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अरुणाचल प्रदेश में 1 जून से नहीं होगी कोई पंचायती राज संस्था

राज्य सरकार इस निर्वाचित निकाय का मौजूदा कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव संपन्न करा पाने में नाकाम रही है

Updated On: May 30, 2018 11:56 AM IST

Rajeev Bhattacharyya

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अरुणाचल प्रदेश में 1 जून से नहीं होगी कोई पंचायती राज संस्था

अगले महीने से अरुणाचल प्रदेश में कोई भी पंचायती राज संस्था नहीं होगी. इसकी वजह यह है कि राज्य सरकार इस निर्वाचित निकाय का मौजूदा कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव संपन्न करा पाने में नाकाम रही है. पंचायत राज विभाग के सचिव राज बिडोल ताएंग ने उपायुक्तों को लिखे पत्र में, इन निर्वाचित निकायों, जिनका 31 मई को कार्यकाल खत्म हो रहा है, का चुनाव नहीं कराने के सरकार के फैसले के लिए कुछ 'संवैधानिक अड़चनों' को कारण बताया है.

28 मई को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि 'सरकार ‘द अरुणाचल पंचायत राज (संशोधन) कानून, 2018’ के अनुरूप नए पंचायती राज नियम तैयार कर रही है, इस बीच सरकार द्वारा संक्रमण काल के लिए पंचायती राज संस्थाओं के कर्तव्यों के निष्पादन के लिए संस्थागत व्यवस्था की जा रही है. अधिसूचना की प्रति आपको जल्द आपको भेज दी जाएगी.'

कुछ हफ्ते पहले, मीडिया में राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त हागे कोजीन को उद्धृत करते हुए कहा गया था कि चुनाव कराने के लिए सरकार को 14 मई की तारीख का प्रस्ताव दिया गया है. लेकिन सरकार ने यह कहते हुए इस फैसले का विरोध किया कि चुनाव प्रक्रिया को संपन्न नहीं कराया जा सकता क्योंकि पंचायती राज संस्था में संशोधन करने के लिए विधेयक को विधानसभा द्वारा पारित किया जा चुका है.

पंचायती राज का मकसद निर्वाचित सदस्यों वाली स्थानीय सरकार के माध्यम से शासन को उनके ज्यादा करीब लाना है. अरुणाचल प्रदेश में डेइंग इरिंग कमेटी की सिफारिशों पर अमल करते हुए पंचायत का पहला चुनाव 1969 में हुआ था. इस पहाड़ी राज्य में तब से नियमित रूप से चुनाव होते रहे हैं और संसद द्वारा 73वां संविधान संशोधन विधेयक, 1992 पारित किए जाने से तीन स्तरीय व्यवस्था किए जाने बाद यहां भी कानून में बदलाव किए गए.

नए संशोधनों की क्यों जरूरत पड़ी?

विधानसभा ने तीन स्तरीय पंचायती राज सिस्टम के मध्यवर्ती संस्थान अंचल समिति को हटाने के लिए 15 मार्च को एक विधेयक पारित किया. यह कदम संविधान के 73वें संशोधन के तहत उठाया गया था, जो 20 लाख से कम आबादी वाले राज्य को मध्यवर्ती स्तर को खत्म करने का अधिकार देता है. अरुणाचल प्रदेश की आबादी 13.8 लाख है. संशोधन के तहत ग्राम पंचायत और जिला परिषद की दो स्तरीय व्यवस्था की गई है. पंचायत मंत्री अलो लिबांग ने मीडिया को बताया कि वित्तीय कारणों से भी सरकार यह विधेयक लाने पर मजबूर हुई क्योंकि मध्यवर्ती स्तर को खत्म करने से 5 करोड़ रुपए बचेंगे जो विकास के कामों पर खर्च किए जा सकेंगे. उत्तर पूर्व के दूसरे राज्यों की तरह अरुणाचल प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा हासिल है, जिसके तहत यह केंद्र सरकार से विशेष वित्तीय पैकेज का हकदार है.

चुनाव क्यों टाले गए?

पंचायती चुनाव टालने के सरकार के फैसले से कइयों की त्योरियां चढ़ गई हैं और अरुणाचल प्रदेश के विपक्षी दल सक्रिय हो गए हैं. कई प्रेक्षकों का ख्याल है कि अब चुनाव अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले शायद ही हों. राजीव गांधी यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफेसर नानी बाठ कहते हैं कि, 'इस राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद इसके सदस्यों की संख्या बढ़ी है. ऐसे में टिकट के कई उम्मीदवार होंगे, जिससे असंतोष ही बढ़ेगा. पार्टी का मकसद आंतरिक कलह को रोकना है, जिससे कि विधानसभा चुनाव में यह कांग्रेस से बढ़त हासिल कर सके.'

इधर, कांग्रेस पहले ही सरकार के फैसले का विरोध करने के लिए कमर कस चुकी है. राज्य चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तावित तारीख पर ही चुनाव कराने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाने को कई जिलों में पार्टी की युवा इकाई को सक्रिय कर दिया गया है.

पूर्व सांसद और कांग्रेस की राज्य इकाई के अध्यक्ष ताकम संजय के अनुसार, 'बीजेपी सरकार का कदम पूरी तरह अलोकतांत्रिक है. चुनाव हर हाल में राज्य चुनाव आयोग द्वारा तय तारीख पर ही कराया जाना चाहिए. अगर जरूरी हुआ तो हम इस मामले को कोर्ट में भी ले जाएंगे.'

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