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दिल्ली के लिए कभी 'बाहरी' रहे केजरीवाल अब इलाज को लेकर क्यों कर रहे हैं क्षेत्रवाद?

सवाल उठता है कि दिल्ली की गद्दी पर अगर कोई बाहरी व्यक्ति बैठ कर शासन कर सकता है तो फिर दिल्ली के अस्पतालों में किसी बाहरी को इलाज की समान सुविधाएं क्यों नहीं मिल सकतीं

Updated On: Jul 27, 2018 04:42 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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दिल्ली के लिए कभी 'बाहरी' रहे केजरीवाल अब इलाज को लेकर क्यों कर रहे हैं क्षेत्रवाद?

जीटीबी हॉस्पिटल में दिल्ली के ‘बाहरी’ लोगों का मुफ्त इलाज अब और नहीं हो सकेगा. दिल्ली सरकार ने 'बाहरियों' के इलाज पर पहरा बिठाने का फैसला लिया है. जीटीबी में सिर्फ दिल्ली का पहचान पत्र दिखाने वाले मरीजों को ही नि:शुल्क जांच और दवाओं की सुविधाएं मिलेंगी. इसके पीछे दिल्ली सरकार की दलील है कि गुरु तेग बहादुर अस्पताल में भीड़ कम करने के लिए यह प्रयोग शुरू किया जा रहा है.

दिल्ली के स्वास्थ्य महानिदेशालय के मुताबिक, दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में 40 फीसदी मरीज बाहर के होते हैं जिस वजह से दिल्ली के लोगों को सुविधाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता है. जीटीबी अस्पताल को केजरीवाल सरकार ने इस ‘ट्रायल रन’ को 20 दिनों में शुरू करने का निर्देश दिया है.

क्या 'बाहरी' व्यक्ति देश का नागरिक नहीं?

सवाल उठता है कि दिल्ली की गद्दी पर अगर कोई बाहरी व्यक्ति बैठ कर शासन कर सकता है तो फिर दिल्ली के अस्पतालों में किसी बाहरी को इलाज की समान सुविधाएं क्यों नहीं मिल सकतीं?

आज अगर सरकार जीटीबी अस्पताल को नया नियम लागू करने का निर्देश दे रही है तो आने वाले समय में दिल्ली सरकार के अधीन आने वाले दूसरे अस्पतालों से भी 'बाहरी' मरीजों की बिना इलाज के 'छुट्टी' हो सकती है.

Arvind Kejriwal, the leader of the anti-corruption Aam Aadmi Party (AAP), is helped by his party supporters as he prepares to take a dip in the waters of the Ganges river after he arrived to attend a public rally ahead of the general elections in Varanasi, in the northern Indian state of Uttar Pradesh, March 25, 2014. REUTERS/Stringer (INDIA - Tags: POLITICS ELECTIONS) - GM1EA3P1FN001

आखिर बाहरी लोगों को लेकर दिल्ली के हुक्मरानों के तेवर इतने तल्ख क्यों हो जाते हैं? पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा था कि दिल्ली में सबसे ज्यादा अपराध 'बाहरी' लोगों के आने की वजह से होते हैं तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते  हैं कि दिल्ली के अस्पतालों में 70 फीसदी ‘बाहरी’ मरीजों की वजह से भीड़ होती है.

बाहरी व्यक्ति क्या देश का नागरिक नहीं है?  क्या देश के किसी भी इलाके में इलाज कराना उसका अधिकार नहीं है?

अगर ‘बाहरी’ व्यक्ति को देश के संविधान ने बराबरी का अधिकार नहीं दिया होता तो आज अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित दिल्ली के सीएम नहीं बने होते. अरविंद केजरीवाल खुद हरियाणा के भिवानी से आते हैं और उनकी राजनीति यूपी के गाजियाबाद के कौशांबी में रह कर फली-फूली. यही स्थिति डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के साथ भी है. वो भी दिल्ली में केजरीवाल सरकार के मुताबिक बाहरी ही हैं.

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दिल्ली की कॉसमोपॉलिटन कल्चर ही इसकी खूबसूरती है. अपने आप में ये मिनी इंडिया है. देश की राजधानी को पूरा देश बेहतर अवसर, स्वास्थ्य और शिक्षा के तौर पर देखता है. तभी देश के दूरदराज के इलाकों से लोग यहां आते हैं. उसी भीड़ में गरीब और मजदूर के तबके के वो लोग भी होते हैं जो रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आते हैं. ऐसे लोगों के लिए बीमारी के वक्त एम्स और जीटीबी अस्पताल ही सबसे बड़ा आसरा होते हैं.

आखिर क्यों गरीब लोग जीटीबी का रुख करते हैं?

जीटीबी को पूर्वी दिल्ली का बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस अस्पताल माना जाता है. यहां लगभग सारी ही सुविधाएं मौजूद हैं. यहां मरीज न सिर्फ नि:शुल्क जांच करा पाते हैं बल्कि नि:शुल्क दवा भी मिल जाती है लेकिन दिल्ली सरकार सोचती है कि ये सुविधाएं सिर्फ दिल्ली वालों को मिलनी चाहिए क्योंकि इससे अस्पताल पर बोझ बढ़ता है.

