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केजरीवाल अब सीएम हैं एनजीओ के हेड नहीं...कब तक करेंगे हिट एंड रन पॉलिटिक्स

अब केजरीवाल फिर शांति से इलाज कराने चले जाएंगे. दस दिन बाद लौटेंगे. फिर कोई ट्वीट करेंगे, जिसमें बगैर किसी का नाम लिए पीएम पर आरोप होंगे. सहयोग न मिलने की बात फिर कही जाएगी

Updated On: Jun 22, 2018 09:23 AM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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केजरीवाल अब सीएम हैं एनजीओ के हेड नहीं...कब तक करेंगे हिट एंड रन पॉलिटिक्स
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महाभारत में अभिमन्यु का किरदार हर किसी को पता है. चक्रव्यूह में जाना, जमकर लड़ना और आखिर में वीरगति को प्राप्त हो जाना. अभिमन्यु को चक्रव्यूह में जाना तो आता था, बाहर आना नहीं. वर्तमान राजनीति में ऐसे ही एक किरदार का नाम अरविंद केजरीवाल है. अभिमन्यु की तरह उन्हें समस्याओं के चक्रव्यूह में प्रवेश करना आता है. लेकिन उसे जीतकर बाहर आना नहीं. हां, महाभारत के अभिमन्यु और केजरीवाल में एक खास अंतर है. अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए थे. केजरीवाल हर समस्या के बाद द्रुतगति को प्राप्त होते हैं. वो द्रुत गति यानी तेज रफ्तार के साथ समस्याओं के चक्रव्यूह को चकमा देते हुए ‘गायब’ हो जाते हैं.

हर बार वो किसी समस्या को पकड़ते हैं. उससे जूझने का ऐलान करते हैं. उसके लिए कोई ऐसा तरीका अख्तियार करते हैं, जिससे सुर्खियां उनसे दूर न हो पाएं. उसके बाद समस्या जस की तस रहती है, केजरीवाल कहीं और निकल जाते हैं. कभी विपश्यना में, कभी खांसी के इलाज में और जैसा इस बार कहा जाता है, कभी सुगर लेवल का इलाज कराने.

पिछले दिनों उनकी राजनीति बाबुओं या बेहतर भाषा में आईएएस अफसरों के खिलाफ थी. 11 जून को अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट करके तीन मांगें बताईं. पहली, आईएएस अधिकारी काम पर लौटें. दूसरी, काम रोकने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो. तीसरी, डोर टू डोर राशन डेलीवरी की सुविधा शुरू की जाए. ये मांग लेकर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और गोपाल राय उप राज्यपाल यानी एलजी के घर गए और उनके ऑफिस में धरने पर बैठ गए.

Arvind-Kejriwal

आईएएस अधिकारियों ने दावा किया कि वो तो काम कर रहे हैं. उनकी हड़ताल सांकेतिक है. दूसरी तरफ, आप की तरफ से लगातार दावा होता रहा कि कैसे अधिकारियों के साथ न देने की वजह से कामकाज में व्यवधान पड़ रहा है. एक दिन बीता, दो दिन बीते, तीन-चार-पांच होते-होते आठ दिन बीत गए. एलजी का जवाब नहीं आ रहा था. केंद्र सरकार भी कुछ नहीं कर रही थी.

कुछ दिन बीतने के बाद जरूर केजरीवाल ने पीएम को ट्वीट किया, पत्र लिखा, अपील की. आखिर बीच का रास्ता निकालते हुए उन्होंने वही किया, जो कुछ समय पहले कोर्ट केस में कर चुके थे. ऐसा पत्र लिखा, जो माफी जैसा ही था. आश्वासन दिया गया था कि सभी अधिकारी काम पर लौट आएं.

