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अंबेडकर जयंती: राहुल गांधी को राजनीति करने से पहले बाबा साहेब को पढ़ना चाहिए

बाबा साहेब ने जो आदर्श लोगों के सामने रखे, अगर उन्‍हें हम नजदीक से देखें तो साफ पता चल जाएगा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किस तरह की नकली दलित राजनीति करते हुए झूठ की पालकी ढो रहे हैं

Updated On: Apr 14, 2018 09:01 PM IST

Tuhin A Sinha

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अंबेडकर जयंती: राहुल गांधी को राजनीति करने से पहले बाबा साहेब को पढ़ना चाहिए

दूरदर्शी और राष्ट्रवादी प्रतीक बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की 127 वीं जयंती के मौके पर उन्‍हें एक फिर से देखना समझना जरूरी है. बाबा साहेब ने जो आदर्श लोगों के सामने रखे, अगर उन्‍हें हम नजदीक से देखें तो साफ पता चल जाएगा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किस तरह की नकली दलित राजनीति करते हुए झूठ की पालकी ढो रहे हैं.

तथ्य यह है कि बाबा साहेब हिंदू धर्म की आलोचना करते थे, विशेष रूप से जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के चलन की. 1930 के दशक में उन्होंने एक और धर्म अपनाने का विचार किया. हालांकि, वे इस्लाम की भी आलोचना करते थे. उन्होंने महसूस किया कि वो एक ऐसा सिस्‍टम है जिसके अनुयायियों की पहली निष्ठा धर्म के लिए होती है, न कि देश के लिए.

हिंदू धर्म से निराश होने के बाद भी अंबेडकर की देशभक्ति कभी प्रभावित नहीं हुई. इसके बजाए, वह लगातार उन कारकों को मजबूत करने में लगे रहे जो भारत को एक राष्‍ट्र बनाते हैं. हालांकि उन्‍होंने भारतीय राष्‍ट्रवाद के खतरे को भी लोगों के सामने रखा.

बाबा साहेब द्वारा जमकर अनुच्छेद 370 के विरोध को और जातिविहीन समाज की वकालत करने को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए. उन्होंने समान रूप से विरोध के 'असंवैधानिक' तरीकों के खिलाफ चेतावनी दी थी. कुछ ऐसे तरीके, जिन्‍हें अपनाने में जिग्नेश मेवाणी जैसे नेता किसी भी तरह की शर्म नहीं करते. अंबेडकर ने 1956 में अपनी मृत्यु से तकरीबन दो महीने पहले बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला राष्ट्रीय हित में किया, जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता.

रोहित वेमुला की मौत पर राहुल की राजनीति

बतौर एक पार्टी के रूप में बीजेपी जातिहीन समाज बनाने का प्रयास कर रही है. वास्तव में, यह बीजेपी के पक्ष में हिंदू वोटों का एकीकरण है, जिसकी वजह राहुल गांधी को रोहित वेमुला की मौत के बाद गिद्ध राजनीति के खतरनाक रूप पर जाना पड़ा.

यह सवाल अक्सर मुझे व्‍याकुल कर देता है, जब मुझसे पूछा जाता है कि पिछले चार सालों में बीजेपी ने दलित मुक्ति के लिए क्या किया? बीजेपी एक ऐसी पार्टी है जो जातिविहीन समाज के अंबेडकर के सपने को हकीकत में उतारने का काम कर रही है और हमारी एक भी नीति ऐसी नहीं है जो जाति या पंथ को बढ़ावा देती हो.

हालांकि, अगर आप डेटा खंगालेगे, तो साफ पता चल जाएगा कि जनधन योजना, पीएम उज्ज्वला योजना या ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के लाभार्थियों का बड़ा तबका अनुसूचित जाति और दलित परिवारों का ही हैं.

एक पार्टी जिसने न तो बाबा साहेब और न ही बाबू जगजीवन राम को वो हक दिया जिसके वे हकदार थे. कांग्रेस दलित मुक्ति की बात तो करती है लेकिन उसकी ये बात महज दिखावा है. उसकी दलित मसलों पर दावेदारी केवल हिंदू समाज को तोड़ने के कुत्सित डिजाइन को छिपाने के लिए है ताकि वो राष्‍ट्र पर शासन की बागडोर थामे रह सके.

जो लोग 2018 में जाति की राजनीति का आह्वान करते हैं, उन्हें पता नहीं है कि अंबेडकर किसके लिए खड़े हुए थे. राहुल गांधी की अगुवाई वाले इन धोखेबाजों को चलता करना चाहिए.

(लेखक युवा बीजेपी नेता हैं, यह आर्टिकल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए क्लिक करें)

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