S M L

क्या वोट प्रतिशत का गणित गुजरात में बीजेपी को नुकसान पहुंचाएगा

इंडिया स्पेंड का सर्वे बताता है कि नरेंद्र मोदी के सीएम न रहने और लंबे समय से बीजेपी के सत्ता में रहने से एंटी इनकंबेंसी बढ़ी है

Updated On: Dec 03, 2017 11:33 AM IST

India Spend

0
क्या वोट प्रतिशत का गणित गुजरात में बीजेपी को नुकसान पहुंचाएगा

गुजरात विधानसभा चुनाव के मतदान को अब बेहद कम वक्त बचा है. ऐसे में हर जगह यह बहस छिड़ी है कि इस बार गुजरात में किसकी सरकार बनेगी. लोग यह जानने को बेताब है कि, क्या इस बार गुजरात में राहुल गांधी कोई करिश्मा कर पाएंगे और हार्दिक-जिग्नेश-अल्पेश की तिकड़ी की मदद से कांग्रेस का 22 साल का वनवास खत्म होगा. लोग यह भी जानने को उत्सुक हैं कि, क्या इस बार भी मतदान के वक्त मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलेगा और बीजेपी फिर से सरकार बनाने में कामयाब होगी.

इन्हीं कुछ सवालों के जवाब पाने के लिए ‘इंडिया स्पेंड’ ने  चुनावों के डाटा का विश्लेषण किया. विश्लेषण के जो परिणाम सामने आए, उनके मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अभी भी गुजरात में मजबूत स्थिति में नजर आ रही है. गुजरात की 182 विधानसभा सीटों के लिए आगामी 9 दिसंबर और 14 दिसंबर को दो चरणों में मतदान होगा. चुनाव के नतीजों का ऐलान 18 दिसंबर को किया जाएगा.

2012 के चुनाव में जीती सीटों पर बीजेपी को मिले थे 50 फीसदी से ज्यादा वोट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साल  2001 से लेचर 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. उन्होंने अक्टूबर 2001 में केशुभाई पटेल के इस्तीफा देने के बाद मुख्यमंत्री का पद संभाला था. मोदी ने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात पर 12 साल से ज्यादा वक्त तक राज किया. इस दौरान बीजेपी राज्य में मतदाताओं का मजबूत आधार तैयार करने में कामयाब रही. यही वजह है कि, साल  1998 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले साल 2002 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के वोट शेयर में 5 फीसदी का इजाफा हुआ. 1998 के चुनाव में बीजेपी को जहां 44.8 फीसदी वोट मिले थे, वहीं 2002 के चुनाव में यह संख्या बढ़कर 49.9 फीसदी पर पहुंच गई थी.

2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की तरफ से नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे. उस समय बीजेपी ने 182 सीटों में से 115 सीटों पर जीत दर्ज की थी. खास बात यह है कि,जीती गई सभी 115 सीटों पर बीजेपी को मिले वोट शेयर का औसत 53 फीसदी था.

मतलब साफ है कि, साल 2012 के चुनाव में बीजेपी ने जो सीटें जीती थीं, उन क्षेत्रों के 50 फीसदी से ज्यादा मतदाताओं ने बीजेपी को वोट दिया था. यानी गुजरात की जनता ने दिल खोलकर बीजेपी को समर्थन दिया था.

narendra modi vote share gujarat

साल 2012 से 2014 के बीच बीजेपी के वोट बैंक में 15 फीसदी का इजाफा

इंडिया स्पेंड ने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी द्वारा जीती गई सभी 115 विधानसभा सीटों पर पार्टी को मिले वोट शेयर का विश्लेषण किया. जिसकी तुलना साल 2014 के लोकसभा चुनाव में इन विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी को मिले वोटों से की गई. जिससे पता चला कि, साल 2012 से 2014 के बीच, इन विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी के वोटों की संख्या 15 फीसदी बढ़ गई है. यानी साल 2012 में गुजरात के लगभग 91 लाख लोगों ने अपना वोट बीजेपी को दिया था, जबकि साल 2014 में बीजेपी को वोट देने वाले लोगों की तादाद बढ़कर 1.05 करोड़ हो गई.