धरने के दौरान केजरीवाल तो अनशन पर नहीं बैठे थे. लेकिन मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन ने अनशन किया. तबीयत बिगड़ी. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. वहां से दोनों काम पर लौट गए. अनशन टूटने की वो रस्मी तस्वीरें भी सामने नहीं आईं, जब कोई ‘बड़ा आदमी’ जूस पिलाकर अनशन तुड़वाता है.

केजरीवाल को विपक्ष का साथ भी मिला. चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित विपक्षी नेताओं की तरफ से केजरीवाल को सपोर्ट किया गया. लेकिन असली सवाल बरकरार है कि आखिर इससे हासिल क्या हुआ? क्या वो समस्याएं सुलझाने का आश्वासन मिला, जिसका जिक्र केजरीवाल लगातार करते रहे हैं? यहां तो एलजी ने तब तक कोई जवाब नहीं दिया, जब तक केजरीवाल ने पत्र लिखकर अधिकारियों से काम पर लौटने की अपील नहीं की. उन्होंने अपील के अलावा अधिकारियों को सुरक्षा देने का आश्वासन दिया. इसके बाद एलजी ने दोनों पक्षों को आपस में बात करने के लिए कहा.

ऐसा नहीं है कि केजरीवाल को पता न हो कि जिन समस्याओं का जिक्र करके वो इस तरह की हरकत करते हैं, उनका समाधान कैसे निकल सकता है. ऐसा भी नहीं है कि पूर्ण राज्य की मांग करते समय उन्हें पता नहीं है कि ऐसा फिलहाल नहीं होगा. लेकिन यही उनका स्टाइल है. इसे वो बदलने के लिए तैयार नहीं हैं. जिस गुरिल्ला राजनीतिक स्टाइल से उन्होंने राजनीति शुरू की थी, उसे उन्होंने नहीं बदला है.

वो कुछ महीने चुप रहे. उन्होंने सबसे माफी मांगी. इस दौरान किसी ने कमेंट भी किया कि जो माफ कर रहे हैं, वो बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं. जब सारे कोर्ट केस निपट गए, तो केजरीवाल वापस अपने ही बनाए चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह घुसने को तैयार हो गए. जहां से उनका लक्ष्य चक्रव्यूह तोड़ना नहीं, उसमें घुसना और चकमा देते हुए निकल कर अगले चक्रव्यूह में घुसने की तैयारी करना है. इस बार भी उन्होंने धरने के चक्रव्यूह में घुसने का फैसला किया. दिलचस्प यह था कि दिल्ली की उमस भरी गर्मी में उन्होंने जगह चुनी एलजी का एयर कंडीशंड ऑफिस.

arvind kejriwal

प्रतीकात्मक तस्वीर

नतीजा यह हुआ कि बाहर दिल्ली के गर्मी में शुरुआती दिनों में जो प्रोग्राम थे, वो फ्लॉप हुए. ज्यादा लोग नहीं पहुंचे. पहुंचे भी, तो रुके नहीं. हां, प्रधानमंत्री निवास पर जाने के लिए मंडी हाउस पर इकट्ठा लोगों की तादाद काफी ज्यादा थी.

दिलचस्प है कि केजरीवाल अफसरों के काम रोकने की तो मांग करते रहे. लेकिन अपने स्तर पर जो काम रुके हैं, उनका जिक्र वह नहीं करते. जैसे हजार इलेक्ट्रिक और हजार स्टैंडर्ड फ्लोर बसों की खरीद में अफसरों के सहयोग की जरूरत नहीं थी. लेकिन वो काम आगे नहीं बढ़ा. एसटीपी और सीवरेज सिस्टम की शुरुआत होनी है. हालांकि अभी डेडलाइन बाकी है. लेकिन समय पर सब हो पाएगा, यह जानने के लिए इंतजार करना पड़ेगा. स्कूलों में करीब सवा लाख सीसीटीवी कैमरे लगने हैं. हॉस्पिटल में इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम शुरू होना है.

