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Tipu Sultan Jayanti (Part 1): टीपू सुल्तान भी आज के राजनेताओं जैसे ही थे, फिर इतना हंगामा क्यों?

इतिहासकार कहते हैं कि टीपू सुल्तान ने वही सब कुछ किया, जो एक शासक, सत्ता में बने रहने के लिए करता है, फिर उसे राक्षस क्यों बताना?

Updated On: Nov 10, 2018 04:45 PM IST

M Raghuram

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Tipu Sultan Jayanti (Part 1): टीपू सुल्तान भी आज के राजनेताओं जैसे ही थे, फिर इतना हंगामा क्यों?
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(संपादक की ओर से- बीजेपी और दूसरे संगठनों के कड़े विरोध के बावजूद कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस की साझा सरकार 10 नवंबर से टीपू जयंती मनाने जा रही है. हालांकि इस बार ये आयोजन उतने जोर-शोर से होने की उम्मीद नहीं है. कमोबेश सारे आयोजन बंद ठिकानों में ही होंगे. इनके लिए भी सुरक्षा को हाई अलर्ट पर रखा जा रहा है, ताकि संभावित हिंसक प्रदर्शनों से निपटा जा सके. कर्नाटक में कई संगठन राज्य भर में टीपू सुल्तान की विरासत का जश्न मनाने के खिलाफ हैं. इन संगठनों का मानना है कि टीपू सुल्तान एक क्रूर और विवादित शासक था. अपनी सीरीज की इस पहली किस्त में फ़र्स्टपोस्ट ने कई इतिहासकारों से बात करके टीपू सुल्तान से जुड़ी हकीकतों, किस्सों और मिथकों को समझने की कोशिश की है. टीपू सुल्तान के राज की कई बातें हैं, जिस पर उस दौर के लोगों ने भी हकीकत की मुहर लगाई है. मगर, सच के सिवा टीपू से जुड़े कुछ मिथक भी हैं, सूचनाओं के बीच फासला भी है, जिसकी वजह से साम्राज्यवाद के दौर के इस हीरो को अलग-अलग समुदायों के बीच विवादास्पद बना दिया है.)

पिछले कुछ सालों से हम देख रहे हैं कि टीपू जयंती करीब आते-आते पूरा माहौल अशांत और उथल-पुथल से भर जाता है. 2015 में टीपू जयंती का विरोध करने वाले दक्षिणपंथी संगठनों की मुस्लिम संगठनों से भिड़ंत हो गई थी. ये उस वक्त हुआ जब मुस्लिम समुदाय एक रैली निकाल रहा था. हिंसा के दौरान दो लोगों की मौत हो गई थी. पिछले दो सालों में भी हमने कर्नाटक में कई हिंसक प्रदर्शन होते देखे हैं. हर साल इसी दौरान टीपू सुल्तान की विरासत को लेकर तरह-तरह की बातें कही जाती हैं, दावे किए जाते हैं, सवाल उठाए जाते हैं और विश्लेषण किए जाते हैं. हिंदूवादी संगठन और कार्यकर्ता, टीपू सुल्तान को षडयंत्रकारी और असहिष्णु शासक के तौर पर पेश करते हैं. वहीं कोदावा समुदाय के लोग टीपू को नरसंहार का दोषी बताते हैं. ईसाई धर्म को मानने वाले टीपू के राज में कैद किए गए हजारों ईसाइयों का हवाला देते हैं. वहीं, मुस्लिम समुदाय टीपू को राष्ट्रीय हीरो बताता है. नतीजा ये है कि सियासी मैदान में टीपू सुल्तान को लेकर खींच-तान बढ़ती जा रही है.

कोई भी राजा विदेशी ताकत से नाराज होकर, वही करता जो टीपू ने किया

टीपू सुल्तान को लेकर इतिहासकारों और रिसर्चरों की राय ज्यादा संतुलित है. वो उसके दौर के फैसलों को किसी खास खांचे में नहीं रखकर देखते. मैंगलोर यूनिवर्सिटी में वरिष्ठ इतिहासकार हनुमा नाइक कहते हैं कि, 'टीपू सुल्तान ने वही सब कुछ किया, जो एक शासक, सत्ता में बने रहने के लिए करता है. उसे राक्षस क्यों बताना? टीपू की तुलना औरंगज़ेब से नहीं की जा सकती, क्योंकि टीपू और औरंगज़ेब के दौर में बहुत फर्क था. टीपू उस दौर में शासक था, जब अंग्रेज़ भारत में पांव रख चुके थे. टीपू ने वही किया, जो कोई भी राजा किसी विदेशी ताकत के आने पर नाराज होकर करता. इस संघर्ष के दौरान तमाम तरह की सामाजिक उठा-पटक हो रही थी. सामरिक संघर्ष के साथ-साथ सांस्कृतिक उथल-पुथल भी मची हुई थी.'

