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एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अमरनाथ हमला और विरोध का 'बजरंगी' तरीका

अमरनाथ यात्रियों पर हमला देश की साझी विरासत पर हमला है और इस विरासत को कोई भी कट्टरपंथी पसंद नहीं करता

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Jul 12, 2017 04:08 PM IST

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एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, अमरनाथ हमला और विरोध का 'बजरंगी' तरीका

अमरनाथ यात्रियों पर जो हमला हुआ वो हर तरह से निंदनीय है और मानवता के खिलाफ है. इस घटना का विरोध होना चाहिए और जो भी लोग इस हमले में शामिल में हैं और उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए.लेकिन इस घटना का जिस तरह से का रंग देने की कोशिश हो रही है वह कहीं से भी सही नहीं है.

अमरनाथ यात्रियों पर हमले को हिंदू बनाम मुसलमान बनाने की कोशिश की जा रही है.  इसकी शुरुआत मंगलवार को विश्व हिंदू परिषद् के नेता प्रवीण तोगड़िया ने ही कर दी थी जब उन्होंने यह कहा कि कश्मीरी मुसलमानों का बहिष्कार करना चाहिए और उन्हें फौज की नौकरियों से निकाल देना चाहिए.

बुधवार को यह मानसिकता अपने चरम पर तब दिखी जब हरियाणा के हिसार में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने एक मस्जिद के बाहर एक मुसलमान व्यापारी को पीट दिया. बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पहले उस व्यक्ति को ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ कहने के लिए कहा और फिर तमाचा जड़ दिया. (पहले इस व्यापारी को मस्जिद का इमाम कहा जा रहा था.)

आखिर बजरंग दल और तोगड़िया को सलीम क्यों नहीं दिखता?

amarnath terrot attack saleem driver

बस ड्राइवर सलीम

हो सकता है कि अमरनाथ हमले में शामिल आतंकी और इसका मास्टरमाइंड अबू इस्माइल मुसलमान है लेकिन इसका दूसरा भी पहलू यह है कि वर्षों से कश्मीरी मुसलमान अमरनाथ यात्रियों की तरह-तरह से मदद करते आए हैं. जिस बस पर हमला हुआ उस बस को बहादुरी से निकाल लाने वाला ड्राइवर भी मुसलमान ही था. अगर ड्राइवर सलीम ने जान पर खेल कर बस को नहीं निकाला होता तो हताहतों की संख्या और भी बढ़ सकती थी. कश्मीरी मुसलमानों ने भी अमरनाथ यात्रियों पर हुए इस हमले के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया है.

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आखिर यह कौन सी मानसिकता है जो बजरंग दल और तोगड़िया जैसे लोगों को सलीम जैसे लोग मुसलमानों  के प्रतिनिधि नहीं लगते बल्कि अबू इस्माइल जैसे लोग मुसलमानों के प्रतिनिधि लगते है. ऐसे लोगों को जब भी आप मुसलमानों की देशभक्ति के बारे में बताएं तो वो इसे अपवाद का नाम देते हैं. जबकि इनसे पलटकर यह सवाल किया जाना चाहिए कि क्या किसी भी धर्म में जुड़े आतंकियों को अपवाद नहीं कहा जा सकता?

क्या मालेगांव और मक्का मस्जिद बम विस्फोट में शामिल हिंदू अतिवादी संगठनों की वजह से पूरा हिंदू समुदाय आतंकी हो गया? इस तरह के कई और उदाहरण दिए जा सकते हैं. आज भी पंजाब के कई घरों और गुरुद्वारों में खालिस्तानी आतंकवादी जनरल भिंडरावाले की तस्वीरें लगी हुई हैं तो क्या हम पूरे सिख समुदाय को आतंकवादी मान लें?

क्या राष्ट्रभक्ति के नफरत की भावना जरूरी है?

Amarnath yatra

आखिर बार-बार ‘भारत माता की जय’ या ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करवा कर ये किसकी राष्ट्रभक्ति की परीक्षा ले रहे हैं. वैसे यह भी बहुत दिलचस्प है इस बार इसी तरह के स्वघोषित राष्ट्रवादी उद्धव ठाकरे ने ही ऐसे लोगों को करारा जवाब दिया है. ठाकरे ने कहा कि फर्जी गौरक्षकों को आतंकियों के लड़ने के लिए भेज देना चाहिए. ठाकरे ने यह भी कहा कि क्या इन गौरक्षकों में इतना दम है कि वे हथियारबंद आतंकियों के बैग में बीफ ढूंढ़ने की हिमाकत करें.

ठाकरे के इस बयान के तर्ज पर कहा जा सकता है कि क्या अगर हिसार की उस मस्जिद के अंदर से उस निहत्थे मुसलमान व्यापारी की जगह अगर कोई हथियारबंद आतंकी निकला होता तो क्या वे उसे ‘भारत माता की जय’ या ‘वंदे मातरम्’ बोलने के लिए कहते?

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जितने दोषी बेगुनाह अमरनाथ यात्रियों पर हमला करने वाले हैं उतने ही दोषी हिसार की मस्जिद के बाहर बेगुनाह मुसलमान व्यापारी पर हमला करने वाले भी. कोई यह भी कह सकता है कि अमरनाथ यात्रियों पर हमले में यात्रियों की जान गई है और हिसार में मुसलमान व्यापारी को सिर्फ थप्पड़ मारा गया है. लेकिन दोनों घटनाओं में एक तरह की नफरत की भावना काम कर रही है.

नफरत के नुमांइदे इस बात को जानबूझकर भूल जाते हैं कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुसलमान बकरवाल यानी चरवाहे ने की थी, जिसका परिवार आज भी अमरनाथ गुफा की देखरेख करता है.

दरअसल अमरनाथ यात्रियों पर हमला देश की साझी विरासत पर हमला है और इस विरासत को कोई भी कट्टरपंथी पसंद नहीं करता. शायद यही वजह है कि इसे हिंदू बनाम मुसलमान का रूप दिया जा रहा है.

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