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अमर चित्रकथा का नया पन्ना: ‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’

भारतीय राजनीति में अमर सिंह को जोड़-तोड़, दलाली, सेटिंगबाज़ जैसे कितने ही ख़िताब मिले

Mukesh Singh Updated On: Feb 23, 2017 02:27 PM IST

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अमर चित्रकथा का नया पन्ना: ‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’

उत्तर प्रदेश का चुनाव परवान पर है. फिर भी समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने ठान लिया कि वो अपने अति-चहेते ‘नेताजी’ के घर में आग लगाकर ही चैन लेंगे.

अमर सिंह की वजह से सैफई घराने में शुरू हुई खटपट का इतिहास छह महीने से ज्यादा पुराना है. लेकिन अब अमर सिंह ने कसम खा ली है कि उनकी बाकी बची-खुची ज़िन्दगी का अंजाम जो भी हो, वो नेताजी के आशियाने को लाक्षागृह में बदलकर दिखाएंगे.

‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’ की तर्ज पर, अमर सिंह अब फिर से समाजवादियों के लिए फिदायीन दस्ते के रूप में काम करेंगे. अपने जिन बयानों की वजह से अमर सिंह अभी अचानक सुर्खियों में आए हैं, उसका मकसद साफ तौर पर बीजेपी को फायदा पहुंचाने का है. हालांकि, अमर सिंह जैसा व्यक्तित्व बीजेपी के लिए भी भस्मासुर ही साबित होगा.

अपनी सियासी अहमियत बताने के लिए अमर सिंह ने सैफई परिवार के घमासान को ऐसा ‘प्री-प्लान्ड ड्रामा’ यानी सुनियोजित नौटंकी बताया जिसके असली शिल्पकार ‘स्क्रिप्टराइटर’ यानी उनके पूर्व आराध्य नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव ही हैं. उन्होंने कहा कि 'मुलायम सिंह और अखिलेश एक हैं और एक ही रहेंगे. मुझे बाद में महसूस हुआ कि मेरा इस्तेमाल किया जा रहा है.'

मुलायम सिंह ने सारी नौटंकी सत्ता विरोधी लहर और कानून-व्यवस्था की दशा से चरमराई अखिलेश की इमेज को सुधारने के लिए किया. क्योंकि मुलायम को साफ पता था कि विधानसभा चुनाव में उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे लेकर वो जनता के सामने जाएं इसीलिए सहानुभूति बटोरने के लिए सारी नौटंकी की गयी. मुलायम को अपने बेटे के हाथों हारना पसंद है और साइकिल, बेटा और सपा उनकी कमजोरियां हैं.'

अमर सिंह को ऐसा ‘ज्ञान’ देने की प्रेरणा उसी बीजेपी से मिली जिसने बिहार में अपनी मिट्टी-पलीद होता देख पप्पू यादव, जीतन राम मांझी, असदुद्दीन ओवैसी को वोट-कटुआ लोगों की तरह इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई थी.

यहां तक कि मुलायम सिंह यादव को भी धमकाया गया था कि वो नोएडा अथॉरिटी के यादव सिंह कांड और अपनी आय से अधिक संपत्ति के मामलों में निपटा दिए जाएंगे. लिहाजा, ऐन चुनाव के वक्त नेताजी ने उस महागठबंधन से अपना नाता तोड़ लिया जिसे बिहार में देने के लिए उनके पास अपने नाम के सिवाय और कुछ नहीं था. हूबहू वही पैंतरा अब अमर सिंह के रूप में आजमाया जा रहा है, ताकि उत्तर प्रदेश में बाकी बचे तीन दौर के मतदान में बीजेपी की डूबती नाव को कुछ सहारा दिलाया जा सके.

अफसोस कि बीजेपी को अब अमर सिंह से भी संजीवनी नहीं मिल सकती. क्योंकि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के आला नेताओं के बयानों में दिनों-दिन बढ़ रही बौखलाहट ये बताने के लिए काफी है कि हवा का रुख उनकी ओर नहीं है.

