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बेंड इट लाइक केजरीवाल: सर 'झुकाने' की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

भगतसिंह और गांधी को तो छोड़ दें, केजरीवाल तो आज दूर-दूर तक वैसा भी नहीं जान पड़ते जैसा होने का दावा कभी उनके बारे में किया जाता था

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Mar 21, 2018 10:37 AM IST

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बेंड इट लाइक केजरीवाल: सर 'झुकाने' की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

दिल्ली विधानसभा के चुनाव से पहले एक वक्त वह भी था जब अरविंद केजरीवाल के हर टीवी इंटरव्यू में बतौर पृष्ठभूमि भगतसिंह की तस्वीर नुमायां हुआ करती थी. अपने दर्शकों के लिए केजरीवाल शहीद-ए-आजम की तस्वीर चुना करते थे क्योंकि तस्वीर बहुत कुछ उनसे मेल खाती थी, खासकर मूंछों की मरोड़ के एतबार से.

केजरीवाल ‘मैं भगत सिंह हूं’ के ठीये से चलकर ‘मैं महात्मा गांधी हूं’ के मुकाम तक पहुंचे. उनका इस मुकाम तक पहुंचना एक खास वाकये के जरिए बड़े बेहतर ढंग से बयां होता है. तब नितिन गडकरी ने उनपर मानहानि का मुकदमा किया था और केजरीवाल ने बेल बांड भरने की जगह तिहाड़ जेल में वक्त गुजारना कहीं ज्यादा ठीक समझा. केजरीवाल के समर्थक बताते हैं कि ऐसा करने की प्रेरणा उन्हें महात्मा गांधी की जिंदगी के एक वाकये से मिली थी. किस्सा मशहूर है कि एक अंग्रेज मैजिस्ट्रेट ने चंपारण में जब महात्मा गांधी को रिहा करने से मना किया तो महात्मा ने जमानत की अर्जी लगाने से इनकार कर दिया था.

लेकिन नहीं, केजरीवाल ना तो चंपारण वाले गांधी हैं और ना ही शहीद-ए-आजम भगतसिंह. केजरीवाल दरअसल दिल्ली के गिरगिट हैं, गुलाटीबाजों के उस्ताद और बुजदिली के सबसे बड़े इश्तेहार. केजरीवाल बिल्कुल वही हैं जो कभी उनके बारे में कहा गया था यानी कि एक भगोड़ा.

अपने सिद्धांतों और उसूलों को धोखा दिया

जो गांधी और भगत सिंह आज जिंदा होते तो केजरीवाल की हाल की गिरगिट सरीखी हरकत पर शर्मसार होते. पहले तो दिखावा यह किया कि हम सिद्धांतों पर अडिग रहने वाली शख्सियत हैं, हमारी रीढ़ फौलादी है और हमारे उसूल एकदम खरा सोना हैं और इस दिखावे के बाद केजरीवाल ने खुद को एक बुजदिल साबित किया—ऐसा बुजदिल जिसके रीढ़ की हड्डी ही नहीं है. माफी के एक मुकाम से माफी के दूसरे और तीसरे मुकाम पर माथा नवाते हुए केजरीवाल उस मुर्गे की याद दिलाते हैं जो लड़ाई ठानने की जगह मैदान से भाग जाना कहीं बेहतर समझता है और भागते हुए अपनी दुम टांगों के बीच दबा लेता है.

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जरा गौर कीजिए इस फर्क पर. भगत सिंह का इंकलाबी जुनून कहता था- ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है.’ लेकिन केजरीवाल को ‘सर झुकाने की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ वाले मिसरे पर कॉपीराइट कराने की अर्जी फौरन से पेश्तर डाल देनी चाहिए. हंसते हुए बढ़े थे भगतसिंह फांसी के तख्ते की तरफ लेकिन केजरीवाल ने कानून के शिकंजे से गर्दन बचाने के लिए घुटनों के बल रेंगकर निकलना ज्यादा वाजिब समझा. गांधी ने अपने सीने पर गोली खायी और उनके होठों पर ‘हे राम’ के शब्द थे लेकिन केजरीवाल ने अपने स्वाभिमान और आत्म-गौरव पर गोली खाना कबूल किया है और उनके होठों पर ‘माफ कर दो’ के बोल हैं.

