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कांग्रेस और सोनिया: भंवर में पार्टी, भ्रम में नेता

'ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी' अब ‘ऑल इंडिया कंफ्यूज्ड कमेटी’ बन गई है.

Updated On: Dec 09, 2016 03:37 PM IST

Ravi Dubey

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कांग्रेस और सोनिया: भंवर में पार्टी, भ्रम में नेता

शुक्रवार, 9 दिसंबर को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी 70 साल की हो गईं. पिछले कुछ समय से उनकी तबियत नासाज चल रही है. बढ़ती उम्र और खराब सेहत के चलते चार साल पहले वो राजनीति को अलविदा कहने की मंशा जता चुकी हैं.

उनकी इस मंशा का जिक्र वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई की किताब ’24 अकबर रोड’ में मिलता है. किताब के मुताबिक, सोनिया गांधी ने 9 दिसंबर, 2012 को अपने जन्मदिन के मौके पर पार्टी के कुछ बड़े नेताओं के सामने रिटायरमेंट की बात कही थी.

तब कांग्रेस सत्ता में थी. पार्टी में सबकुछ ठीक था. अब हालात जुदा हैं. अब पार्टी भंवर में फंसी है और नेतृत्व भ्रम में.

नेतृत्व से लेकर संगठन तक, सड़क की रणनीति से लेकर संसद तक, चुनाव से लेकर मुद्दों तक पार्टी बेहद बिखरी नजर आती  है.  पिछले ढाई साल में वो एनडीए सरकार के खिलाफ एक भी आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई है.

कांग्रेस को मोदी सरकार की तरफ से मुद्दे तोहफे में मिलते रहे हैं लेकिन किसी भी मुद्दे पर कांग्रेस प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभा ही नहीं पाई.

राजनीति में नेता अपनी पार्टी की लाइन तय करता है लेकिन कांग्रेस पार्टी के नेता किस एक लाइन में खड़े हों इसी को लेकर कंफ्यूज हैं.

केजरीवाल की तरह छापामार राजनीति

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के हाथों मिली शर्मनाक हार के बाद राहुल गांधी ने आम आदमी पार्टी से सीख लेने की बात कही थी. तब यह माना गया था कि सोशल मीडिया से लेकर सड़क पर और जनता के बीच राहुल गांधी ज्यादा मुखर होकर आएंगे.

RahulGandhi

राहुल गांधी सोशल मीडिया पर जब तक आते तब तक नरेंद्र मोदी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक अपना कमाल सोशल मीडिया पर दिखा चुके थे. अगर राहुल गांधी की टीम सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर पेशोपेश में न रहती और युवा होने के नाते वो इसकी अगुवाई करते तो शायद माजरा कुछ और हो सकता था.

सड़क पर उतर कर हेडलाइन बनाने की कला अरविंद केजरीवाल से सीखने वाले राहुल पीएम मोदी पर टीआरपी की राजनीति करने का आरोप लगाते हैं. टीआरपी या हेडलाइन पॉलिटिक्स राहुल बहुत पहले से करते आ रहे हैं. पहले दलितों के घर रात गुजारना, ट्रेन की स्लीपर क्लास में सफर करना और मुंबई लोकल का सफर राहुल की टीआरपी पॉलिटिक्स है.

यूपीए-2 के दौरान राहुल ने अपनी सरकार का अध्यादेश फाड़कर हेडलाइन बनाई. इस अध्यादेश के पास हो जाने से लालू यादव जैसे भ्रष्टाचार के दोषी पाए गए नेताओं को फायदा मिलना था. लेकिन राहुल ने पहले तो ऐसा होने नहीं दिया, अब उसी राजद के साथ बिहार में सरकार चला रहे हैं.

गठबंधन की राजनीति को लेकर भी राहुल के आने के बाद कांग्रेस में बड़ा कंफ्यूजन नजर आ रहा है. गठबंधन सरकार चला रही कांग्रेस को राहुल यूपीए-2 के दौरान अकेले चलाने की हिमायत कर रहे थे. अब वही राहुल जयललिता का हालचाल जानने चेन्नई तक पहुंच जाते हैं. लेकिन नोटबंदी पर राहुल विपक्षी दलों को एकजुट करने में नाकाम रहे.

राहुल की वीकेंड पॉलिटिक्स से पार्टी परेशान

आलोचक और विपक्षी दल उन पर ‘वीकेंड पॉलिटिक्स’ करने का आरोप लगाते रहे हैं. राहुल की राजनीति में यह कंफ्यूजन अब उनकी पार्टी में भी नजर आने लगा है. उन्हें अध्यक्ष बनाने को लेकर कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव तो पारित कर दिया लेकिन ऐसा कब तक होगा इसकी कोई डेडलाइन तय नहीं की गई. फैसला अध्यक्ष सोनिया गांधी पर छोड़ दिया गया.

राहुल को पार्टी की बागडोर सौंपने को लेकर भी पार्टी हाईकमान असमंजस में है.

RahulGandhi_UP

कांग्रेस कार्यसमिति के प्रस्ताव के बाद भी पार्टी आलाकमान इसे लेकर पशोपेश में हैं. पार्टी में तकरीबन 150 ऐसे नेता हैं जो नई पीढ़ी को कमान सौंपे जाने से पहले अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं.

