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भगवा अंबेडकर: बाबा साहब के कोट का रंग और उनके राम का रूप

दरअसल अंबेडकर की मूर्ति पर चढ़ा भगवा रंग अंबेडकर की जीवन-कथा को बदल देता है

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Apr 14, 2018 10:26 PM IST

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भगवा अंबेडकर: बाबा साहब के कोट का रंग और उनके राम का रूप

दरम्याने कद की एक मूर्ति ! गोल-मटोल चेहरा, चेहरे की गोलाई से कंट्रास्ट बनाता चौकोर चश्मा, चश्मे के ऊपर से खूब लंबी ललाट ! ऊंची ललाट, चौकोर चश्मे और उम्र के अधेड़पन का पता देते बेहद कम केशों के साथ मूर्ति के हाथ में मौजूद किताब को मिलाकर देखें तो एक अर्थ खुलता है कि यह मूरत किसी विद्वान व्यक्ति है !

मूर्ति की कुछ और बातें ध्यान खींचती हैं. जैसे, एक बेहद हल्की हंसी- इतनी हल्की कि होठों के हद में ही कैद हो जाए.या फिर, मूर्ति के गले के नीचे से कमर तक पहुंचता बंद गले का कोट जिसका रंग भगवा है. मूर्ति के गले में गेंदा के फूलों की मोटी-मोटी मालाएं पड़ी हैं और इन मालाओं पर इन्हें पहनाने वालों के हाथ हैं ! ये दो लोग चेहरे पर मुस्कुराहट लिए मूर्ति के साथ फोटो खिंचवाने के गरज से कैमरे के सामने खड़े हैं.

जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं

आप कह सकते हैं- मूर्ति किसी विद्वान व्यक्ति की है, लोग उसे पूजा के काबिल मानते हैं और यह भी कि उस विद्वान व्यक्ति की पूजा में खुद को शामिल दिखाने के लिए कुछ जन बहुत बेचैन हैं- इतने बेचैन कि चाहते हैं उनकी इस मूर्तिपूजा की फोटो खींच जाए, किसी अखबार में छप जाए !

ऊपर की तफ्सील के आधार पर आप ये सारे अनुमान लगा सकते हैं. लेकिन क्या एक पल के लिए भी आपको लगा कि यहां जिस विद्वान व्यक्ति की आदमकद मूर्ति की बात हो रही है वह कोई और नहीं बल्कि बाबा साहब भीमराव आंबेडकर हैं ?

bhagwa bheemrao ambedkar

नहीं आप ऐसा नहीं कह सकते. इसकी वजह है- किसी मूर्ति को पहचानना उस मूर्ति से जुड़ी कथा के सहारे होता है. कथा में आए ब्यौरे के सहारे ही मूर्ति गढ़ी जाती है, उसमें विश्वसनीयता आती है कि वह अमुक व्यक्ति की मूर्ति है. राम की कथा में अगर यह आता है कि वे धनुर्धारी थे तो फिर धनुषधारी राम की तस्वीर बनेगी. कृष्ण की कथा में अगर आता है कि उन्हें मोर-मुकुट और मुरली पसंद थे तो फिर कृष्ण की मूर्ति भी वैसी ही बनेगी.

बाबा साहब की जीवनियों में यह तो आता है कि वे विद्वान थे- प्रसिद्ध लिंकन इन्न से लॉ की डिग्री, पीएच.डी एक डिग्री अमेरिका से तो दूसरी इंग्लैंड से ही. धर्म और जाति की व्याख्या करती कई किताबों के लेखक और इन सबसे भी कहीं अहम- भारत के संविधान के रचयिता ! बाबा साहब की जीवनी में यह भी आता है कि वे कोर्ट-पैंट-टाई वाला अंग्रेजी सूट पहनते थे और यह भी कि उनके जीवन के आखिर के तीन दशकों में इस सूट का रंग नीला ही रहा. हां, यह पढ़ने को कहीं नहीं मिला कि ‘बाबासाहब’ ने कभी भगवा रंग का कोट पहना.

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लेकिन फर्स्टपोस्ट हिन्दी का यह समाचार तो कह रहा है कि यूपी के बदायूं जिले के दुगरैया में आंबेडकर की मूर्ति का रंग भगवा है और भगवा कोट पहने इस आंबेडकर से वहां के लोगों को आश्चर्य तो है लेकिन ऐतराज नहीं. तो फिर कैसे व्याख्या करें आंबेडकर की मूर्ति को भगवा रंग से रंगने में छुपी महीन सियासत की ?