साल 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जिन सीटों पर जीत हासिल की थी, वहां पार्टी का वोट शेयर 53 फीसदी था. जो 2014 के लोकसभा चुनाव में बढ़कर 65 फीसदी हो गया. यानी इन सीटों पर साल 2012 से 2014 के बीच बीजेपी के वोट शेयर में 12फीसदी का इजाफा हुआ.

साल 2012 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने जो 115 सीटें जीती थीं, उनमें से 31 सीटें ऐसी थीं जहां पार्टी के उम्मीदवार ने 10,000 से भी कम वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. यानी इन सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवारों को विपक्षी उम्मीदवार से 0.5फीसदी से लेकर 8 फीसदी तक ज्यादा वोट मिले थे.

भारत में 'फर्स्ट पास्ट द पोस्ट' (एफपीटीपी) वोटिंग सिस्टम के तहत चुनाव होते हैं. यानी चुनाव में दो से ज्यादा उम्मीदवार होने पर जो उम्मीदवार सबसे ज्यादा वोट हासिल करता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है. चुनाव के इस सिस्टम में जीत-हार के कम अंतर का मतलब होता है, उम्मीदवारों के बीच कड़ी टक्कर. ऐसे में दूसरे नंबर पर रहने वाला उम्मीदवार अगर, अगले चुनाव में कुछ हजार वोट ज्यादा हासिल करने में कामयाब हो जाए तो, वह पिछली बार के विजेता उम्मीदवार को शिकस्त दे सकता है.

लेकिन आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में कुछ और ही तस्वीर नजर आ रही है. साल 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जिन सीटों पर बेहद कम अंतर से (10 हजार वोटों से भी कम) जीत दर्ज की थी, वहां 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को वोट देने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है. 2014 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ दो विधानसभा सीटें ही ऐसी थीं, जहां बीजेपी के मतदाता घटे थे. इनमें से एक थी, दक्षिण-पश्चिम गुजरात की निजार सीट और दूसरी थी अहमदाबाद जिले की जमालपुर-खड़िया सीट. इन दोनों सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार को बीजेपी उम्मीदवार से ज्यादा वोट मिले थे. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि, साल 2012 के विधानसभा चुनाव और 2014के लोकसभा चुनाव के बीच बीजेपी के मतदाताओं के रुख में खास बदलाव नहीं देखा गया.

आंकड़े और रुझान (ट्रेंड्स) बताते हैं कि, भले ही यह विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए पहले के चुनाव के मुकाबले थोड़ा अलग है, अब भले ही गुजरात में बीजेपी की कमान मोदी के हाथ में न हो, अब भले ही राज्य में बीजेपी के खिलाफ थोड़ी बहुत एंटी इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) हो, फिर भी गुजरात में बीजेपी की स्थिति काफी मजबूत और स्थिर है. साल 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद आनंदी बेन पटेल ने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला था. उनके बाद अगस्त 2016 में विजय रुपाणी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. रूपाणी फिलहाल राजकोट पश्चिम विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक हैं.

2014 bjp

2014 के लोकसभा चुनाव में जीत के बाद बीजेपी ने कई राज्यों में फहराई विजय पताका

देश के कुल 29 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों (जिनमें विधानसभाएं हैं और मुख्यमंत्री नियुक्त हैं) में से 13 में फिलहाल बीजेपी के मुख्यमंत्री सत्ता पर काबिज हैं. बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में धमाकेदार जीत के बाद, 2014 में ही महाराष्ट्र में पहली बार जीत हासिल की थी और देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया था. उसी साल बीजेपी ने हरियाणा और झारखंड विधानसभा चुनाव में भी जीत दर्ज की थी. फिर साल 2016 में बीजेपी का विजय रथ नॉर्थ-ईस्ट की तरफ दौड़ा और असम विधानसभा चुनाव में जीत का परचम लहराया. यह पहली बार था जब असम में बीजेपी के किसी नेता ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

