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जोखिम ले रहे हैं चंद्रबाबू , सरकार से हटे तो गठबंधन में क्यों ?

आज तेलुगु लोग ये सोचते हैं कि राज्य की मदद के अपने वादे से पीछे हटने वाली बीजेपी ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि राज्य में उसकी कोई मजबूत सियासत नहीं है

Updated On: Mar 09, 2018 03:11 PM IST

K Nageshwar

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जोखिम ले रहे हैं चंद्रबाबू , सरकार से हटे तो गठबंधन में क्यों ?

2014 का चुनाव जीतने के लिए तेलुगु देशम पार्टी का राष्ट्रीय राजनीति में अपने पत्ते सही तरीके से चलना अहम था. ये वो वक्त था जब आंध्र के लोगों को केंद्र के सहयोग की जरूरत महसूस हो रही थी. उस वक्त पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी. ऐसे में चंद्रबाबू नायडू का एनडीए में शामिल होना सही सियासी दांव लगा था.

लेकिन, अब नायडू ने सोचा-समझा सियासी जोखिम लेते हुए एनडीए सरकार से अपने मंत्रियों का इस्तीफा दिला दिया है. वो कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्षी दलों के महागठबंधन में शामिल हो नहीं सकते क्योंकि नायडू, कांग्रेस को ही आंध्र प्रदेश के बंटवारे का विलेन ठहराते रहे हैं. तीसरे मोर्चे में आज कोई ताकत नहीं दिखती. न उसका कोई रंग-रूप है. न ही कोई नेता है. ऐसे में सवाल ये है कि 2019 के चुनाव के लिए चंद्रबाबू नायडू राष्ट्रीय राजनीति में अब कौन सा दांव खेलेंगे?

2014 में गठबंधन सफल रहा था

2014 में जिन हालात में और जिस तरीके से आंध्र प्रदेश का बंटवारा हुआ, उसमें सीमांध्र के लोग असहाय महसूस कर रहे थे. सीमांध्र ही आज का आंध्र प्रदेश है. उस वक्त नए राज्य के लिए बुनियादी ढांचे का विकास और नई राजधानी को विकसित करना ही राज्य का मुख्य राजनैतिक एजेंडा था. इसी मुद्दे पर 2014 के चुनाव लड़े गए.

मैंने इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में अपने एक लेख में 12 जुलाई 2014 को लिखा था कि, 'सीमांध्र के लोगों में असहाय होने का जो भाव है, उसमें मोदी फैक्टर बेहद अहम हो जाता है. लोगों को बचे-खुचे आंध्र प्रदेश के विकास के लिए केंद्र के सहयोग की सख्त जरूरत महसूस हो रही है...चंद्रबाबू ने अपनी सियासी समझदारी का परिचय देते हुए चुनाव से पहले ही मोदी से गठबंधन कर के एनडीए में शामिल होने का फैसला किया.

इस तरह राज्य के विकास की चुनौती को नायडू ने खुद के लिए एक बड़े सियासी मौके में तब्दील कर लिया. पूरे देश में मोदी के पक्ष में माहौल था. सीमांध्र के वोटर को भी लगा कि नायडू केंद्र सरकार के साथ मिलकर चुनाव जीत लेंगे और बिना राजधानी वाले नए सूबे को तरक्की की नई ऊंचाई पर पहुंचाएंगे. इस तरह मोदी फैक्टर की मदद से नायडू को अपने लिए समर्थन जुटाने में मदद मिली'.

TDP pulls out of NDA

बस इस्तीफा दिलवाकर इंतजार कर रहे हैं नायडू

2014 में टीडीपी को महज 6 लाख या 2.06 फीसद वोट का मामूली बहुमत मिला था. साफ है कि मोदी फैक्टर ने नायडू को सत्ता तक पहुंचाने में अहम रोल निभाया था. शायद यही वजह है कि बीजेपी ने टीडीपी को ज्यादा भाव न देने का फैसला किया. शायद इसी नुकसान का अंदाजा लगाकर चंद्रबाबू नायडू ने अभी एनडीए से अलग होने का फैसला नहीं किया है.

अभी भी नायडू ने सिर्फ मंत्रियों के इस्तीफे दिलाकर बीजेपी के लिए एक मौका छोड़ रखा है. शायद जनता के बीच अभी ये माहौल बनाने की कोशिश हो रही है कि नायडू ने राज्य की मदद के लिए बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार को समझाने की भरपूर कोशिश की.

लेकिन, बीजेपी का गणित गलत भी हो सकता है. राजनीति में अंकगणित नहीं चलता. इसमें अक्सर रसायनशास्त्र के समीकरण चलते हैं. चुनाव में हमेशा आंकड़ा बढ़े ही, ये जरूरी नहीं.

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2014 के जनादेश का विश्लेषण करते हुए मैंने लिखा था कि, 'ये कहना गलत होगा कि चंद्रबाबू नायडू सिर्फ मोदी लहर पर सवाल होकर सत्ता तक पहुंचे. बीजेपी से गठबंधन से पहले टीडीपी ने स्थानीय निकाय के चुनावों में भी अच्छा प्रदर्शन किया था. उस वक्त लोकप्रिय अभिनेता पवन कल्याण भी टीडीपी-बीजेपी गठबंधन का हिस्सा नहीं बने थे'.

राज्य में बीजेपी की स्थिति उतनी मजबूत भी नहीं

हाल ही में नांद्याल के उपचुनाव में भी टीडीपी ने बीजेपी को अलग-थलग कर के भी भारी जन समर्थन हासिल किया था. शायद इसी से टीडीपी ने ये हिसाब लगाया होगा कि बीजेपी से अलग होकर उसे ज्यादा नुकसान नहीं होगा, क्योंकि राज्य में बीजेपी उतनी मजबूत नहीं है. तेलुगु जनता को बीजेपी की हिंदी-हिंदू की राजनीति भी बहुत पसंद नहीं. इस आधार पर सियासी और धार्मिक एकजुटता की राजनीति उसे रास नहीं आती. राज्य में ऐसा कोई बड़ा बीजेपी नेता भी नहीं है, जो जनता को ये समझा सके कि मोदी सरकार ने आंध्र प्रदेश के लोगों की मदद की हर मुमकिन कोशिश की.

आज आंध्र प्रदेश में आम जनभावना यही है कि केंद्र ने राज्य के लोगों को धोखा दिया है. 2014 में लोगों के गुस्से का निशाना कांग्रेस थी, क्योंकि लोगों ने राज्य का इकतरफा बंटवारे के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार माना था. आज लोग ये सोचते हैं कि राज्य की मदद के अपने वादे से पीछे हटने वाली बीजेपी ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि राज्य में उसकी कोई मजबूत सियासत नहीं है.

TDP pulls out of NDA

पिछले दिनों राज्य को विशेष दर्जा देने पर जिस तरह से सियासत हुई. तमाम राजनैतिक दलों ने इसे भुनाने की कोशिश की, जज्बाती मामला बनाया. ऐसे में जगन मोहन रेड्डी की वायएसआर कांग्रेस के लिए बीजेपी से गठबंधन करना सियासी खुदकुशी जैसा होगा. इससे टीडीपी को ही फायदा होगा.

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पवन कल्याण की जनसेना के टीडीपी से ही जुड़ने की संभावना है. इससे नायडू बीजेपी से अलग होने के नुकसान की काफी हद तक भरपाई कर लेंगे. हालांकि 2014 में जनसेना ने टीडीपी-बीजेपी गठबंधन का समर्थन किया था और चुनाव नहीं लड़ा था. लेकिन इस बार पार्टी चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी में है.

कांग्रेस के लिए भी हालात नहीं हैं माकूल

पिछले दिनों कराए गए सियासी सर्वे में संसदीय क्षेत्रों में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनता दिख रहा है. लेकिन राज्य के लोग अभी भी विधानसभा चुनाव में राज्य के बंटवारे को भूलकर कांग्रेस को माफ करने के लिए तैयार नहीं हैं. 2019 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आने पर राज्य को विशेष दर्जा देने का वादा कर रही है. वहीं बीजेपी इससे साफ इनकार कर रही है. शायद कांग्रेस के लिए समर्थन बढ़ने की ये बड़ी वजह है. लेकिन कांग्रेस से राज्य के बंटवारे को लेकर नाराजगी भी है. ये परस्पर विरोधी माहौल ऐसा है कि कांग्रेस के पक्ष में कोई भविष्यवाणी करना ठीक नहीं होगा.

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टीडीपी भी इसी वजह से कांग्रेस से चुनाव से पहले किसी गठबंधन को लेकर हिचकिचा रही है. क्योंकि राज्य के लोग कांग्रेस को बंटवारे का विलेन मानते हैं. इसीलिए विधानसभा चुनाव में बहुकोणीय मुकाबला होना तय है. ऐसे में टीडीपी को उम्मीद है कि वो अपने पक्ष में जनादेश हासिल कर लेगी. राजस्थान जैसे राज्य, जहां बीजेपी सत्ता में है, वहां पार्टी का घटता जनाधार टीडीपी का हौसला बढ़ा रहा है.

अब नायडू खुलकर आंध्र अस्मिता को नुकसान पहुंचने का कार्ड खेल सकते हैं. यानी फिलहाल अगर टीडीपी के पास राष्ट्रीय स्तर पर कोई सहयोगी भले न हो, लेकिन कई चुनावी जीतों के धुरंधर नायडू को लगता है कि फिलहाल उनके पास एनडीए से अलग होने के सिवा कोई विकल्प नहीं. इसीलिए उन्होंने सोचा-समझा सियासी जोखिम लिया है.

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