नव-हिन्दू की राजनीति में भगवा बनाम नीला

दरअसल अंबेडकर की मूर्ति पर चढ़ा भगवा रंग अंबेडकर की जीवन-कथा को बदल देता है. आप नीले रंग का कोट पहने अंबेडकर के बारे में मान सकते हैं कि उनके हाथ में ‘भारत का संविधान’ नाम की ही किताब होगी लेकिन भगवा कोट पहने आंबेडकर के हाथ में ‘भारत का संविधान’ नाम की किताब की कल्पना मुश्किल है. आप भगवा रंग में वेद, उपनिषद, पुराण और गीता को लपेट सकते हैं लेकिन भारतीय संविधान को नहीं. रंग कोई भी हो अगर वह एकलौता है तो फिर इस रंग की भारतीय संविधान से संगति नहीं.

राष्ट्रीय जीवन के सपनों की उस पवित्र पोथी को लपटने के लिए एक से ज्यादा रंग चाहिए और यह काम हमारा ‘तिरंगा’ कर सकता है. याद रहे कि तिरंगे में सिर्फ तीन रंग नहीं बल्कि एक चौथा रंग भी होता है. उजली पट्टी पर बने चक्र का रंग तिरंगे में नीला होता है. रंग एक से ज्यादा, झंडा मगर एक ! सो, तिरंगे से वही ध्वनि निकलती है जो भारत राष्ट्र के संविधान से. संविधान कहता है समाज और संस्कृति से चाहे कोई किसी भी रंग का हो, मुल्क उसका एक है और उसके साथ कानून का बरताव भी एक. यह संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है और जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि के भेद से परे हर नागरिक को कानून के आगे बराबरी का अधिकार भी- सबको एक बराबर कर देता है.

समाज का जो रंग व्यक्ति के बराबरी के सिद्धांत को नहीं मानता- आंबेडकर को वो रंग कभी स्वीकार नहीं हो सकता था. याद कीजिए, बंगाल का प्रसिद्ध नील-विद्रोह या फिर नीलहे अंग्रेजों के खिलाफ चंपारण के किसानों का आंदोलन. अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारत में विद्रोह का रंग नीला है. और बहुत पीछे लौटें, उस वक्त में जब जाति-व्यवस्था को चुनौती देने वाला बौद्ध-धर्म भारत की जमीन से बाहर फैल रहा था तो दिखेगा कि उसमें भी तरजीह नीले रंग को दी गई. बौद्ध-धर्म की वज्रयानी(तिब्बती) शाखा में बुद्ध का एक रूप ‘अक्षोभयबोधिसत्व’ कहलाता है. इस बुद्ध का रंग नीला है और नीला रंग यहां विवेक की उस ऊंचाई को हासिल करने का प्रतीक है जहां पहुंचकर सब अपने लगते हैं- कोई पराया नहीं रह जाता. बहुत सोच-समझकर चुना था अंबेडकर ने बौद्ध-धर्म, अपनी पार्टी का झंडा या फिर अपने सूट का नीला रंग.

bhimrao ambedkar

अंबेडकर के संदेश से भगवा रंग बेमेल है 

अंबेडकर का पूरा जीवन उन ग्रंथों का अनौचित्य साबित करने का संघर्ष था जिन्हें हिंदू-मानस अपनी कल्पना में भगवा रंग के कपड़े में लपेटकर संजोता आया है. बाबा साहब के लेखन और भाषण के संकलन के सत्रहवें खंड में आता है: एक दफे उन्होंने कहा था कि उन्होंने महाभारत और गीता जैसे ग्रंथ बचपन में पढ़े थे .फिर उनकी नजर गौतम बुद्ध के जीवन पर लिखी एक किताब पर पड़ी. इस किताब ने उनके मन पर गहरा असर छोड़ा और वे तभी से गौतम बुद्ध के अनुयायी बन गए.

भगवा ध्वज थामने वाली जो राजनीति गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ बनाना चाहती है उसके बारे में आंबेडकर का कहना था कि यह कोई धर्मग्रंथ नहीं बल्कि ‘दर्शन के आधार पर धार्मिक रुढ़ियों की हिफाजत करने वाली किताब’ है और यह किताब चार चार वर्णों की व्यवस्था की रक्षा में दर्शन की जमीन पर खड़े होकर तर्क देती है. अंबेडकर के मुताबिक गीता में वर्ण-व्यवस्था को ईश्वर की बनाई व्यवस्था साबित किया गया है और आंबेडकर की अपनी खास लड़ाई इस ‘चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था’ से ही थी.

