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बिहार एनडीए में ऑल इज नॉट वेल, जेडीयू-आरएलएसपी ढूंढ रहे हैं अलग रास्ते?

नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी के बाद से ही उपेंद्र कुशवाहा नाखुश हैं क्योंकि नीतीश कुमार के आने से पहले एनडीए के बड़े सहयोगी वही माने जाते रहे हैं

Syed Mojiz Imam Updated On: Jun 09, 2018 06:36 PM IST

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बिहार एनडीए में ऑल इज नॉट वेल, जेडीयू-आरएलएसपी ढूंढ रहे हैं अलग रास्ते?

बिहार में चुनाव से पहले एनडीए का कुनबा दुरुस्त करने का प्रयास चल रहा है. इस क्रम में गुरुवार को बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय ने डिनर का आयोजन किया था, जिसमें एनडीए घटक दलों के सभी नेता भोज में शरीक हुए. लेकिन आरएलएसपी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने इस भोज में शिरकत करने से परहेज किया.

केंद्र में मानव संसाधन राज्य मंत्री की पार्टी की तरफ से औपचारिक बयान में कहा गया कि अचानक काम पड़ने की वजह से भोज में शामिल नहीं हो पाए हैं. लेकिन सवाल न जाने पर जरूर खड़ा हो रहा है. पार्टी के लोगों का कहना है कि एनडीए मजबूत है इसलिए आरएलएसपी की तरफ से कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि और पार्टी के सांसद इस भोज बैठक में थे. लेकिन जवाब जितना सरल दिया जा रहा है. उतना है नहीं इसमें कई पेंच हैं. दरअसल नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी के बाद से ही उपेंद्र कुशवाहा नाखुश हैं क्योंकि नीतीश कुमार के आने से पहले एनडीए के बड़े सहयोगी वही माने जाते रहे हैं. हालांकि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए को दोबारा सत्ता में लाने की बैठक का मकसद था. लेकिन कुशवाहा के ना आने से एनडीए की मजबूती पर सवाल उठ रहा है.

आरएलएसपी नाखुश, नीतीश के चेहरे पर आपत्ति

2014 के आम चुनाव और बाद के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के साथ मजबूती से खड़े थे. लेकिन नीतीश कुमार के आने से उनकी महत्ता घटी है. बीजेपी आलाकमान भी ज्यादा भाव नहीं दे रहा है. बिना आरएलएसपी के साथ बातचीत किए जेडीयू ने कहा कि नीतीश कुमार की अगुवाई में ही एनडीए बिहार में चुनाव लड़ेगी. जिस पर आरएलएसपी के कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि ने कड़ी आपत्ति जताई है. नागमणि का कहना है कि कुशवाहा यादव के बाद सबसे बड़ी जाति है. जिसकी दस प्रतिशत आबादी है. ऐसे में नीतीश को लीडर क्यों मान लिया जाए?

मकसद ये है कि पार्टी चाहती है कि उपेंद्र कुशवाहा को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाए. हालांकि बिग ब्रदर की भूमिका में बीजेपी अभी नीतीश कुमार की कीमत पर कोई समझौता करने के मूड में नहीं है. नाराज कुशवाहा आरजेडी पर डोरे डाल रहे हैं. लालू प्रसाद जब एम्स में भर्ती थे तो कुशवाहा उनसे मिलने गए थे. बीजेपी के अंदर हलचल मची रही. लेकिन पार्टी खामोश रही, जबकि राहुल गांधी के लालू से मिलने के बाद बीजेपी हमलावर हो गयी थी.

नीतीश कुमार से है अदावत

लालू प्रसाद से अलग होने के बाद नीतीश कुमार की उपेंद्र कुशवाहा ने काफी मदद की थी. एक किस्सा है 90 के दशक का कि उपेंद्र कुशवाहा ने रैली की थी जिसमें नीतीश कुमार को आमंत्रित किया था. लेकिन लालू के सामने नीतीश की हिम्मत नहीं पड़ी कि इस रैली में जाए. बाद में रैली में लालू के कहने पर गए थे. जाहिर है कि नीतीश को सेंटर स्टेज पर लाने में योगदान कुशवाहा का था. पहले समता पार्टी में दोनों नेता साथ थे. फिर 2014 तक जेडीयू में दोनों ने साथ काम किया. लेकिन नीतीश कुमार से कुशवाहा की अदावत बढ़ती गई. दोनों लोग अलग हो गए. आरएलएसपी का गठन किया. एनडीए के साथ चुनाव लड़े और तीन लोकसभा सीट भी जीत गए. हालांकि केंद्र में जो रुतबे की दरकार थी वो नहीं मिल सकी.

