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बीजेपी के एजेंडे में 'हिंदुत्व' की वापसी आत्मविश्वास की कमी दिखाता है

बीजेपी जानती है कि नोटबंदी और विकास जैसे मुद्दों के सहारे यूपी में दांव नहीं चला जा सकता है.

Updated On: Jan 31, 2017 03:25 PM IST

Sreemoy Talukdar

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बीजेपी के एजेंडे में 'हिंदुत्व' की वापसी आत्मविश्वास की कमी दिखाता है

इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली जनसभा लखनऊ के रमाबाई अंबेडकर मैदान में हुई, जहां भारी भीड़ मौजूद थी. तब प्रधानमंत्री ने लोगों से जात-पात और धर्म से ऊपर उठकर मतदान करने की अपील की थी. प्रधानमंत्री यूपी के वोटरों से राज्य के वास्तविक विकास के लिए ऐसा करने को कह रहे थे.

2 जनवरी को हुई इस रैली में प्रधानमंत्री ने कहा, 'राज्य के लोगों ने पहले ही जाति और परिवार आधारित राजनीति देखी है...लेकिन एक बार मतदाता जाति और वर्ग से ऊपर उठ कर चुनाव में विकास के नाम पर वोट डालें..और इसके बाद देखें कि उत्तर प्रदेश में बदलाव आता है या नहीं.'

क्या मोदी की विचारधारा पार्टी से अलग है?

बीते शनिवार को बीजेपी ने यूपी चुनाव को लेकर पार्टी का घोषणापत्र जारी किया. रविवार को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने नेटवर्क 18 के एडिटर इन चीफ राहुल जोशी को विशेष, बेबाक और विस्तृत इंटरव्यू दिया. लेकिन इंटरव्यू के दौरान अमित शाह ने जिन विषयों पर खुलकर अपनी राय रखी वो बीजेपी के घोषणापत्र में किए गए वादों के मुकाबले अलग जान पड़ती हैं.

amit shah live

अमित शाह ने इंटरव्यू में बीजेपी की चुनावी कामयाबी के लिए विकास के साथ साथ कुछ हद तक हिंदुत्व का तड़का लगाने की भी बात की. इसका मतलब ये हुआ कि पार्टी को इस बात का भरोसा नहीं है कि चुनाव में अकेले विकास के एजेंडे पर चलकर सूबे में बदलाव लाया जा सकता है.

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा से विकास, स्वास्थ्य, सफाई के मुद्दों की बात की है. उनकी प्राथमिकताओं में देश में भ्रष्टाचार और गरीबी कम करना शामिल है.

यूपी में वैसे भी चुनावी माहौल में मतदाताओं से विकास को लेकर कई वादे किए गए हैं. लेकिन लगता है कि शाह का चुनावी फार्मूला हिंदुत्व राग अलापने के साथ साथ सांप्रदायिक मुद्दों पर ध्रुवीकरण को उस हद तक हवा देने की है, जिससे ये भी न लगे कि पार्टी पूरी तरह से हिंदुत्व एजेंडे पर लौट चुकी है.

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अमित शाह कत्लखाने, हिंदुओं के पलायन जैसे मुद्दों को उठाते हैं. लेकिन वो इन मुद्दों को आर्थिक परिपेक्ष्य में देखने की वकालत भी करते हैं. साथ ही वो इसके लिए राज्य की नाकाम कानून व्यवस्था का भी हवाला देते हैं.

Amit Shah PC

हालांकि इस सवाल पर कि क्या बीजेपी नर्म हिंदुत्व की ओर वापस लौट रही है? इस पर शाह की राय है कि अगर पार्टी ऐसे जटिल सामाजिक मुद्दों को उठाती है, तो इसे हिंदुत्व की नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. क्योंकि कत्लखानों की व्यवस्था दरअसल किसानों से उनकी रोजी रोटी छिन रही है.

'कृपा कर कत्लखाने पर पाबंदी को उस नजरिए से न देंखें. पूरे उत्तर प्रदेश में चाहे पश्चिमी यूपी हो या फिर अवध, रोहिलखंड या फिर पूर्वांचल का इलाका - आप देखेंगे कि कत्लखानों के चलते गायें जो दूध देती थी वो अब खत्म हो गई हैं. अगर इलाके में सूखा या बाढ़ की स्थिति पैदा होती है, तो ऐसे वक्त में किसान के पास अगर गाय होगी तो वह अपनी जीविका फिर भी चला लेगा. उत्तर प्रदेश में दूध उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं. मैं गुजरात से ताल्लुक रखता हूं जहां उत्तर प्रदेश के मुकाबले पानी की कमी है. इसके बावजूद वहां डेयरियों के जरिए दूध उत्पादन के रिकॉर्ड कायम हुए हैं. हम चाहते हैं कि मवेशियों की तस्करी और कत्ल पर रोक लगाई जाए. आज ऐसे कई मामले हैं जिनके खिलाफ यूपी में एफआईआर तक दर्ज नहीं किया जाता. हमलोगों ने राज्य में डेयरी लगाने की योजना बनाई है ताकि किसानों को अच्छी कीमत हासिल हो पाएगी. इस वैल्यू एडिशन से किसान भी अपनी गरीबी को दूर कर पाएंगे.'

विकास की योजनाएं भी हैं घोषणापत्र में 

बीजेपी वोटरों को लुभाने के लिए अपने घोषणापत्र में अगर ईस्ट, वेस्ट, नॉर्थ एंड साउथ कॉरिडोर बनाने का वादा कर रही है, तो पार्टी के घोषणापत्र में सूबे के हर गांव को तहसील तक बस सेवा से जोड़ने का भी वादा किया गया है. इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने, मुफ्त लैपटॉप से लेकर 1 जीबी इंटरनेट डाटा तक देने का वादा इसमें मिलता है.

Amit Shah

इतना ही नहीं बीजेपी के घोषणापत्र में किसानों की कर्जमाफी से लेकर 120 दिनों के भीतर गन्ना किसानों को बकाया भुगतान करने का भी वादा किया गया है, लेकिन इन मुद्दों के बावजूद शाह ने राम मंदिर एजेंडा को इसमें शामिल करना नहीं छोड़ा. जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ये मुद्दा करीब करीब गौण था. लेकिन अमित शाह ने इंटरव्यू के दौरान कहा, 'राम मंदिर पर हमारा पक्ष बहुत साफ है. हम संवैधानिक दायरे में रह कर राम मंदिर निर्माण का मार्ग तलाशेंगे. हालांकि ये दो तरीकों से पूरा किया जा सकता है. मंदिर निर्माण या तो आपसी बातचीत से हो सकता है या कोर्ट के आदेश पर.'

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न्यूज 18 के एडिटर इन चीफ के ट्रिपल तलाक के सवाल पर भी शाह ने काफी बेबाकी से जवाब दिया. 'हम इस बात पर यकीन करते हैं कि संविधान के तहत इस देश की हर महिला को उसका अधिकार मिलना चाहिए. इसमें मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं. ट्रिपल तलाक मुस्लिम महिलाओं के अधिकार का हनन करता है.'

पार्टी घोषणापत्र जारी करने के दौरान शाह ने वादा किया कि अगर बीजेपी सत्ता में आती है तो 'ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर यूपी में मुस्लिम महिलाओं से उनकी राय मांगी जाएगी. फिर उनकी राय के आधार पर हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे.'

Amit Shah

हालांकि नरेंद्र मोदी के पूरे भाषण में राम मंदिर मुद्दा का जिक्र कहीं नहीं था, लेकिन सरकार के मुखिया और पार्टी के मुखिया के विचारों का ये अंतर शायद इस बात का नतीजा हो कि पार्टी को कहीं ये लगने लगा है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ आने के बाद 'रिवर्स पोलॉराइजेशन' का फायदा बीजेपी को चुनावों में मिले. क्योंकि दोनों ही पार्टियां मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है.

ऐसे में सेक्युलर वोट, जिसका ताल्लुक मुस्लिम मतदाताओं से है, वही समाजवादी और कांग्रेस गठबंधन की असल धुरी है. हाल ही में फर्स्टपोस्ट ने एक लेख के जरिए इस मुद्दे पर पाठकों का ध्यान खींचा था.

