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'पार्टियों में शामिल वकील कोर्ट का मामला संसद में लाने पर तुले'

अरुण जेटली ने फेसबुक पोस्ट लिख कर विपक्ष को आड़े हाथों लिया है और यह भी बताया है कि क्यों महाभियोग के नोटिस को अंत में खारिज ही होना था

Updated On: Apr 24, 2018 07:54 PM IST

FP Staff

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'पार्टियों में शामिल वकील कोर्ट का मामला संसद में लाने पर तुले'

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का कांग्रेस पर आरोप लगा चुके वित्त मंत्री अरुण जेटली के निशाने पर अब प्रसिद्ध वकील हैं. मंगलवार को जेटली ने एक फेसबुक पोस्ट लिख कर उन वकीलों को आड़े हाथों लिया जो अब किसी राजनीतिक पार्टी में हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे वकील कोर्ट के भीतर के मामलों को संसदीय प्रक्रिया के अंदर घसीटने की कोशिश कर रहे हैं.

चार दिन के भीतर लिखे गए अपने दूसरे फेसबुक पोस्ट में जेटली ने कहा कि कारोबारी और उद्योगपतियों पर कई बार आरोप लगा है कि वे संसद की कार्रवाही को प्रभावित करके नीतियों को अपने पक्ष में करवाने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन अब वकील जो राजनीति में हैं, वो भी यही तरीका अपना रहे हैं.

उन्होंने आगे लिखा कि ज्यादातर पार्टियां वकीलों को इसी आधार पर नामांकित करती हैं कि उनसे कोर्ट और संसदीय बहसों दोनों जगहों पर काम लिया जा सके. ऐसे ही वकील कोर्ट के भीतर के विवाद को संसदीय प्रक्रिया के तहत लाने की कोशिश कर रहे हैं. राजनीतिक पार्टियों के सदस्य वकीलों की यह प्रवृति बढ़ रही है. सीजेआई के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाना एक गलत तथ्यों पर आधारित उदाहरण है.

शनिवार को कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी दलों ने सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव चलाने के लिए नोटिस को राज्यसभा के उपसभापति वेंकैया नायडू को सौंपा था. विपक्ष ने प्रस्ताव को कदाचार के पांच मामलों के आधार पर तैयार किया था. महाभियोग प्रस्ताव पर कांग्रेस और सात अन्य दलों के 64 सांसदों ने हस्ताक्षर किया था.

विपक्ष की नोटिस को उपसभापति नायडू ने जल्द ही खारिज कर दिया. उन्होंने दावा किया कि विपक्षी सांसद अपने ही मामले को लेकर अनिश्चित थे. नायडू के मुताबिक, सांसदों की सूचना संदेह और अनुमान पर आधारित थी.

अपने पोस्ट में जेटली ने यह भी बताया है कि क्यों विपक्ष के इस प्रस्ताव का फेल होना तय था. जेटली ने कहा कि नोटिस अस्थिर आधार पर था. इसे सीजेआई और उच्च न्यायपालिका के अन्य न्यायधीशों को डराने के उदेश्य से दायर किया गया था.

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