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बीसवीं सदी के जो नव-हिन्दू चार वर्णों की व्यवस्था को जाति-व्यवस्था से श्रेष्ठ बता रहे थे उनको लक्ष्य करके आंबेडकर ने कहा था इनका आदर्श ‘पूरे समाज का चार वर्णों में विभाजन है ना कि चार हजार जातियों में जैसा कि अभी पूरे भारत में है. अपने इस सिद्धांत को और आकर्षक बनाने के लिए तथा अपने विरोधियों को हतप्रभ करने के लिए चातुर्वर्ण्य के ये प्रचारक बहुत सोच-समझकर बताते हैं कि उनका चातुर्वर्ण्य जन्म के आधार पर नहीं बल्कि गुण के आधार पर है. यहां पर पहले ही मैं बता देना चाहता हूं कि भले ही यह चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था गुण के आधार पर हो लेकिन यह आदर्श मेरे विचारों से मेल नहीं खाता.’

बेशक अंबेडकर ने माना है कि ‘जाति का सिद्धांत वर्ण के सिद्धांत से मूल रुप से भिन्न है, भिन्न ही नहीं बल्कि परस्पर विरोधी’ है लेकिन साथ ही उन्होंने चातुर्वर्ण्य को सामाजिक समानता का आदर्श बताने वालों से सवाल पूछा कि ‘अगर कोई व्यक्ति गुणों के आधार पर नहीं बल्कि जाति के आधार पर ऊंची हैसियत पा जाये तो आप उस जगह से हटने के लिए उसे कैसे बाध्य करेंगे? आप लोगों को इस बात के लिए कैसे बाध्य करेंगे कि वे उस व्यक्ति को जिसकी भले ही जन्म के आधार पर हैसियत निम्न स्तर की रही हो, उसे उसके गुण के आधार पर प्रतिष्ठा प्रदान करें? अंबेडकर का ये कथन उनके प्रसिद्ध लाहौर वाले प्रस्तावित ‘भाषण’ में आता है लेकिन यहां आप चाहें तो इसे आंबेडकर का गुरु गोलवरकर को जबाव भी मान सकते हैं. आरएसएस के सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने भी आंबेडकर के सामने चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की श्रेष्ठता का तर्क रखा था.

गांधी का उदार हिन्दू-धर्म और डा. अंबेडकर 

नव-हिंदुओं की चातुर्वर्ण्य की चतुराई पर ही नहीं अंबेडकर ने महात्मा गाधी के हिन्दू-धर्म की उस उदार व्याख्या पर भी सवाल उठाये जो कहती है- ‘धर्म को जाति या वर्ण के सहारे नहीं बल्कि व्यक्ति के निजी आचरण के सहारे देखा जाना चाहिए.’

Mahatma Gandhi

गांधी ने जाति की संस्था के खिलाफ अंबेडकर के भाषण (लाहौर, जात-पात तोड़क मंडल) की मुख्य बातों के खिलाफ कुछ तर्क दिए थे. इनमें एक था: ‘हिंदू धर्म का सार है कि सत्य ही ईश्वर और अहिंसा मानव-परिवारों का कानून है और किसी धर्म को उसके सबसे बुरे उदाहरणों से नहीं बल्कि सबसे अच्छे उदाहरणों से परखा जाना चाहिए.’ गांधी ने सवाल किया कि “क्या चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तिरुवल्लूर, रामकृष्ण परमहंस, राजा राममोहन राय, महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद और अन्य विद्वानों द्वारा सिखाया धर्म पूरी तरह से गलत है, जैसा कि डा. अंबेडकर ने अपने भाषण में दिखाया है ?

अंबेडकर ने गांधी के इस प्रतिवाद के जवाब में कहा: महात्मा ने प्रश्न उठाया है कि ‘किसी भी धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे परिणाम से परखना होगा’. मैं इसके प्रत्येक शब्द से सहमत हूं लेकिन मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया कि महात्मा इससे क्या सिद्ध करना चाहते हैं. यह सच है कि धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं बल्कि सबसे अच्छे से परखना चाहिए. लेकिन क्या मामला यहीं समाप्त हो जाता है? मै कहता हूं नहीं. प्रश्न अब भी उठता है कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों.'