मार्च 2017 में, बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में पंद्रह साल बाद सत्ता में वापसी की. यूपी के साथ बीजेपी ने पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भी जीत हासिल की. महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत सबसे महत्वपूर्ण रही, क्योंकि जनसंख्या के मामले में यह दोनों राज्य भारत में सबसे बड़े हैं. सांसदों की संख्या के लिहाज से भी यह दोनों राज्य बहुत अहम हैं, क्योंकि राज्यसभा की कुल सीटों का पांचवां हिस्सा महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के सांसदों से भरता है. 2014 के जम्मू और कश्मीर विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. वोट शेयर और सीटें जीतने के मामले में बीजेपी जम्मू- कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (जेकेपीडीपी) के बाद दूसरे नंबर पर रही. चुनाव के बाद जम्मू और कश्मीर में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन की सरकार बनी. जिसमें मुख्यमंत्री का पद पीडीपी की महबूबा मुफ्ती के हिस्से में गया, जबकि बीजेपी के निर्मल सिंह उप मुख्यमंत्री बने.

2017 में, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ अपना महागठबंधन तोड़ दिया और बीजेपी के साथ समझौता करके सरकार बना ली.

गुजरात में बीजेपी बीते दो दशकों से सत्ता पर काबिज है. यही वजह है कि, गुजरात में बीजेपी का वोट शेयर सबसे ज्यादा है. गुजरात भारत के उन गिने-चुने राज्यों में से एक है, जहां कोई मुख्यमंत्री या कोई राजनीतिक दल सबसे लंबे अरसे तक सत्ता में जमे हुए हैं.

किसी राज्य में जब कोई मुख्यमंत्री या कोई पार्टी लंबे वक्त तक शासन करती है तो, वहां उसका वोट शेयर काफी बढ़ जाता है. उदाहरण के लिए,पश्चिम बंगाल में, जहां सीपीएम यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 34 साल तक शासन किया. साल 2006 में सीपीएम का वोट शेयर 50.8 फीसदी था. खास बात यह है कि साल 2006 में सीपीएम ने पश्चिम बंगाल में आखिरी बार चुनाव जीता था.

इसी तरह, ओडिशा में 2014 के चुनावों में बीजू जनता दल का वोट शेयर 43.4 फीसदी था. सनद रहे, ओडिशा में बीजू जनता दल साल 2000 में सत्ता पर काबिज हुआ था.

long serving cm vote share

लेकिन पिछले लगभग एक दशक के दौरान, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में लंबे समय तक शासन करने वाली सरकारों के खिलाफ जबरदस्त एंटी इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) दर्ज की गई. जिसके चलते सत्ताधारी दलों के वोट शेयर में खासी गिरावट आई.

साल 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सीपीएम को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा था. उस समय सीपीएम के वोट शेयर में 9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी. यानी साल 2006 के विधानसभा चुनाव में सीपीएम का वोट शेयर जहां 50.8 फीसदी था, वहीं 2011 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या घटकर 41.4 फीसदी पर जा पहुंची. वहीं दो लगातार विधानसभा चुनाव में  तृणमूल कांग्रेस के वोट शेयर में 20 फीसदी उछाल आया है.

long serving cm bengal

इसी तरह, दिल्ली में लगातार 15 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस सरकार साल2013 के विधानसभा चुनाव में हार गई. उस समय कांग्रेस का वोट शेयर 40.3 फीसदी से घटकर 24.7 फीसदी पर आ गया था. साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. काफी समय तक त्रिशंकु विधानसभा रहने के बाद आखिरकार आम आदमी पार्टी (एएपी) ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी. लेकिन एएपी-कांग्रेस का गठबंधन जल्द ही टूट गया, जिसके बाद विधानसभा को भंग कर दिया गया. साल  2015 में दिल्ली में फिर विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें शानदार जीत के साथ आम आदमी पार्टी ने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई.

इसके अलावा, 2014 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस के वोट शेयर का बड़ा हिस्सा खिसककर बीजेपी की झोली में चला गया था. इंडिया स्पेंड ने जनवरी 2015 में दिल्ली के विधानसभा क्षेत्रों का जो विश्लेषण किया था, अब जरा उस पर भी नजर डाल लेते हैं.

long serving cm delhi

(लेखक सौम्य तिवारी टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई में शोधार्थी हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi