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घूम-घूमकर माफी मांगने के बाद, धरना-प्रदर्शन के पुराने रंग में लौटे केजरीवाल

केजरीवाल अपने पुराने तेवर में तब लौटे हैं जब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने उन्हें माफ कर दिया और उनके खिलाफ दायर कई सिविल और क्रिमिनल केस खत्म कर दिए

Updated On: Jun 13, 2018 10:35 AM IST

Sanjay Singh

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घूम-घूमकर माफी मांगने के बाद, धरना-प्रदर्शन के पुराने रंग में लौटे केजरीवाल

खुद को बागी के तौर पर दुनिया के सामने पेश करने वाले नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार फिर से देश की राजधानी दिल्ली में सक्रिय हो गए हैं.

लोगों को याद दिला दें कि अरविंद केजरीवाल स्वघोषित अराजकतावादी हैं. पिछली कई बार की तुलना में इस बार उनके धरने में जो बात अलग है वो ये कि, इस बार की चिलचिलाती गर्मी में उन्होंने आंदोलन की जगह सड़क पर नहीं बल्कि दिल्ली के एलजी के रूम के वेटिंग रूम को चुना है. जहां न उन्हें गर्मी सहनी पड़ रही है और ही कड़कड़ाती ठंड झेलनी पड़ रही है.

केजरीवाल को ये धरना खूब रास आ रहा है

कल शाम को केजरीवाल अपने तीन सबसे विश्वासपात्र सहयोगियों मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन और गोपाल राय के साथ दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल के घर पर पहुंचे और वहां मेहमानों के लिए बने कमरे पर कब्जा जमाकर बैठ गए. उसके बाद उन्होंने एक के बाद एक कई ट्वीट के जरिए दिल्ली और देश के लोगों को ये बताने कि कोशिश की कि अब उन्हें पास काम-काज से दूर रहने और धरना-प्रदर्शन करने का एक और उपाय मिल गया है. हर थोड़े अंतराल के बाद आती उनकी एक के बाद एक कई ट्वीट से ये साफ समझ में आता है कि उन्हें धरना देने का अपना ये नया तरीका खूब रास आ रहा है. इसे उनके द्वारा खुद पर लगाई गई, जेल की सज़ा भी कह सकते हैं. मसलन- आराम से एसी कमरे में, सेंटर टेबल में पैर फैलाकर सोफे में आराम फरमाना या काउच पर पड़े होना- एक किस्म का आराम ही तो है.

वो बड़ी ही खुशी-खुशी अपने पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए ट्वीट्स को रिट्वीट कर रहे थे, जिसमें वे आप कार्यकर्ता दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के कभी न मरने वाले उत्साह और आंदोलन की जिजीविषा की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे, वे लोग बारी-बारी से केजरीवाल की पहले और आज के धरने की तस्वीरें शेयर कर रहे थे. अंदरखाने मौजूद एक व्यक्ति के अनुसार उन्हें बाहर से अपनी पसंद का खाना मिल रहा है, लेकिन अभी तक उन्होंने साफ कपड़ों की मांग नहीं की है. इन सभी नेताओं में सिर्फ़ सत्येंद्र जैन ही इकलौते ऐसे नेता होंगे जो पूरी तरह से अनिश्चिकालीन उपवास पर रहेंगे, ताकि वे एलजी पर दबाव बना सकें पर बाकी सभी नेता और मंत्री सामान्य तरीके से अपना खाना, नाश्ता, चाय और अन्य भोजन लेते रहेंगे.

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कुमार विश्वास भी मैदान में

लेकिन, ट्विटर-ट्विटर के इस खेल में, केजरीवाल और सिसोदिया का साथ देने के लिए उनके पूर्व साथी और विद्रोही नेता कुमार विश्वास मैदान में उतर गए हैं. विश्वास अपने मर्मभेदी और व्यंग्यात्मक टवीट्स से मैदान में डटे हैं. हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आम आदमी पार्टी में अभी भी ऐसे कई कार्यकर्ता हैं जो कुमार विश्वास के समर्थक हैं. हालांकि, ये पूरी तरह से मुमकिन है ये समर्थक किसी बड़े पद पर न होकर पार्टी में आम कार्यकर्ता या वॉलंटियर के हैसियत से जुड़े हुए हों.

केजरीवाल ने इससे पहले अपना अंतिम धरना, साल 2014 की सर्दियों में गणतंत्र दिवस के कुछ दिन पहले ही रेल भवन के नजदीक दिया था, तब उन्होंने विजय चौक से कुछ पुलिस वालों जिनमें कुछ एसएचओ और कुछ एसीपी शामिल थे, उन्हें वहां से हटाने की मांग की थी. तभी उन्होंने पूरी शान के साथ ऐलान किया था कि, ‘हां मैं एक अराजक इंसान हूं, हां मैं शांति भंग करता हूं...’ उस वक्त़ केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद पर आसीन थे लेकिन, तब भी उन्होंने अपना एक और प्रख़्यात वक्तव्य दिया था, जिसमें उन्होंने देश में गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाए, इसपर सवाल किया था. तब उन्होंने ये भी कहा था कि वे कम से कम 10 दिनों तक के लिए धरना प्रदर्शन की तैयारी कर के आए हैं.