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टीपू पर तमाम आरोपों में से एक अरबी भाषा को बढ़ावा देने का भी है. इतिहास के छात्र के तौर पर हमें टीपू सुल्तान के दौर के कई फरमान कन्नड़ भाषा में मिलते हैं, तो कई राजाज्ञाएं हमें संस्कृत में भी मिलती हैं. प्रोफेसर हनुमा नाइक कहते हैं कि, 'अगर टीपू इतना ही असहिष्णु था, जितना आज बताया जाता है, तो ये कैसे हो सकता है कि उसके दौर के शाही फरमान कन्नड़ और संस्कृत भाषाओं में भी होते थे?' प्रोफेसर नाइक कहते हैं कि, 'एक राजा और प्रशासक के तौर पर टीपू सुल्तान अपने दौर के दूसरे शासकों से अलग नहीं था. सत्ता में बने रहने के लिए उसने वही किया, जो कोई और राजा करता. आज उस पर विवाद खड़ा नहीं किया जा सकता. आखिर हमारे दौर के कितने राजनेता हैं, जो ऐसे कदम उठाते हैं, जिन्हें जनता न पसंद करे.'

20,000 ईसाइयों पर अत्याचार करने के लिए टीपू के खिलाफ गहरे जड़ी हैं नफरत की जड़ें

दक्षिण कन्नड़ा के ईसाई समुदाय में टीपू सुल्तान के प्रति नफरत और शिकायत की जड़ें बहुत गहरी हैं. इसकी वजह ये है कि टीपू ने मैंगलुरू से 20 हजार के करीब ईसाइयों को बंधक बना लिया था. इन लोगों को टीपू ने कई दिनों तक मैसूर के करीब श्रीरंगपट्टनम खुले मैदान में बिना खाना-पानी और छांव के बगैर खुले में रखा था. बंधक बनाकर लाए जाने का विरोध करते हुए बहुत से ईसाई मारे गए थे. बड़ी तादाद में ईसाइयों का धर्म परिवर्तन करके उन्हें मुसलमान बना दिया गया था. ईसाई महिलाओं को मुसलमान बनाकर टीपू सुल्तान की सेना के सैनिकों के बीच बांट दिया गया था. वहीं इनके बच्चों को घरेलू नौकर बनाकर रखा गया था.

'मैसूर का शेर' कहे जाने वाले टीपू सुल्तान ने कनारा और मैंगलुरू के कैथोलिक ईसाइयों के बहुत से गिरजाघरों और धार्मिक ठिकानों को तबाह कर दिया था. 1799 में श्रीरंगपट्टनम में हुए चौथे अंग्रेज-मैसूर युद्ध में टीपू सुल्तान की हार के बाद ज्यादातर ईसाई रिहा कर दिए गए थे. लेकिन, बंधक बनाए गए 20 हजार लोगों में से केवल 6 हजार ही वापस जा सके थे.

आज अलग-अलग सामाजिक और सियासी हैसियत रखने वाले ऑस्कर फर्नांडिस, इवान डिसूजा और जे आर लोबो जैसे ईसाई नेता टीपू जयंती मनाने को लेकर बहुत संतुलित रुख रखते हैं. ईसाई समुदाय के पादरी और बिशप भी इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बचते रहे हैं. कनारा क्रिश्चियन फोरम के नेता रॉबर्ट रोसारियो सवाल उठाते हैं कि, 'क्या ये लोग इस बात से डरकर खामोश हैं कि उन्होंने चुप्पी तोड़ी, तो राज्य सरकार नाखुश होगी और ईसाई नेताओं को उनके पदों से हटा दिया जाएगा?'

टीपू पर लगे आरोपों के पड़ताल की गहन जांच जरूरी

मैंगलोर यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के प्रमुख रह चुके प्रोफेसर सुरेंद्र राव अलग तर्क देते हैं. प्रोफेसर राव कहते हैं कि, 'एक राजा के तौर पर टीपू की पहचान बताते वक्त हमें बहुत सी पड़ताल करने की जरूरत है. टीपू जयंती के मामले में ऐसी कोई जांच-पड़ताल नहीं हुई. इसके बगैर टीपू जयंती ऐसी तमाम जयंतियों जैसी ही है, जिनका आयोजन किसी खास समुदाय को खुश करने के लिए होता है.' प्रोफेसर सुरेंद्र राव कहते हैं कि, 'इतिहास हमें बताता है कि टीपू ने अंग्रेजों से तीन लड़ाईयां लड़ीं. पहला अंग्रेज-मैसूर युद्ध, टीपू के पिता हैदर अली ने लड़ा था. दूसरी जंग की शुरुआत हैदर अली के वक़्त में हुई, मगर इसका खात्मा टीपू सुल्तान ने किया. तीसरा और चौथा अंग्रेस-मैसूर युद्ध टीपू ने खुद के बूते लड़ा था. इतिहास ये भी बताता है कि टीपू ने बड़ी संख्या में हिंदुओं और ईसाइयों को बंधक बनाया. लेकिन इसके आंकड़ों और इन समुदायों पर ढाए गए जुल्म को लेकर जो दावे हैं, उनकी सच्चाई की पड़ताल की जरूरत है.'

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कंथल में रह रहे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के एक अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं कि, 'कदांथल के सैकड़ों परिवार, टीपू सुल्तान के लिए जंग लड़े. बहुत से ऐसे ब्राह्मण परिवार हैं, जिनके पूर्वजों ने टीपू के राज में श्रीरंगपट्टनम में ऊंचे ओहदों पर काम किया. वो उस दौर में अपने पुरखों को टीपू से मिले के राजकीय पत्र और पुरस्कार की बड़े गर्व से आज भी नुमाइश करते हैं. अब अगर टीपू इतना ही नापसंद किया जाने वाला शासक था, जितना आज बताया जा रहा है, तो टीपू के महल से जुड़ा हुआ श्रीरंगराजा मंदिर अब तक कैसे सुरक्षित है? इस बात की कई मिसालें मिलती हैं कि टीपू इस मंदिर में पूजा करने जाता था. उसने मंदिर के विकास में योगदान दिया. हम इन बातों के सबूत उस दौर के कई फरमानों में पाते हैं.'

टीपू के कर्नाटक के बारे में अपनी किताब में प्रोफेसर चेन्नाबासप्पा ने शारदा श्रृंगेरी पीठम, नंजानगुडु स्थित नंजुंदेश्वरा मंदिर, मेलकोट चेलुवनारायना मंदिर और यहां तक कि समुद्र किनारे स्थित कुंडापुर के शंकरनारायणा मंदिर के विकास में टीपू सुल्तान के योगदान का विस्तार से जिक्र किया है. चिकमंगलुरू जिले में स्थित श्रृंगेरी शारदा पीठम में रखे कई शाही फरमानों में इस बात का जिक्र मिलता है कि किस तरह टीपू ने मराठों से इस मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए तब रकम वसूली थी, जब मराठों से इस मंदिर पर हमला कर के इसे तहस-नहस कर दिया था.

लौटना चाहते हैं टीपू के वारिस, लेकिन पाने को कुछ है ही नहीं

अपने पूर्वज टीपू सुल्तान को लेकर ऐसी विरोधाभासी बातों और सियासी उठा-पटक पर टीपू के वारिसों की भी दूर से ही सही, पर नजर जरूर है. इनके अगुवा आसिफ अली ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा कि, 'हमें इस बात की फिक्र है कि समाज के एक तबके के लोग टीप सुल्तान के बारे में अनाप-शनाप बातें कहकर, उसे हिंसा और जुल्मो-सितम के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. हम आंखों में आंसू और दिल पर एक बोझ लिए ये होते हुए देख रहे हैं.'

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आसिफ अली और टीपू के कई और वारिस अब कोलकाता में रहते हैं. इनमें से कई तो बहुत ही गरीबी में जिंदगी बसर कर रहे हैं. भटकल के जामिया इस्लामिया मदरसे के प्रोफेसर मोहम्मद इलियास मौलवी कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय ने पिछली कई सरकारों से अपील की है कि टीपू के इन वारिसों को फिर से कर्नाटक लाकर, मैसुरू या श्रीरंगपट्टनम में बसाया जाए. हालांकि सरकार ने सभी महल, किले और टीपू सुल्तान से ताल्लुक रखने वाले घर तक अपने कब्जे में ले लिए हैं. आसिफ अली 2015 में भटकल और मैंगलोर आए भी थे. लेकिन इलियास मौलवी कहते हैं कि सरकार ने टीपू के वारिसों को फिर से बसाने की कोई कोशिश नहीं की है.

आसिफ अली कहते हैं कि, 'हम लौटकर कर्नाटक आना चाहते हैं और टीपू की विरासत का हिस्सा बनना चाहते हैं. लेकिन वहां पर हमारा कुछ भी नहीं है. न घर है. न नौकरियां हैं और न ही कोई ठिकाना.'

(लेखक मैंगलूरु के फ्रीलांस पत्रकार और पत्रकारों के जमीन से जुड़े अखिल भारतीय नेटवर्क 101reporters.com के सदस्य हैं.)

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