सवाल यह है कि जो आपके हाथ में नहीं है, उससे पहले क्या वो काम करना बेहतर नहीं, जो आपके हाथ में है? लेकिन वो करने से उस तरह की सुर्खियां नहीं मिलतीं, जो धरना करने से मिलती हैं. वो उस वक्त धरने पर बैठे, जब दिल्ली के कई इलाके पानी की भारी कमी से जूझ रहे थे. पानी के लिए मार हो रही थी. उस दौरान केजरीवाल एलजी हाउस में सोफे पर पसरे हुए समस्याओं के समाधान का इंतजार कर रहे थे.

केजरीवाल को पहले ही पता था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री की क्या सीमितताएं होती हैं. उन्हें पहले से पता था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री की ताकत कितनी होती है. उन्हें यह भी पता है कि कोई ऐसा जादुई चिराग नहीं, जिसे घिसने से अचानक ताकत बढ़ जाए. इसके लिए सिस्टम के सहयोग से ही आगे बढ़ना पड़ेगा. लेकिन सहयोग ही तो वो शब्द है, जिससे केजरीवाल दूर रहे हैं.

यह सही है कि केजरीवाल सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अच्छा काम किया है. लेकिन यह बात और भी क्षेत्रों के लिए कही जा सकती थी, अगर सरकार गुरिल्ला वॉर को छोड़ कुछ और तरीके अख्तियार करती. इसमें भी एक पेंच है. शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार हुआ है, तो यहां ब्यूरोक्रेसी से कुछ तो मदद मिली होगी. उसकी बात केजरीवाल सरकार नहीं करती. वो लगातार कहते हैं कि मोदी सरकार उनका साथ नहीं देती. लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि शीला दीक्षित सरकार ने भी दिल्ली पर राज किया है. 15 साल के शासन में काफी वक्त ऐसा था, जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी.

उस वक्त दिल्ली में तमाम अच्छे काम हुए. वो दौर था, जब दिल्ली वाले ब्लूलाइन और रेडलाइन बसों से जूझ रहे थे. उंगलियों से खिड़की ग्रिल पकड़े लटके यात्रियों की याद उस दौर के दिल्लीवासियों को अच्छी तरह होगी. दिल्ली मेट्रो और सीएनजी बस जैसे काम उस समय हुए. शीला दीक्षित की सरकार को भ्रष्टाचार के लिए ही नहीं, तमाम अच्छे कामों के लिए याद किया जाता है. कॉमनवेल्थ खेलों के वक्त हालांकि केंद्र में भी कांग्रेस या यूपीए सरकार ही थी, लेकिन उस दौर ने दिल्ली की शक्ल बदली.

केजरीवाल सरकार के साथ तो अच्छे काम तमाम विवादों के बीच ही आए हैं. आखिर ऐसा क्यों है कि मुख्य सचिव को मारपीट की शिकायत करनी पड़ी. हमें नहीं पता कि उन्हें मारा-पीटा गया या नहीं. लेकिन जिस तरह पूरी घटनाएं हुईं, वो संदेह तो पैदा करती ही हैं. इससे पहले योगेंद्र यादव या प्रशांत भूषण को निकालने से लेकर तमाम ऐसी घटनाएं हैं, जहां लगता नहीं कि कोई राजनीतिक पार्टी काम कर रही है. उसमें गुरिल्ला पार्टी जैसे ही संकेत मिलते हैं.

प्रशांत भूषण

प्रशांत भूषण

अब वो फिर शांति से इलाज कराने चले जाएंगे. दस दिन बाद लौटेंगे. फिर कोई ट्वीट करेंगे, जिसमें बगैर किसी का नाम लिए पीएम पर आरोप होंगे. सहयोग न मिलने की बात फिर कही जाएगी. जुलाई के पहले सप्ताह में फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए रैली वगैरह की जाएगी. मांगें फिर उठेंगी, वो पूरी होने से पहले केजरीवाल रैली से उठ जाएंगे. ...और दिल्ली बेचारी यूं ही ताकती रह जाएगी.

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