इन्हें लगता है कि राहुल के आने से इनकी राजनीति खतरे में पड़ सकती है. पार्टी के अंदर चेंज ऑफ गार्ड से पहले संगठन सोनिया की तरफ इसी उम्मीद से देख रहा है. यह हालात कांग्रेस पार्टी के अंदर कन्फ्यूजन कम और शह-मात के खेल का भ्रम ज्यादा पैदा कर रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व को लेकर जब तक भ्रम नहीं होता तब तक पार्टी में सबकुछ ठीक चलता है. अब कांग्रेस में एक नया पावर सेंटर भी तैयार हो गया है. वो हैं प्रियंका गांधी.

सोनिया कहती हैं कि राहुल ठीक काम कर रहे हैं. राहुल कहते हैं कि वो अपनी बहन प्रियंका की सुनते हैं. प्रियंका का मानना है कि राहुल को कुछ बताने की जरूरत नहीं है.

ऐसे में संगठन किसकी सुने इसे लेकर भी कंफ्यूजन फैला हुआ है. प्रियंका ने जिस तरह मां और भाई के संसदीय क्षेत्र का कामकाज संभाला है उससे दोनों की सोच पर उनकी दखल होना लाजिमी हैं.

गठबंधन के दो सीएम उम्मीदवार

पार्टी की यूपी चुनाव के लिए क्या रणनीति होनी चाहिए, इस पर भी भ्रम साफ नजर आ रहा है.

राहुल गांधी ने बिहार में मोदी को मात देने वाले प्रशांत किशोर को रणनीति बनाने का काम तो सौंप दिया लेकिन उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष किशोर को ‘साउंड रिकॉर्डिस्ट’ से ज्यादा कुछ नहीं मानते. कुछ नेता समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन की वकालत कर रहे हैं.

प्रशांत किशोर भी गठबंधन की संभावना तलाशने के लिए समाजवादी पार्टी के नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं. ऐसे में उन्होंने शीला दीक्षित को यूपी चुनाव में सीएम कैंडिडेट क्यों घोषित करवाया, इसे समझना मुश्किल है. अगर कांग्रेस सपा साथ आती हैं तो गठबंधन का चेहरा वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही होंगे. कांग्रेस यहां अपने बूते सरकार नहीं बना सकती यह सभी जानते हैं ऐसे में मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करना स्ट्रैटेजिक कन्फ्यूजन है और कुछ नहीं.

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कांग्रेस की यूपी में सीएम कैंडिडेट शीला दीक्षित आज भी यूपी के पॉलिटिकल सीन से गायब हैं.

इसी तरह पंजाब में जहां पार्टी की सरकार बनाने की संभावना ज्यादा दिख रही हैं, वहां बीजेपी से बगावत कर पार्टी में आए नवजोत सिंह सिद्धु को अमरिंदर सिंह पहले दिन से ही कांग्रेस में लेने की तैयारी कर चुके थे.

नवजोत और राहुल गांधी की आपस में मुलाकात भी हो गई थी लेकिन पार्टी में कन्फ्यूजन इतना था कि यह प्रक्रिया पूरी होते-होते दो महीने लग गए.

सरकार को घेरने की नाकाम रणनीति

बात लोकसभा में पार्टी की रणनीति की हो तो वहां भी नोटबंदी के मसले पर पहले दिन से कुछ साफ नहीं है. इसका सबसे अच्छा मुजाहिरा किया पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने. राज्यसभा में चर्चा के दौरान मनमोहन सिंह ने नोटबंदी का समर्थन करते हुए इसे संगठित लूट करार दिया.

पार्टी को चाहिए था कि दस साल प्रधानमंत्री रहे, देश के वित्त मंत्री रहे, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे मनमोहन सिंह का बेहतर इस्तेमाल करती. होना तो यह चाहिए था कि मनमोहन सिंह और पार्टी के दूसरे अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ हर राज्य की राजधानी में जाकर कम से कम एक प्रेस कांफ्रेंस करके पार्टी का पक्ष रखते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इसके पहले भी पीओके पर सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर भी पार्टी में भ्रम रहा. सर्जिकल स्ट्राइक का स्वागत करने के बाद पार्टी नेता मोदी सरकार से इसका सबूत मांगने लगे. इतना ही नहीं राहुल गांधी ने तो सरकार पर ‘खून की दलाली’ का भी आरोप लगा दिया.

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2014 लोकसभा चुनाव में मिली हार की समीक्षा के लिए बनी एंटनी कमेटी की रिपोर्ट ने पार्टी की प्रो-मुस्लिम छवि को भी हार का एक कारण माना था. कुछ ऐसे ही हालात सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बनते दिख रहे थे, जब कांग्रेस के ‘मोदी विरोध’ को बीजेपी ‘देश विरोध’ की तरह प्रोजेक्ट करने लगी.

फिलहाल एआईसीसी: ‘ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी’ नहीं बल्कि ‘ऑल इंडिया कंफ्यूज्ड कमेटी’ नजर आ रही है. देश की सबसे बूढ़ी पार्टी की बुजुर्ग नेता को पार्टी को इस भंवर से और परिवार को भ्रम से निकालना होगा.

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