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आंध्र प्रदेश: मोदी सरकार से TDP के मनमुटाव की कहानी कुछ और भी है

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने को लेकर कुछ प्रावधान हैं, जिसके पूरा होने पर ही किसी राज्य को इसका दर्जा दिया जा सकता है.

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Mar 08, 2018 05:26 PM IST

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आंध्र प्रदेश: मोदी सरकार से TDP के मनमुटाव की कहानी कुछ और भी है

बिहार के सीएम नीतीश कुमार की पुरानी मांग रही है कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए. इस मांग को लेकर उन्होंने बड़े-बड़े आंदोलन चलाए हैं. 2010 में उन्होंने ऐलान किया था कि जो पार्टी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देगी जेडीयू उस पार्टी का समर्थन करेगी. 2012 में नीतीश कुमार ने इसी मांग को उठाते हुए पटना से लेकर दिल्ली तक में रैलियां की.

अधिकार रैली के नाम से हुई इन रैलियों में बिहार का हक लेकर रहेंगे जैसे गर्मजोशी से भर देने वाले नारे भी लगे. पटना के गांधी मैदान से लेकर दिल्ली के रामलीला ग्राउंड तक में नीतीश कुमार ने अपने दावे के समर्थन में लाखों-लाख लोग इकट्ठा कर लिए. इन रैलियों में गरजते और बरसते हुए नीतीश कुमार कहा करते थे कि दस करोड़ बिहार वासियों की हकमारी आखिर कब तक बर्दाश्त की जाएगी? विशेष राज्य का दर्जा हासिल करने के निर्णायक संघर्ष में अब बिहारी जरूर उतरेंगे और पटना ही नहीं दिल्ली के मैदान से भी हुंकार भरेंगे.

इसके बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया. आरजेडी और जेडीयू के साथ मिलकर बने महागठबंधन के नए समीकरण ने उन्हें पीएम मोदी के खिलाफ खुलकर बोलने का मौका दे दिया था. नीतीश कुमार ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा न देने को पीएम मोदी की वादाखिलाफी बताकर उनकी खूब लानत मलानत की थी.

नीतीश कुमार विशेष राज्य का दर्जा मांगते-मांगते चुप क्यों हो गए?

बिहार में महागठबंधन की सरकार बन जाने के बाद भी वो इस मांग को लेकर केंद्र सरकार पर हमले करते रहे. लेकिन बाद में स्थितियां बदल गईं. 2017 में रातोंरात महागठबंधन टूट गया और नीतीश कुमार को एनडीए के सहयोग से अपनी कुर्सी बचानी पड़ी. इसके बाद उन्होंने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने का राग अलापना बंद कर दिया. फिर नीतीश कुमार अपनी इस मांग पर कभी खुलकर नहीं बोले. यहां तक की जेडीयू के कुछ नेताओं ने बोलना शुरू कर दिया कि बिहार के बदले हालात में इस मांग का अब कोई मतलब नहीं है. नीतीश कुमार के अपने स्टैंड से पीछे हटने को लेकर आरजेडी ने तंज भी कसे गए.

Darbhanga: Bihar Chief Minister Nitish Kumar addresses a gathering during 'Samiksha Yatra' in Darbhanga on Saturday. PTI Photo(PTI12_16_2017_000138B)

दरअसल किसी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग उस राज्य की असली जरूरत से ज्यादा एक शुद्ध रूप से राजनीतिक मसला बन गया है. इसे मौके-बेमौके भुनाया जाता है. जैसे कभी बिहार के सीएम नीतीश कुमार भुना रहे थे और आज आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू भुना रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राज्य सरकारें अक्सर अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए ऐसे मुद्दे उठाते रहते हैं.

आखिर क्यों पूरी नहीं होती विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग

बिहार में भी जब सीएम रहते नीतीश कुमार ने विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग रखी थी कि कई लोगों की राय में वो अपने सत्ता में रहते हुए भी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए इस मुद्दे को हवा दे रहे थे. वरना सबको मालूम था कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने का मसला इतना आसान नहीं है. आज आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू उसी राह पर चलते हुए राजनीति कर रहे हैं.

विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने को लेकर कुछ प्रावधान हैं, जिसके पूरा होने पर ही किसी राज्य को इसका दर्जा दिया जा सकता है. ये दर्जा अभी तक पहाड़ी दुर्गम इलाकों, बॉर्डर से लगते इलाकों, आदिवासी बहुल और गरीब राज्यों को ही मिलने का प्रावधान है. देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों को मिलाकर कुल 11 राज्य इस दर्जे में आते हैं. ये हैं- अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और असम. इस दर्जे को हासिल करना जितना बिहार के लिए मुश्किल है उतना ही आंध्र प्रदेश के लिए भी.

एक सवाल ये भी है कि आखिर आंध्र प्रदेश में इस मांग को लेकर जो तूफान अभी उठा है और टीडीपी और बीजेपी के रिश्तों में जो कड़वाहट घुली है उसके मायने क्या हैं. चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के बंटवारे के वक्त से ही आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग उठाते रहे हैं. उनका कहना है कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बंटने से राज्य के संसाधन कम हुए हैं, राजस्व घटा है, जिसकी भरपाई के लिए राज्य को विशेष दर्जा दिया जाना चाहिए. एक बात उठती है कि आखिर इसी वक्त इस मसले ने इतनी हवा क्यों पकड़ी कि टीडीपी को मोदी सरकार से अलग हो जाने का फैसला करना पड़ा.

naidu and modi

2019 की चुनौती ने रिश्तों में दूरियां पैदा कीं?

दरअसल टीडीपी और बीजेपी के रिश्तों में बदलाव की गुंजाइश आने वाले 2019 की चुनौती के मद्देनजर भी महसूस हुई है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि दरअसल चंद्रबाबू नायडू ने ये फैसला बीजेपी और वाईएसआर कांग्रेस के बीच बढ़ती नजदीकियों की वजह से लिया है. विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग तो दिखावा भर है. इस रिश्ते के टूटने के पीछे दोस्ती में बेवफाई के किस्से हो सकते हैं.

पब्लिक सेंटीमेंट को समझते हुए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने की कोशिश टीडीपी भी कर रही है और बीजेपी भी. खासकर बीजेपी ने नॉर्थ ईस्ट में जिस तरह की जबरदस्त जीत हासिल की है उसमें पार्टी की रिस्क लेने की क्षमता बढ़ी है. जानकार बताते हैं कि शायद टीडीपी की मांग के सामने न झुककर शायद बीजेपी आंध्र प्रदेश में खुलकर खेलने का मौके के तलाश में भी हो. क्योंकि टीडीपी के साथ पुराने रिश्तों की वजह से अभी तक उसे चंद्रबाबू नायडू की छत्रछाया में ही आगे बढ़ने के रास्ते तलाशने थे. बीजेपी के दक्षिणी कमान का एक धड़ा टीडीपी के विरोधी वाईएसआर से नजदीकी बढ़ाने के संकेत दे रहा है. शायद नायडू को भी इस बात की भनक थी. इसलिए रिश्तों में ये बदलाव आया है.

आंध्र प्रदेश में लोकसभा की कुल 25 सीटें हैं. बीजेपी और टीडीपी के साथ मिलाकर कुल 17 लोकसभा सांसद हैं. जबकि बाकी वाईएसआर कांग्रेस के 8 सांसद हैं. आंध्र के बंटवारे के बाद यहां से कांग्रेस को एक सीट तक हासिल नहीं हुई थी. बीजेपी को लगता है कि कांग्रेस की तरह अगर वो भी आंध्र की जनता का सेंटीमेंट नहीं समझ पाती है तो वो साइडलाइन हो सकती है. 2019 की चुनौती आने में अभी वक्त है लेकिन बीजेपी इस दौरान जनता तक ये संदेश स्पष्ट तौर पर पहुंचा देना चाहती है कि केंद्र सरकार ने राज्य की भरपूर मदद की है. इस दौरान अब आंध्र प्रदेश की राजनीति किस करवट लेती है ये देखना होगा.

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