पश्चिम यूपी को साधने की कोशिश

बीजेपी खेमे की असल चिंता पश्चिमी यूपी के जाट बेल्ट को लेकर है. जहां पार्टी से मतदाताओं के मोहभंग होने की आशंका है. और अगर बीजेपी को सूबे की सत्ता पर कब्जा करना है, तो पार्टी इन मतदाताओं को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती है. रिवर्स पोलॉराइजेशन तभी कामयाब होगा जब सपा-कांग्रेस गठबंधन के द्वारा किए गए ध्रुवीकरण के खिलाफ सूबे में माहौल तैयार होगा और इसमें बीजेपी के खिलाफ उमड़ा आक्रोश खत्म हो जाएगा.

पहले से ही ऐसी खबरें आ रही हैं बीजेपी विधायक संगीत सोम 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे से संबंधित एक डॉक्युमेंट्री के वीडियो फुटेज की स्क्रिनिंग कर रहे हैं. मुजफ्फरनगर दंगों का ही ये नतीजा था कि तब 50 लोग मारे गए थे. और करीब 50 हजार लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा था.

टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार के मुताबिक संगीत सोम उन तीन बीजेपी नेताओं में से एक हैं जिन्हें हाल ही में चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी पाया गया था. जबकि दो अन्य नेताओं के नाम थे मुजफ्फरनगर विधायक कपिल देव अग्रवाल और शामली क्षेत्र के प्रतिनिधि सुरेश राना. दोनों नेता 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी भी हैं ।

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रविवार से ही सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब प्रचारित हो रहा है. इस वीडियो में थाना भवन के बीजेपी विधायक सुरेश राणा के तेवर सुनने लायक हैं. राणा को बीजेपी ने अपना उम्मीदवार बनाया है और वो वीडियो में ऐलान कर रहे हैं कि “अगर वो चुनाव जीत जाएंगे तो कैराना, देउबंद और मुरादाबाद में कर्फ्यू लागू कर दिया जाएगा.”

हैरानी तो इस बात को लेकर होती है कि एक तरफ शाह कहते हैं कि 'चुनाव में कोई सांप्रदायिक एजेंडा नहीं होगा.' लेकिन फिर वो ये भी कहते हैं कि मुसलमानों को खुश करने की राजनीति के खिलाफ काफी आक्रोश है. और बीजेपी के कुछ नेता इसी आक्रोश को जता रहे हैं.

इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि 'आम लोगों में गुस्सा है. और ये लोग वोट बैंक और अल्पसंख्यकों को खुश करने की सियासत के खिलाफ आम लोगों की नाराजगी को बता रहे हैं. अगर कोई अल्पसंख्यकों को खुश करने और वोट बैंक की सियासत करने वालों के खिलाफ बोल रहा है तो वो असल में जनता की भावना बता रहा है. लेकिन मैं इस बात से सहमत हूं कि चुनाव में कोई सांप्रदायिक एजेंडा नहीं होना चाहिए. अगर हम कत्लखानों की व्यवस्था को बंद करने की बात करते हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि हम सांप्रदायिक एजेंडे के तहत काम कर रहे हैं. ऐसा हम किसानों के लिए कर रहे हैं.

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शाह ने कहा, 'पश्चिमी यूपी से पलायन को लेकर एक टास्क फोर्स का मतलब सांप्रदायिक कतई नहीं हो सकता है । क्योंकि ये लोगों का संवैधानिक अधिकार है. यूपी में लोगों ने अपनी बेटियों को कॉलेज जाने से रोक दिया है. क्योंकि लड़कियों को तंग किया जाता है. हमने जनता से वादा किया है कि यूपी में लड़कियों की रक्षा के लिए बीजेपी एंटी रोमियो स्कावयड तैयार करेगी. जो सांप्रदायिक नहीं है. लड़कियां अपने ही शहर या गांव में पढ़ सकें ये उनका अधिकार है. लिहाजा सभी चीजों को सांप्रदायिक रंग देना गलत है.'

लगता है कि बीजेपी इस बात को जान चुकी है कि 2014 के चुनावी प्रदर्शन को दोहराने के लिए नोटबंदी और विकास जैसे मुद्दों के सहारे यूपी के सियासी दंगल में दांव नहीं चला जा सकता है. खतरा ये भी है कि कहीं सियासी अखाड़े में ऐसे दांव से पार्टी मुकाबले में पिछड़ ना जाए.

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