जेडीयू बीजेपी में तकरार

ऐसा नहीं है कि बीजेपी और जेडीयू के बीच सब कुछ ठीक चल रहा है. नीतीश कुमार नोटबंदी के बारे में बीजेपी से सवाल पूछ रहे हैं. यही नीतीश कुमार पहले नोटबंदी के पक्ष में थे. बीजेपी के साथ जाने के राजनीतिक नुकसान का आकलन नीतिश कुमार कर रहे हैं .जेडीयू की तरफ से सार्वजनिक तौर पर लोकसभा चुनाव में 25 सीटों की डिमांड की जा रही है. बिहार में बीजेपी के लिए मुश्किल है. वो ज्यादा सीटें किसी एक दल को नहीं दे सकती है. बीजेपी को लोक जनशक्ति पार्टी को भी एडजस्ट करना है. कुशवाहा को भी मनाना है. हालांकि बीजेपी के लिए बदल रहे हालात में कुनबा जोड़कर रखने की चुनौती है क्योंकि जीतन राम मांझी पहले ही एनडीए का साथ छोड़ चुके हैं. कोई और दल अब अलग ना हो इसके लिए बीजेपी प्रयास कर रही है.

पासवान की नजर सियासी बयार पर

लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष के बारे में मशहूर है कि वो सियासी बयार भांप लेते हैं. 2004 में कांग्रेस के साथ हो गए तो सत्ता में रहे. 2014 में बीजेपी के साथ मिल गए. केंद्र में मंत्री हैं. लेकिन इस बार उनको ज्यादा तवज्जो नहीं मिल सका है. उनकी नाराजगी का अंदाजा अमित शाह को भी है. इसलिए पहले रामविलास पासवान से मिलने गए थे. लेकिन पासवान अपने राजनीतिक पत्ते इतनी आसानी से नहीं खोलते वो मौके के इंतजार में हो सकते हैं. कब वो दूसरी नाव पर सवार हो जाएंगे, कहना मुश्किल है. उनकी पार्टी के भीतर उहापोह है. बताया जाता है कि पार्टी के सांसद महबूब अली कैसर खुश नहीं हैं. कैसर पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे. लालू के साथ पासवान के रिश्ते कभी खुशी कभी गम वाले है. दोनों के बीच कभी भी रिश्ते बहाल हो सकते हैं.

2019 गैर बीजेपी में एकता की कवायद

कांग्रेस की तरफ से बिहार में एनडीए के सहयोगियों पर डोरे डाले जा रहे हैं. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव खुला निमंत्रण दे रहे हैं, जिससे बीजेपी सकते में है. एनडीए के बिहार के नेता कभी जनता दल के साथ थे. कई नेता यूपीए में भी रह चुके हैं. गैर बीजेपी पार्टियों को एकजुट करने की कवायद चल रही है. लेफ्ट के नेता सीताराम येचुरी इस मुहिम में लगे हैं. एच डी देवगौड़ा के साथ आने से कांग्रेस उत्साहित है. बिहार में हुए जोकीहाट उपचुनाव के बाद परिस्थिति बदल रही है.

एनडीए आरजेडी कांग्रेस का मुकाबला नहीं कर पाई है. इस वोट के समीकरण में पासवान या फिर कुशवाहा का शामिल होना. बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. बीजेपी की एनडीए नेताओं को एकजुट रखने की कवायद तभी सफल हो सकती है. जब विपक्ष में बिखर रहा हो. एकजुट विपक्ष एनडीए के लिए मुसीबत का कारण है. ऐसी स्थिति में बीजेपी के लिए कुशवाहा या पासवान को रोक पाना मुश्किल हो सकता है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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