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हमारे अधिकारियों का गुस्सा सिर्फ अरविंद केजरीवाल पर क्यों निकलता है ?

दिल्ली में ये सारा विरोध-प्रतिरोध सिर्फ इसलिए चलता रहता है जिससे अरविंद केजरीवाल की सरकार के 'कमजोर' होने के एहसास को जगाया रखा जा सके.

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Feb 22, 2018 06:09 PM IST

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हमारे अधिकारियों का गुस्सा सिर्फ अरविंद केजरीवाल पर क्यों निकलता है ?

दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ आम आदमी पार्टी विधायकों की बदसलूकी का किस्सा भारत के उस ऐतिहासिक मसले के तौर पर याद किया जाएगा जब भारतीय सिविल सर्वेंट्स को गुस्सा आ ही गया. अंशु प्रकाश से बदसलूकी की घटना के ठीक अगली सुबह देश की राजधानी में मौजूद सिविल सर्वेंट्स के सब्र का बांध टूटा और ये मुनादी कर दी गई कि अब काम बंद. और तब तक काम नहीं होगा जब तक कि उन विधायकों पर कार्रवाई नहीं हो जाती.

पहली नजर में ऐसा लगता है जैसे ये अधिकारी अपने सम्मान की लड़ाई में खड़े हैं. लेकिन अगर आप इतिहास खंगालेंगे तो ये पूरी लड़ाई कोरे झूठ से इतर कुछ भी नहीं लगती. भारत की आजादी के बाद इन लोकसेवकों के साथ अपमान, मारपीट के किस्से अटे पड़े हैं. आपको ऐसी-ऐसी घटनाएं सुनने को मिलेंगी कि लगेगा अगर किसी संस्था में जरा भी सम्मान बाकी रहता तो इस केस में वह जरूर कुछ करती. लेकिन आईएएस एसोसिएशन ने कभी इस तरह की कार्रवाई नहीं की. नीचे कुछ ऐसे ही मामले दिए जा रहे हैं. पाठक पढ़ें और सोचें कि क्या ये मामले अंशु प्रकाश मामले से गंभीर थे या हल्के...

1- यूपी में आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल का केस 2013 में हुआ था. दुर्गा शक्ति नागपाल अपने एक फैसले को लेकर प्रदेश सरकार के निशाने पर आ गई थीं. तब समाजवादी पार्टी के नोएडा के एक स्थानीय नेता ने एक रैली में दावा किया था उन्होंने 41 मिनट के भीतर दुर्गा शक्ति का ट्रांसफर करवा दिया था. बाद में उन नेता जी को मीडिया ने तो निशाने पर लिया पर प्रदेश के अधिकारियों ने चुप्पी बनाए रखी. समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने भी दुर्गाशक्ति नागपाल को पूरी ताकत के साथ दबाने की कोशिश की थी. ईमानदार दुर्गाशक्ति के पास कोई चारा नहीं था सिवाय चुप रह जाने के क्योंकि प्रदेश की आईएएस लॉबी में से एक भी अधिकारी उनके बचाव में खड़ा नहीं हुआ.

2- 1994 में बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार थी. तब गोपालगंज के डीएम को भीड़ में लोगों ने पीटकर हत्या कर दी थी. इस भीड़ का नेतृत्व बाहुबली आनंद मोहन सिंह कर रहे थे. एक अधिकारी को पीट-पीट कर मार दिए जाने के बावजूद आईएएस लॉबी ने कभी हड़ताल करने की नहीं सोची.

3- करीब 2 साल पहले यूपी में ईमानदार आईपीएस अधिकारी कहे जाने वाले अमिताभ ठाकुर के साथ तो अजीब वाकया हुआ. समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो और कई बार यूपी के सीएम रह चुके मुलायम सिंह यादव ने फोन करके अमिताठ ठाकुर को ‘सुधर जाने’ की धमकी दी थी. मुलायम सिंह यादव की एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी को खुली धमकी दिए जाने के बावजूद आईएएस एसोसिएशन अपनी नींद से नहीं जागा. मुलायम सिंह यादव के खिलाफ आखिर कौन कार्रवाई करता ? ये सर्वविदित है कि अखिलेश सरकार में अमिताभ ठाकुर की स्थिति लगातार खराब ही रही. सरकार ने उन्हें हाशिए पर रखा. संगठन सोता रहा.

4- ठीक ऐसा ही वाकया अक्टूबर 2014 में मैसूर में आईएएस अधिकारी रश्मि महेश के साथ हुआ. उनके साथ मारपीट की कोशिश की गई थी. लेकिन मामला दब गया.

5- अपने सनसनी वाले बयानों के लिए पहचाने जाने वाले यूपी के पूर्व मंत्री आजम खान का 2017 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले रिटर्निंग ऑफिसर को हड़काते हुए वीडियो वायरल हुआ था. आजम खान के शब्द थे- ‘आप तो इससे पहले कूड़े में पड़े हुए थे...हम आपको इसीलिए लेकर आए थे ? ’. आजम खान चुभने वाले अंदाज में बोल रहे थे और जलालत भी कर रहे थे. तब आईएएस संगठन क्यों चुप था?