आईएएस अधिकारियों के हड़ताल के खिलाफ धरना

11 जून 2018 को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के एलजी अनिल बैजल से मिलने का वक्त़ मांगा और अपने तीन मंत्रियों के साथ उनसे मिलने पहुंचे. उन्होंने एलजी महोदय के सामने मांग रखी कि दिल्ली के सभी कार्यरत आईएएस अफसरों को तत्काल प्रभाव से बुलाकर उन्हें अपनी तीन महीने पुरानी हड़ताल तोड़ने का आदेश दिया जाए. (हालांकि, तकनीकी तौर पर ऐसी कोई हड़ताल हुई ही नहीं है, क्योंकि सभी अफसर रोज़ाना दफ्त़र आ रहे हैं और अपना काम भी कर रहें हैं लेकिन चूंकि आम विधायकों ने मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मुख्यमंत्री के घर पर केजरीवाल और सिसोदिया की मौजूदगी में मारपीट की है, इसलिए अब इन अफसरों ने मिलकर ये फैसला किया है कि वे अकेले में किसी मंत्री से उसके चेंबर में न तो मिलने जाएंगे न ही उनके आदेश लेंगे). अब सरकार दोषी अधिकारियों के खिलाफ़ एस्मा कानून लगाने की बात कर रही है.

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केजरीवाल और उनके साथियों ने साफ लहज़े में कह दिया है कि वे तब तक अपना धरना खत्म नहीं करेंगे, जब तक उनकी मांगें मान नहीं ली जातीं. अब ये समझने के लिए हममें से किसी को भी ज्योतिषी होने की जरूरत नहीं है कि- ये गतिरोध जल्द खत्म होने से रहा.

फिर से शुरू 'ब्लेम-गेम'

इस बीच केजरीवाल और उनकी कंपनी वापिस से अपनी उन्हीं तौर-तरीकों में लौट आई जिनके लिए वे प्रख्यात हैं, और वो है हर बात के लिए पीएम मोदी को दोषी ठहराना. पिछले कुछ महीनों में आम आदमी पार्टी पंजाब चुनावों में करारी हार, दिल्ली उपचुनावों में भी निराशाजनक प्रदर्शन और कपिल शर्मा के विद्रोह के बाद केजरीवाल ने लगभग पीएम मोदी का नाम लेना ही बंद कर दिया था, (सही कहें तो उन्होंने एक तरह से चुप्पी साध ली थी), लेकिन अब वे फिर से मोदी का नाम जपने लगे हैं. हाल ही में उन्होंने अपने एक विश्वासी सहयोगी और राज्यसभा सांसद संजय सिंह के उस बयान का समर्थन किया था जिसमें संजय सिंह ने कहा था, ‘उपराज्यपाल पीएम मोदी के हाथ के महज़ एक कठपुतली हैं, जो उनके इशारों पर नाच रहे हैं.’

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 11 अप्रैल को मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ हुई मारपीट के बाद दिल्ली सरकार का कामकाज पूरी तरह से ठप्प हो गया है. लेकिन, इसके बावजूद केजरीवाल सरकार ने अफसरों की शिकायतों को दूर करने की कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है. बदले में उन्होंने उन पीड़ित अधिकारियों पर कई तरह के आरोप ही लगाए हैं.

इसी सरकार के साथ क्यों है ऐसी समस्या?

ये भी सही है कि दिल्ली सरकार से जुड़े सभी प्रशासनिक अधिकार दिल्ली के राज्यपाल के पास है, न कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट भी कह चुकी है. दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश या यूं कहे तो हाफ-स्टेट है. केजरीवाल यहां के दो उपराज्यपालों से सत्ता में आने के बाद से लगातार लड़ाई कर रहे हैं. पहली बार 2013-2014 में दो महीनों के लिए और दोबारा साल 2015 में सत्ता में आने के बाद से. यहां ये बताना जरूरी है कि इसी सिस्टम के भीतर दिल्ली के चार मुख्यमंत्रियों ने 20 सालों तक काम किया है- जिनमें मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा, सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित शामिल हैं. इन लोगों का दिल्ली के एलजी के साथ किसी तरह का कोई बड़ा विवाद कभी नहीं हुआ. लेकिन केजरीवाल के साथ ये आए दिन की बात हो गई है, जैसे मानो ये उनकी दिनचर्या का हिस्सा है.

यहां ये जानना बेहद दिलचस्प है कि केजरीवाल दूसरों पर दोष मढ़ने और धरना-प्रदर्शन करने के अपने पुराने तौर-तरीके पर तब पहुंचे हैं जब वे बीजेपी समेत कई अन्य पार्टी के नेताओं से हाथ जोड़कर माफी मांग चुके हैं. इनमें बिक्रम सिंह मजीठिया, नितिन गडकरी, अमित सिब्बल (कपिल सिब्बल के बेटे), से लेकर दिल्ली पुलिस पर किया गया ‘ठुल्ला’ की टिप्पणी जैसे कई अन्य नाम शामिल हैं, जो काफी लंबा चल सकता है. लेकिन, केजरीवाल अपने पुराने तेवर में तब लौटे जब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने उन्हें माफ कर दिया और उनके खिलाफ दायर कई सिविल और क्रिमिनल केस खत्म कर दिए.

अब जबकि केजरीवाल ने खुद को एलजी के घर पर कैद कर रखा है, तब पार्टी के अन्य नेताओं, मंत्रियों, अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं को केजरीवाल के आधिकारिक घर के पास इकट्ठा होने को कहा गया है ताकि ये लोग अपनी एकजुटता का प्रदर्शन कर सकें और किसी भी चीज के लिए तैयार रहें. ये लोग सभी एलजी के घर के पास जाकर विरोध-प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं क्योंकि उस इलाके की बैरिकेंडिंग कर उसे बंद कर दिया गया है.

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