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अखिलेश यादव के हवाले समाजवादी साइकिल

अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश एक मजबूत चेहरा होगा, जो भाजपा व बसपा दोनों के लिए बड़ी चुनौती होगी.

Updated On: Jan 17, 2017 08:23 AM IST

Suresh Bafna
वरिष्ठ पत्रकार

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अखिलेश यादव के हवाले समाजवादी साइकिल

चुनाव आयोग ने सपा के अखिलेश गुट को ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह देकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में लगभग टेक्टोनिक शिफ्ट जैसी स्थिति बना दी है. चुनाव आयोग ने अपने 42 पेज के निर्णय में विस्तार से इस बात का जिक्र किया है कि क्यों अखिलेश के नेतृत्व वाला गुट ही असली समाजवादी पार्टी है और उसे ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल करने का अधिकार है.

वास्तविकता यह है कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव अपने बेटे के खिलाफ जारी राजनीतिक लड़ाई 1 जनवरी 2016 को ही हार गए थे. जब 200 से अधिक विधायक और 15 सांसद पार्टी महासचिव रामगोपाल द्वारा बुलाए गए राष्ट्रीय अधिवेशन में उपस्थित हुए थे.

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दुखद बात यह थी कि 50 साल लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद मुलायम सिंह यादव इस राजनीतिक सच्चाई को पढ़ने में नाकाम रहे है कि सपा में अब उनके पुत्र अखिलेश का युग शुरू हो गया है.

मुलायम ने कोशिश ही नहीं की 

चुनाव आयोग ने अखिलेश गुट द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों, शपथपत्रों, वीडियो व तथ्यों के आधार पर तार्किक निर्णय लिया कि अखिलेश गुट ही असली समाजवादी पार्टी है. चुनाव आयोग ने मुलायम सिंह यादव को भी मौका दिया था कि वे अपने दावे के संदर्भ में 9 जनवरी तक दस्तावेज व शपथ-पत्र पेश करें, लेकिन उन्होंने ऐसा कोई प्रयास करने की कोशिश नहीं की.

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मुलायम सिंह यादव गुट ने 5 जनवरी को सपा का आपात राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने की घोषणा की थी. लेकिन जब उनको इस बात का अहसास हुआ कि उनके समर्थन में गिनती के विधायक व सांसद हैं, तब बुलाए गए राष्ट्रीय अधिवेशन को रद्द करना उचित समझा. अखिलेश गुट ने चुनाव आयोग में इस तथ्य को भी अपने पक्ष में पेश किया था.

मुलायम सिंह यादव एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे, इसलिए उन्होंने पुत्र अखिलेश के साथ तीन बार कोशिश की कि कोई समझौता हो जाए.

उन्होंने अखिलेश को मुख्‍यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर स्वीकार कर लिया था, पर वे राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए. वे चाहते थे कि चुनाव टिकट बांटने का अधिकार उनके पास रहे. अखिलेश यह अधिकार पिता को देने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थे.

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दिलचस्प बात यह थी कि चुनाव आयोग में अखिलेश गुट अपने को असली सपा मानने का दावा कर रहा था, वहीं मुलायम सिंह यादव की तरफ से कहा गया कि पार्टी में कोई विभाजन नहीं हुआ है. इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कह दिया था कि वे पार्टी के मार्गदर्शक हैं. अखिलेश द्वारा बुलाए गए अधिवेशन में उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष से हटाकर मार्गदर्शक ही बनाया गया था.

चुनाव आयोग में गंभीर नहीं दिखे मुलायम

चुनाव आयोग में मुलायम गुट की दलीलें इस बात का सबूत थी कि वे अपने दावे के प्रति ही गंभीर नहीं है. वे इस तकनीकी आधार पर ही दावा कर रहे थे कि 1 जनवरी के राष्ट्रीय अधिवेशन में उन्हें हटाया नहीं गया, इसलिए वे आज भी सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. यह दलील देकर उन्होंने एक तरह से स्वीकार कर लिया कि 1 जनवरी का अधिवेशन पार्टी संविधान के अनुरूप था.

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अब सपा के भूतपूर्व सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के सामने सम्मानजनक विकल्प यही है कि वे पुत्र अखिलेश को आशीर्वाद देकर मार्गदर्शक की भूमिका को स्वीकार कर लें. अखिलेश गुट को साइकिल चुनाव चिन्ह मिलने के बाद अब संभावना यह भी है कि मुलायम गुट के कई समर्थक नेता भी उनका साथ छोड़कर असली सपा में शामिल हो जाए. इसमें आजम खान का नाम सबसे ऊपर है.

अखिलेश को साइकिल मिलने से कांग्रेस पार्टी के नेता भी बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं. मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल का विरोध कर रहे थे, वही अखिलेश इस संदर्भ में राहुल गांधी व प्रियंका गांधी के संपर्क में थे. हो सकता है कल ही सपा व कांग्रेस के बीच गठबंधन की घोषणा हो जाए.

पिछले तीन महीनों के दौरान सपा के भीतर चले इस यादवी संघर्ष का सबसे अधिक लाभ अखिलेश यादव को ही मिला है.

एक झटके में उन्होंने कमजोर नेता होने और गुंडागिर्दी के आरोप को बेअसर कर दिया है. अखिलेश को साइकिल मिलने से भाजपा व बसपा नेता सबसे अधिक दुखी हुए होंगे.

मायावती यह उम्मीद लगाए बैठी थी कि सपा में जारी गुटीय संघर्ष के चलते मुस्लिम मतदाता उसकी झोली में आ जाएंगे. अखिलेश गुट के असली सपा घोषित होने के बाद अब मुस्लिम मतदाताओं में विभाजन की स्थिति पैदा नहीं होगी. भाजपा भी चाहती थी कि मुस्लिम मतों का विभाजन हो.

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अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश एक मजबूत चेहरा होगा, जो भाजपा व बसपा दोनों के लिए बड़ी चुनौती होगी. भाजपा की परेशानी यह है कि उसके पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा नहीं है, जो अखिलेश को चुनौती दे पाने में सक्षम हों. जमीनी रिपोर्ट को आधार मानें तो बसपा तीसरे नंबर पर खिसकती नजर आ रही है.

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