6- नीचे दिए हुए वीडियो में देखिए अंदाजा लग जग जाएगा कि नेता आईएएस अधिकारियों के साथ किस तरीके से बात कर रहे हैं. अंशु प्रकाश का तो कोई वीडियो फुटेज अभी तक उपलब्ध नहीं है कि आखिर उनके साथ क्या हुआ? लेकिन हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री सीधी बदतमीजी करते हुए दिख रहे हैं? वो भी भरी सभा में एक आईपीएस अधिकारी को गेट आउट कहते हुए देखे जा सकते हैं. क्या किसी अधिकारी को खचाखच भरे हॉल में गेट आउट कहना सम्मान देने का प्रतीक है? आईएएस एसोसिएशन ने इस पर क्या संज्ञान लिया ?

ये ऊपर दी हुई महज कुछ घटनाएं हैं. ऐसी सैंकड़ों घटनाओं के साक्ष्य देखने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी है, सिर्फ गूगल पर जाना है और घटनाएं सामने होंगी. लेकिन दिल्ली का मामला अलग है. दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है. यहां राज्य की कानून व्यवस्था राज्य सरकार के हाथों में नहीं है. जब तक यहां शीला दीक्षित की सरकार थी तो केंद्र में भी उनकी ही पार्टी की सरकार थी. कभी ऐसे हालात नहीं बने कि राज्य और केंद्र में सीधे टकराव की स्थिति बनी हो. इसके अलावा शीला दीक्षित परिपक्व नेता थीं. अरविंद केजरीवाल जबसे मुख्यमंत्री बने हैं तबसे ऐसे लग रहा है कि जैसे सारे अधिकारियों ने उनके खिलाफ असहयोग आंदोलन छेड़ रखा है. अंशु प्रकाश पहले अधिकारी नहीं हैं जिन्होंने अरविंद केजरीवाल सरकार की शिकायत की है. इससे नवंबर 2016 में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी केआर मीणा ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर अपमान करने का आरोप लगाया था. उन्होंने अरविंद केजरीवाल पर एक प्राइवेट पार्टी को जमीन के अलॉटमेंट का आरोप लगाया था.

अंशु प्रकाश के आरोप गंभीर हैं. आम आदमी पार्टी आरोपों से बरी नहीं है. लेकिन इस मामले में सिविल सर्वेंट्स की सक्रियता काफी कुछ कहती है. सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है कि यही मामला अगर यूपी, बिहार या किसी भी ऐसे राज्य में हुआ होता जो केंद्र शासित प्रदेश नहीं है. शायद अधिकारी वर्ग इस तरह से व्यवहार नहीं कर रहा होता. दरअसल दिल्ली की ब्यूरोक्रेसी को भी ये पूरा भान है कि राज्य सरकार के अधिकार बेहद सीमित हैं. दिल्ली में आम बोलचाल की भाषा में लोग मजाक भी करते हैं कि यहां के विधायक को जितने अधिकार हैं उससे ज्यादा तो पुलिस के दारोगा के पास होते हैं. ऐसी स्थिति में क्या अधिकारी वर्ग इतना कम चालाक है कि वो राज्य और केंद्र सरकार के बीच चल रही तनातनी की स्थिति को नहीं ताड़ पाएगा. सीधी बात है, वो जितना केंद्र सरकार की तरफ झुका हुआ दिखेगा, उसके अपने 'प्रमोशन' के लिए वो उतना ही लाभप्रद होगा. क्या ये पूरा मामला ऐसा ही कुछ है?

क्या आईएएस अधिकारियों को हड़ताल का अधिकार है?

भारत में आईएस अधिकारियों द्वारा हड़ताल को लेकर कोई कानून तो नहीं है लेकिन सेंट्रल सिविल सर्विसेज कंडक्ट रूल 1964 के मुताबिक सिविल सर्वेंट्स को किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन और हड़ताल में शामिल होने की मनाही है. कोई सिविल सर्वेंट राज्य के खिलाफ सामान्य तौर हड़ताल का तरीका नहीं अपनाता है.

इस लिहाज से देखा जाए तो दिल्ली में आईएएस अधिकारियों की ये हड़ताल उनके कोड ऑफ कंडक्ट से मेल नहीं खाती. अधिकारी अपने सामान्य व्यवहार से हटकर व्यवहार कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे पूरे मामले को जबरदस्त तूल देने की कोशिश की जा रही है. अंशु प्रकाश मामले में वैसे भी तेजी के साथ कार्रवाई हो रही है. लेकिन अधिकारियों ने तो गजब की तेजी दिखाई ! इससे पहले कि अंशु प्रकाश की मेडिकल रिपोर्ट सामने आती, अधिकारियों ने ऐलान-ए-जंग कर दिया. लेकिन इस प्रकरण पर नजर रख रहे हर आम व्यक्ति के  दिमाग में ये बात तो जरूर घूम ही रही होगी कि आखिर आईएएस अधिकारियों का इतना टकराव सिर्फ अरविंद केजरीवाल से ही क्यों होता है ? यही अधिकारी दूसरे राज्यों में दुम दबाकर रहते हैं और दिल्ली में शेर की मानिंद दहाड़ने कैसे लगते हैं? लोगों की याद में वो तस्वीरें बिल्कुल ताजा होंगी जब एक अधिकारी उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सीएम मायावती को जूते पहना रहे थे. तब आईएएस एसोसिएशन का सम्मान कहां चला गया था?

दिल्ली में ये सारा विरोध-प्रतिरोध सिर्फ इसलिए चलता रहता है जिससे अरविंद केजरीवाल की सरकार के 'कमजोर' होने के एहसास को जगाया रखा जा सके.

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