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और बढ़ सकती है शिवपाल-अखिलेश में महाभारत

सपा को अंदरूनी कलह के बार-बार सामने आने की कीमत चुनाव में चुकानी पड़ सकती है

Updated On: Dec 28, 2016 10:47 PM IST

Krishna Kant

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और बढ़ सकती है शिवपाल-अखिलेश में महाभारत

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सितारे गर्दिश में हैं. जिन मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव ने मिलकर अखिलेश यादव को नेता बनाया था, अब वही उन्हें नियंत्रित करने के लिए पूरा जोर लगाए हुए हैं.

ताजा खबर है कि प्रत्याशियों की सूची जारी होने में अखिलेश की मर्जी नहीं चली. प्रतिक्रिया में अखिलेश ने अपने मंत्रिमंडल से- सुरभि शुक्ला और संदीप शुक्ला-दो मंत्रियों को फिर हटा दिया है और मंत्रिमंडल की बैठक बुला ली है.

इसके पहले अक्टूबर में भी पार्टी में चल रही अंदरूनी कलह उभर कर सड़क पर आ गई थी. अखिलेश ने अपने वफादार नेताओं की बैठक में मंत्री और सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव समेत चार मंत्रियों को कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया था. इस झगड़े पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था.

अखिलेश यादव का कहना था कि अमर सिंह के करीबी पार्टी का माहौल खराब कर रहे हैं. इसी क्रम में उन्होंने अमर सिंह की करीबी जया प्रदा को भी फिल्म विकास परिषद से हटा दिया था. हालांकि, सार्वजनिक तू-तू मैं-मैं के बाद मुलायम के दबाव में अखिलेश ने उन फैसलों को वापस ले लिया था.

मुलायम अपने बेटे को कुर्सी पर पहले ही बैठा चुके हैं. लेकिन दूसरी तरफ वे जानते हैं कि शिवपाल सिंह उनकी पार्टी में वह व्यक्ति हैं जो कार्यकर्ताओं और नेताओं के काफी लोकप्रिय हैं. वे अखिलेश को सत्ता और शिवपाल को संगठन की कमान सौंपने के इच्छुक दिखते हैं.

अब झगड़ा इस बात का है पार्टी और सत्ता दोनों पर सर्वाधिकार किसका हो. अखिलेश मुख्यमंत्री की हैसियत से हर कहीं अपना हस्तक्षेप चाहते हैं, जबकि शिवपाल संगठन पर अपनी मजबूत पकड़ ढीली नहीं होने दे रहे.

लखनवी गलियारों में कानाफूसी होती रही है कि उत्तर प्रदेश में साढ़े चार मुख्यमंत्री हैं. एक मुलायम सिंह, तीन चाचागण (इन चाचाओं में आजम खान भी शामिल हैं )और आधा अखिलेश. अखिलेश शायद अपने कार्यकाल के अंत तक अपनी कठपुतली छवि तोड़ना चाहते थे.

अखिलेश प्रदेश में युवाओं के नेता बनना चाहते हैं जो बिना साफ सुथरी छवि, बिना विकास कार्यों और बिना ईमानदार छवि के संभव नहीं है.

अखिलेश ने इसी क्रम में डीपी यादव को पार्टी से बाहर किया था. इस पर तो मुलायम शिवपाल की तरफ से कोई महाभारत नहीं हुई. लेकिन पिछले छह महीने से मुलायम शिवपाल और अखिलेश में जिस तरह से रार मची है, उससे बार बार यह अंदेशा जताया जाता है कि पार्टी टूट की तरफ बढ़ रही है.

अखिलेश ने मुख्तार अंसारी जैसे तमाम अपराधी छवि के नेताओं से दूरी बनाने के लिए भरपूर जोर लगाया और नाकाम रहे. मुलायम सिंह और शिवपाल में इस बात पर सहमति है कि बाहुबलियों, जातीय समीकरणों आदि के बगैर यूपी का चुनाव जीतना संभव नहीं है.

एक बार पार्टी में जिस तरह की जूतमपैजार हुई थी, उसके बाद उम्मीद थी कि अब आगे सभी नेता और कार्यकर्ता एकजुट होकर चुनाव की तैयारी करेंगे. लेकिन पार्टी में दोबारा मार मचती दिख रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का यह अंतहीन झगड़ा मतदाताओं के बीच पार्टी की साख कमजोर करेगा. सपा को अंदरूनी कलह के बार-बार इस तरह सामने आने की कीमत चुनाव में चुकानी पड़ सकती है.

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