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पंजाब विधानसभा चुनाव नतीजे: जन्मदिन पर कैप्टन को मिला पंजाब की जीत का तोहफा

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस का बेड़ा पार कर दिया है.

Updated On: Mar 12, 2017 08:59 AM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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पंजाब विधानसभा चुनाव नतीजे: जन्मदिन पर कैप्टन को मिला पंजाब की जीत का तोहफा

‘हैपी बर्थडे कैप्टन! आप हमारे नए सीएम हैं’- शनिवार को पंजाब के वोटरों ने कुछ इसी तरह से वोटों के जरिए अमरिंदर सिंह को उनके जन्मदिन की बधाई दी.

अमरिंदर सिंह ने पटियाला सीट से जीत हासिल की और उनका सीएम बनना तकरीबन तय है.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कैप्टन को जनवरी में ही कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुके थे.

कांग्रेस को मिली राहत 

पिछले कुछ सालों में जिस तरह के राजनीतिक बुरे दौर से कांग्रेस पार्टी गुजर रही है उसमें पार्टी को जो कुछ राहत मिलती नजर आ रही है वह कैप्टन अमरिंदर सिंह की वजह से ही है.

2014 के आम चुनावों में पार्टी की बुरी हार में अमरिंदर सिंह एकमात्र ऐसे बड़े नेता थे जिन्होंने बीजेपी के दिग्गज अरुण जेटली को अमृतसर लोकसभा सीट पर हराकर सुर्खियां बटोरी थीं.

कैप्टन ने पार लगाई नैया 

आज वह ऐसे वक्त में वह कांग्रेस की नैया पंजाब में पार लगाने में सफल रहे हैं जबकि पार्टी पूरे देश से तकरीबन साफ हो चुकी है.

आज ही वह 75 साल के हुए हैं और उनके लिए इससे बड़ी बधाई क्या हो सकती है. उन्हें एक ऐसे राज्य का गिफ्ट मिला है जिसे उन्होंने कांग्रेस पार्टी के सबसे खराब दौर में राजनीतिक तौर पर सजाया-संवारा है.

11 मार्च 1942 को पटियाला के महाराजा यादविंदर सिंह और महारानी मोहिंदर कौर के यहां अमरिंदर सिंह का जन्म हुआ. वह फुल्कियां वंश से ताल्लुक रखते हैं.

वह पहले की पटियाला रियासत की रॉयल फैमिली के मुखिया हैं. 2002 से 2007 के बीच वह पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.

कैप्टन ही कांग्रेस हैं, कांग्रेस ही कैप्टन है

पंजाब में असेंबली इलेक्शन का प्रचार जब अपने चरम में था, तब एक ही नारा उभरा था जो एक ब्रांड के तौर पर कायम हुआ और जो कांग्रेस पार्टी और वोटरों से सीधा जुड़ गया.

यह था, ‘कैप्टन ही कांग्रेस हैं, कांग्रेस ही कैप्टन है.’ संदेश साफ था. अगर पंजाब में कांग्रेस जीतती है तो कैप्टन मुख्यमंत्री होंगे. पंजाब में कांग्रेस अगर किसी चेहरे पर दांव लगा सकती थी, तो वह कैप्टन ही थे.

उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद 1980 में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए चुना था. दोनों के बीच दून स्कूल से संबंध था. उसके बाद से अमरिंदर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, और आज उनका राजनीतिक करियर एक और नई ऊंचाई पर पहुंच गया है.

अब पार्टी बेसब्री से कैप्टन की ओर पंजाब जिताने के लिए देख रही थी. कांग्रेस पंजाब जीत गई है और कैप्टन का पार्टी में कद बढ़ना तय है.

पार्टी का इन चुनावों में चेहरा बचाने वाले एकमात्र नेता के तौर पर उभरने वाले कैप्टन के बारे में जानते हैं कि आखिर वह इतने अहम कैसे बन गए हैं?

1984 में शिरोमणि अकाली में शामिल हो गए थे कैप्टन

1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध लड़ चुके अमरिंदर नेशनल डिफेंस एकेडमी और इंडियन मिलिटरी एकेडमी से ग्रेजुएट हैं.

1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान आर्मी एक्शन के विरोध में कैप्टन ने कांग्रेस छोड़कर शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया था. 2008 में वह फिर से कांग्रेस में आ गए.

जड़ों से दूर हो चुकी कांग्रेस को आखिरकार कम से कम पंजाब में कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने में कामयाबी हासिल हुई. इसी के चलते अमरिंदर को तरजीह दी गई.

कांग्रेस के मसीहा 

पूर्ववर्ती पटियाला रियासत के महाराजा कैप्टन अमरिंदर सिंह लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की बुरी हार में एकमात्र बचने वाले नेता रहे.

कैप्टन ब्रांड को मजबूत बनाने के लिए कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जनवरी के अंत में आधिकारिक तौर पर ऐलान कर दिया था कि पंजाब में पार्टी का चेहरा अमरिंदर सिंह होंगे.

गांधी ने कहा था, ‘अमरिंदर सिंह ने पंजाब के लिए खून-पसीना बहाया है. उन्होंने पंजाब के विकास के लिए दिन-रात एक किया है. उन्होंने पंजाबी और सरदार समुदाय के लिए काम किया है. वह हमारे मुख्यमंत्री होंगे.’

2014 में जेटली को दी थी मात

हालांकि, अमरिंदर ने 2014 के आम चुनावों में अमृतसर सीट से बीजेपी के अरुण जेटली को हरा दिया था, लेकिन उन तक पहुंचने में होने वाली दिक्कतों का आरोप उन पर लगता रहा है.

इसे देखते हुए चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर 2016 में पार्टी से जोड़े गए. राहुल गांधी पंजाब में चुनाव प्रचार को पेशेवर तरीके से करना चाहते थे.

तब तक किशोर बिहार में सीएम नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री की गद्दी तक पहुंचाने में कायमाब हो चुके थे और उनकी धाक जम गई थी.

किशोर और उनकी आईपीएसी टीम ने कांग्रेस के साथ मिलकर अमरिंदर के लिए इमेज मेकओवर रणनीति तैयार की. उन्होंने कैप्टन को पंजाब असेंबली इलेक्शन 2017 के लिए पार्टी के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किया.

काम कर गया कॉफी विद कैप्टन

पिछले दिसंबर में 74 साल के रहे कैप्टन नई प्रचार मुहिम कॉफी विद कैप्टन, हल्के विच कैप्टन, पंजाब दा कैप्टन शुरू की.

इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया का बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया. उन्होंने शहरी और ग्रामीण दोनों तरह के युवाओं को साथ जोड़ा.

और इस तरह से पहुंच से दूर नेता की छवि को भी तोड़ा. अमरिंदर पहले ही कह चुके थे कि यह उनका अंतिम चुनाव है.

क्या अब वह इस बारे में दोबारा सोचेंगे. कांग्रेस को उनकी जरूरत है. यह बात इस बात पर निर्भर करता है कि कांग्रेस उनकी अहमियत को कितना समझ पाती है.

तब तक, हैपी बर्थडे कैप्टन.

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