आगे महात्मा गांधी के तर्क के बुनियादी दोष पर अंगुली रखते हुए अंबेडकर लिखते हैं- 'महात्मा ने तर्क दिया है कि संतों के उदाहरण को अपनाए तो हिंदू धर्म सहनीय हो जाएगा, महात्मा का ये तर्क भी अन्य कारण से गलत सिद्ध होता है. महात्मा सुझाव देना चाहते हैं कि ढांचे में मूलभूत परिवर्तन किए बिना हिंदू समाज सहनीय और खुशहाल हो सकता है.…जो लोग इस बात पर निर्भर हैं कि वे बड़ी जाति के हिंदू को एक अच्छा इंसान बनाएंगे तथा व्यक्तिगत चरित्र सुधारेंगे, वे मेरे विचार से अपनी शक्ति बरबाद कर रहे हैं और एक भ्रम पाले हुए हैं. क्या व्यक्तिगत चरित्र शस्त्र बनाने वाले को एक अच्छा आदमी बना सकता है, अर्थात जो आदमी गोला बेचता है, वह ऐसा गोला बनाए जो न फटे और गैस जहर ना फैलाएं? …सच बात तो यह है कि हिंदू अपनी जाति के बाहर वाले व्यक्ति को पराया मानता है.. कहने का मतलब है कि बेहतर या बदतर हिंदू मिल सकता है लेकिन एक अच्छा हिंदू नहीं मिल सकता. ऐसा इसलिए नहीं कि उसके व्यक्तिगत चरित्र में कोई कमी है. असल में, अपने साथियों के साथ उसके संबंध का आधार (यानि जाति-व्यवस्था) ही गलत है.'

और अंत में....

दरअसल आप ‘हिंदू’ होकर अंबेडकर से बहस में नहीं जीत सकते. चाहे आप व्यक्ति के गुणों को तरजीह देने वाली चार वर्णों की व्यवस्था के हिमायती नव-हिंदू हों या जाति-भेद को हिन्दू धर्म का जरुरी हिस्सा मानने वाले संनातनी हिंदू अथवा गांधी की तरह सत्य-अहिंसा के व्यक्तिगत आचरण को प्रमाण मानने वाले वैष्णवी निर्गुण धारा के हिंदू — आंबेडकर इन तीनों को गैर-बराबरी वाली समाज के पैरोकार के रुप में खारिज करते हैं.

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और, हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित राजनीति का संकट भी यही है- वह ‘आंबेडकर’ को तो अपनी धारा में शामिल करना चाहती है लेकिन उनकी हिंदुत्व की आलोचना को मंजूर करने से उसे परहेज है. दुविधा की दशा में कभी वह अंबेडकर के कोट का रंग भगवा साबित करना चाहती है तो कभी उनके नाम में ‘रामजी’ जोड़ना जरुरी समझती है. ये दोनों कोशिशें अंबेडकर के जीवन-संघर्ष की कथा के संदेश को बदलने की कोशिश है.

अंबेडकर के नाम में ‘रामजी’ जोड़ने की यूपी सरकार की दलील एकदम दुरुस्त है. बेशक, अंबेडकर का पूरा नाम भीमराव रामजी अंबेडकर है और ऐसा उनकी लिखाई में मौजूद है. यह भी सही है कि महाराष्ट्र में पिता का नाम बच्चे के नाम के साथ जुड़ता है और इस तर्क से पिता रामजी मालोजी सकपाल का नाम बी.आर. अंबेडकर के नाम में जुड़ना ही चाहिए. लेकिन क्या कहानी बस यहीं खत्म हो जाती है ?

नहीं, यहां ठहरकर पूछना होगा कि पिता रामजी सकपाल खुद ‘राम’ का क्या अर्थ समझते थे. अंबेडकर के जीवनी-लेखक बताते हैं, अंबेडकर के पिता कबीरपंथी थे और कबीर के ‘राम’ कोई अयोध्यावासी ‘दशरथनंदन राम’ नही. कबीर ने तो साफ कहा कि- ‘निरगुण राम निरगुण राम जपहु रे भाई- चारि वेद जाके सुमृत पुरांना,नौ व्याकरणां मरण ना जाना.’दशरथनंदन राम के बारे में अंबेडकर ने नोट किया है कि वह ‘रामराज्य तो चातुर्वर्ण्य व्यवस्था पर आधारित था और इसी कारण राम ने शंबूक (वेदपाठी शूद्र) का वध किया था.’

यह बेवजह नहीं कि मृत्यु (1956) से चंद घड़ी पहले अंबेडकर कबीर का ही भजन गा रहे थे- ‘चल कबीर तेरा भवसागर डेरा.’ अंबेडकर के ‘रामजी’ का रंग खोजना हो तो कबीर से पूछिए जो कहते थे- ‘मन ना रंगाये रंगाय जोगी कपड़ा!

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