‘अमर चित्रकथा’ असंख्य बयानों से ही बनी है.

जरा नागपुर में दिया गया 14 अप्रैल 2011 का बयान याद कीजिए कि ‘मर जाऊंगा पर समाजवादी पार्टी में वापस नहीं जाऊंगा. सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं.’

15 जनवरी 2011 को आगरा में अमर सिंह ने कहा था, 'मुलायम सिंह की सूरत देखने से पहले मैं पोटेशियम साइनाइड खाकर जान दे दूंगा. मैंने दलाली करके मुलायम की सरकार बनवाई, फिर भी उन्होंने अपने लोगों से मुझे बेशर्म कहलवाया.'

 

भदोही, 5 दिसम्बर 2010: 'मैं बोल दूंगा तो मुलायम सिंह मुश्किल में पड़ जाएंगे. मेरा मुंह खुला तो सपा के कई नेता जेल पहुंच जाएंगे और मुलायम सिंह को जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी.'

लखनऊ, 25 जनवरी 2012: 'मैं अब मुलायम सिंह यादव या समाजवादी पार्टी का नौकर नहीं हूं. मुझे उनके तमाम राज मालूम हैं, जिन्हें न तो मैंने उजागर किया है, न कभी करूंगा.

लखनऊ, 21 फरवरी 2012: 'यूपी के भ्रष्टाचार में मुख्यमंत्री मायावती और मुलायम सिंह यादव दोनों साझीदार हैं.  मुलायम सिंह एक पहिए की साइकिल चलाने वाले जोकर हैं.

लखनऊ, 11 मई 2010: 'मैं मुलायम सिंह का दर्जी और कूड़ेदान रहा हूं. उनकी गलत-सलत नीतियों को नैतिकता की पोशाक बनाकर की तरह सिलकर संवारने का मैं 14 साल का अपराधी हूं. लेकिन दल की गलतियों का श्रेय लेने वाला कूड़ेदान अब मैं नहीं रहा.'

आगरा, 12 अप्रैल 2012: 'मुलायम सिंह ने बलात्कार पर बयान दिया है कि लड़के हैं, मन मचल जाता है. ऐसा लगता है कि मुलायम सिंह का वश चले तो वो रेप को भी जायज़ कर दें.'

दिल्ली, 5 अगस्त 2013: 'मुलायम सिंह यादव धृतराष्ट्र हो गए हैं. वे भूल जाते हैं कि वे राजा नहीं, जनता के नौकर हैं.'

भारतीय राजनीति में अमर सिंह ने तरह-तरह के मुकाम देखे. उन्हें जोड़-तोड़, दलाली, सेटिंगबाज जैसे कितने ही खिताब मिले और मजे की बात ये रही कि इन सभी के जन्मदाता खुद उनकी ही पार्टी के नेता रहे. दूसरी ओर, भारतीय राजनीति में अमर सिंह की उपलब्धि सिर्फ तरह-तरह की बयानबाजी ही रही है. वो सिर्फ उसके सगे रहते हैं, जिसकी गोदी में बैठे होते हैं.

नरेंद्र मोदी की तरह अमर सिंह को भी अच्छी तरह से मालूम रहता है कि उनके किस तरह के बयान को मीडिया और राजनीति किस तरह से देखेगी. ये कोई मामूली कौशल नहीं है.

देश के सियासी कैनवास पर सिर्फ अपनी बयानबाजियों की बदौलत ही अमर सिंह ने अपनी पहचान बनाई. इतने दिन वो समाजवादी पार्टी से बाहर रहे उतने दिन उन्हें कोई पूछने वाला नहीं था, मीडिया भी नहीं.

क्यों? क्योंकि अमर सिंह मूलतः परजीवी (Parasite) हैं. बैक्टीरिया और वायरस की तरह हैं, जिसे पनपने के लिए परकाया (अन्य शरीर) की जरूरत हमेशा रहती है.

फिलहाल, अमर सिंह की रणनीति साहिर लुधियानवी के एक मशहूर गीत से बखूबी बयां होती है कि 'तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी.'

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