Arvind_Kejriwal

बेंड इट लाइक केजरीवाल

केजरीवाल के खाते में सियासी जंग के एक नये तर्ज का सिद्धांत गढ़ने का श्रेय दर्ज होना चाहिए—सिद्धांत यह कि माफी मांगना शूरता की बेहतर पहचान है. उन्हें एक नये किस्म के दर्शन पर चलने का श्रेय दिया जाना चाहिए- दर्शन यह कि मैं झुकता हूं, इसलिए मैं हूं! हो सकता है, आगे के वक्तों में कोई फिल्म बनाए तो उसका नाम रखे- बेंड इट लाइक केजरीवाल!,

केजरीवाल ने अभी तक विक्रमजीत सिंह मजीठिया, नितिन गडकरी और कपिल सिब्बल से माफी मांगी है. वे जिस रफ्तार से माफी मांग रहे हैं इसे देखते हुए लगता है कि जिस किसी से उनकी निगाह टकराएगी उसी से वे माफी मांग बैठेंगे. उनके समर्थकों का तर्क है कि केजरीवाल ने अगर घुटने टेके हैं तो बस इसलिए कि सरकार कायम रहे. समर्थकों का तर्क है कि अदालती मामलों के चक्कर में फंसने से उनका ध्यान बंट रहा था और वे दिल्ली के लोगों की सेवा पर अपना मन नहीं लगा पा रहे थे सो उन्होंने अपनी गर्दन अगर झुकाई है तो इसके पीछे की नेकनीयती भी देखी जानी चाहिए.

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लेकिन सच्चाई ये है कि केजरीवाल बहुत पहले से ही उस राह पर कदम बढ़ा चुके थे जिसपर चलते हुए आखिरकार उन्हें अफसोस के इसी मुकाम पर पहुंचना था. सियासत में दाखिल होने के साथ उन्होंने अपनी आदत ही बना ली थी कि जो कोई उनकी कामयाबी के किस्से का किरदार रहा उससे उन्होंने किनारा कर लिया. अब चूंकि किनाराकशी के लिए उनके पास कोई बचा नहीं सो अब वे खुद को ही ठिकाने लगा रहे हैं. अपने आस-पास के तमामतर चेहरों पर हमला बोलने और नैतिक और जुबानी हिंसा के प्रति एकदम भावशून्य हो जाने के बाद उन्होंने खुद के जमीर के खिलाफ एक छलावा भरा हमला बोला है. आदत के हाथों मजबूर, तमाम लोगों के खिलाफ जंग छेड़ने के बाद आखिरकार केजरीवाल ने अब अपने ही खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

kejriwal goa

गुलाटी मारना राजनेताओं का पसंदीदा शगल

सियासत दरअसल वही सबकुछ कर दिखाने की कला का नाम है जिसके बारे में आपने कल को कहा था कि कभी करेंगे ही नहीं. गुलाटी मारना हर राजनेता का पसंदीदा शगल है. सो बहुत मुमकिन है कि माफीनामे को अपने तरकश का तीर बनाने के कारण केजरीवाल को कुछ फायदा हो लेकिन जो लोग केजरीवाल को घुटने टेकते हुए देख रहे हैं वे शायद ही कभी अब उनकी किसी बात को संजीदगी से ले पायेंगे. अब के बाद वे जो भी लड़ाई ठानेंगे, जिस भी जंग में शामिल होंगे उन सबको बस एक ही दिशा में आगे बढ़ना है—सबके आखिर में केजरीवाल की तरफ से एक माफीनामा लिखा मिलेगा. केजरीवाल के नाम पर अब ‘ना’ में सिर हिलाते हुए कहा जाएगा कि यह राजनेता हड़बड़ी में कदम उठाता था और फिर पूरे इत्मीनान के साथ पछताता था. वे एक ऐसे शख्स के रुप में याद किए जाएंगे जो अपना मुंह खोलता ही इसलिए था कि किसी के सामने अपनी गलती मंजूर करते हुए माफी मांगनी है.

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घुटने टेकने की इस कायराना हरकत के बाद आखिर केजरीवाल उन लोगों से कैसे आंखें मिला पाएंगे जो उनके साथ-साथ लड़े और यह सोचते हुए लड़ाई में टिके रहे कि वक्त चाहे जितना भी कठिन आन पड़े केजरीवाल कभी मैदान नहीं छोड़ने वाले? अगली बार जब वे फिर से अपने हथियार उठाने को तैयार होंगे तो किस मुंह से बाकी लोगों से कहेंगे कि साथियो! आओ, इस जंग में हमारा साथ दो?

केजरीवाल ने धूल चाटने की इस हरकत के बाद अपनी ही विरासत से मुंह मोड़ लिया है. भगतसिंह और गांधी को तो छोड़ दें, केजरीवाल तो आज दूर-दूर तक वैसा भी नहीं जान पड़ते जैसा होने का दावा कभी उनके बारे में किया जाता था.

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