माना जाता है कि जीटीबी में सबसे ज्यादा दिल्ली से सटे यूपी से 35 फीसदी मरीज इलाज के लिए आते हैं. दिल्ली सरकार के बाहरी लोगों की मुफ्त दवा और जांच बंद करने से सबसे ज्यादा इन पर ही असर पड़ेगा. दिल्ली सरकार के इस फैसले से गरीब और मजदूर तबके के लोगों को बाहरी होने की सज़ा मिलेगी.

'बाहरी' केजरीवाल 'बाहरी' लोगों पर बरसे

सीएम अरविंद केजरीवाल की कर्मभूमि यूपी की कौशांबी रही है लेकिन उन्होंने दिल्ली को सियासत का कुरुक्षेत्र बनाया. अब उन्हें ही दूसरे राज्यों के मरीज खटक रहे हैं क्योंकि दिल्ली सरकार के अस्पताल अपनी खस्ता हालत के लिए बाहरी मरीजों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

इसी साल जनवरी में एक दिन केजरीवाल ने जीटीबी अस्पताल का अचानक दौरा किया था. उन्होंने अस्पताल में मरीजों की भीड़ शायद पहली बार देखी और अफरातफरी को देखकर ट्वीट कर दिया - 'देश की राजधानी में 70 फीसदी मरीज दूसरे राज्यों से हैं.' उनके ट्वीट पर सवाल उठता है कि क्या इन 70 फीसदी मरीजों को वापस उनके राज्य डिपोर्ट कर देना चाहिए?

From the outdoors to LG office, another unorthodox protest from Kejriwal

आखिर इलाज जैसे संवेदनशील मसले पर आप सरकार अमानवीय कैसे हो सकती है? इस फैसले से खुद को आम आदमी की सरकार कहने वाली केजरीवाल सरकार का गरीब विरोधी चेहरा ही सामने आ रहा है.

जीटीबी पर निगाहें-वोटरों पर निशाना

दिल्ली सरकार इस फैसले को दिल्ली की जनता से जोड़कर सही साबित करने की कोशिश कर रही है. खुद को दिल्ली की जनता का असली रहनुमा बता कर दरअसल केजरीवाल सरकार ने बड़ी सफाई के साथ दिल्ली के वोटरों को रिझाने के लिए इस 'स्कीम' की शुरुआत की है.

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दिल्ली के वोटरों के पहचान-पत्र देखकर ही इलाज की सहूलियतें दी जाएंगी. भले ही वोटर आईडी कार्ड रखने वाला शख्स मूल रूप से देश के किसी भी कोने का क्यों न हो लेकिन ‘आप’ के लिए वो ‘बाहरी’ बाद में है और पहले दिल्ली का ‘वोटर’ है. जबकि जिस शख्स के पास दिल्ली का पहचान-पत्र नहीं होगा तो उस बाहरी को इलाज न दे कर वोट न मिलने का जोखिम भी नहीं है. इसे देखकर लगता है कि केजरीवाल एक दूसरी दिल्ली की तस्वीर बनाना चाहते हैं.

इलाज के नाम पर क्षेत्रवाद जायज नहीं

दिल्ली सरकार की ऐसी दलीलें ही दिल्ली के पूर्ण राज्य की मांग को कठघरे में खड़ा करने का काम करती हैं. मान लीजिए, अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल जाता है तो भविष्य में केंद्र सरकार से दिल्ली सरकार का टकराव किसी भी स्तर पर जा सकता है. हो सकता है कि दिल्ली की कोई सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार के रिपब्लिकन डे परेड आयोजन, आजादी समारोह, विदेशी मेहमानों के आगमन, पीएम के दिल्ली निवास, केंद्र सरकार के मंत्रियों के आवागमन पर ही रोक लगाने का आदेश सुना दे.

Arvind-Kejriwal

बहरहाल, ऐसी संभावना की आशंका नहीं दिखती है लेकिन इलाज के नाम पर क्षेत्रवाद को किसी भी रूप में जायज नहीं ठहराया जा सकता है. एक तरफ केंद्र के साथ अधिकारों की लड़ाई हो रही है तो दूसरी तरफ मरीजों में भेदभाव कर अधिकारों का दुरुपयोग भी सामने आ रहा है.

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने भी इसी तरह मुंबई से बाहरियों को बाहर निकालने का फरमान सुनाया था. नौकरी और आजीविका की तलाश में मुंबई आए यूपी-बिहार के लोगों पर मनसे ने जमकर कहर बरपाया था. केजरीवाल भी उसी क्षेत्रवाद की सियासी फसल दिल्ली में उगाने की फिराक में हैं.

इंतजार कीजिए. हो सकता है कि आने वाले समय में दिल्ली में बाहरी लोगों की एंट्री पर रोक का भी कोई फैसला सरकार ले ले ताकि दिल्ली पर से आबादी का बोझ कुछ कम हो.

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