की मुद्रा का तेजी से अवमूल्यन हो रहा है. गरीबी उत्तरोत्तर आ रही है. नोटबंदी के बाद जिन धन्नासेठों की रकम जनधन खाते में जमा हुई है-वो अलग टाइप के गरीब हैं. ऐसे गरीब, जिनके पास धन है मगर नहीं है.

दरअसल, इस देश में गरीबी के इतने प्रकार हैं कि पीएचडी की जा सकती है. गरीबी कम हो नहीं रही लेकिन गरीबों की संख्या कम करने के दावे हैं. कहीं 32 रुपए रोज कमाने वाले को गरीब नहीं माना जाता और कहीं मुख्यमंत्री भी खुद को 'गरीब' कहलाकर खुश है.

यानी सबकी अपनी अपनी गरीबी है. सिवाय उस गरीब के, जो रोज रात में भूखा सोने को अभिशप्त है. क्योंकि उसकी गरीबी सिर्फ गरीबी नहीं-उसकी नियति है, और इस गरीबी पर रोटी नहीं वोटों की फसल लहलहाती है.

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