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टीपू ने बता दिया कि उन्हें समाजवादी पार्टी का ‘सुल्तान’ क्यों कहते हैं

उपचुनावों की जीत जहां समाजवादी पार्टी में जान फूंकने का काम कर रही है तो वहीं यादव परिवार में एक पश्चाताप भी दिल जलाने का काम कर रहा है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 15, 2018 10:23 PM IST

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टीपू ने बता दिया कि उन्हें समाजवादी पार्टी का ‘सुल्तान’ क्यों कहते हैं

नेताजी मुलायम सिंह यादव सोच रहे होंगे कि काश पिछले साल उनके कुनबे में कोहराम नहीं मचा होता और समाजवादी पार्टी परिवार की तरह ही दो फाड़ की तरफ न बढ़ी होती तो शायद आज यूपी में सियासत की तस्वीर जुदा होती है. दरअसल उपचुनावों की जीत जहां समाजवादी पार्टी में जान फूंकने का काम कर रही है तो वहीं यादव परिवार में एक पश्चाताप भी दिल जलाने का काम कर रहा है. तभी चाचा शिवपाल ने कहा कि अखिलेश ने यही काम अगर साल 2017 में किया होता तो वो आज यूपी के सीएम होते.

राजनीति में फैसला लेने की ताकत और सही फैसला लेने की दूरदर्शिता की बेहद जरूरत होती है. इतिहास के गलत फैसलों को देश भूलता नहीं तो वक्त माफ करता भी नहीं है.

modi, mulayam and akhilesh

यूपी की सत्ता मिलने के बाद जब मुलायम सिंह ने अखिलेश को अपनी गद्दी सौंपी तो मुलायम के फैसले पर सवाल उठे. अखिलेश ने जब चार साल अपने पिता और चाचाओं के आदेशों का पालन करते हुए सरकार चलाई तो विपक्ष ने उनकी योग्यता पर सवाल उठाए. ये तक आरोप लगे कि वो कठपुतली सीएम थे. लेकिन जब अखिलेश ने अपने हक को लेकर पार्टी के भीतर आवाज उठाई तो आरोप लगे कि एक बेटे की जिद ने पार्टी को धरातल पर ला दिया.

अखिलेश जब पूरी तरह पार्टी के सुप्रीमो बने और कांग्रेस से यूपी चुनाव में हाथ मिलाया तो खुद मुलायम सिंह को ये साथ पसंद नहीं आया. अखिलेश ने जब चाचा शिवपाल के करीबियों के टिकट काटे तो चाचा को अखिलेश का रूप रास नहीं आया. यहां तक कि जब यूपी में समाजवादी पार्टी सत्ता से बेदखल हुई तो सारा ठीकरा अखिलेश के सिर पर ही फोड़ा गया. अखिलेश ने हार के बाद जनता के फैसले का स्वागत किया तो अपने पुराने फैसलों को जायज भी ठहराया. लेकिन अखिलेश फैसला लेने में रुके नहीं.

यूपी में हो रहे उपचुनावों में बीजेपी को मात देने के लिए मायावती और अखिलेश यादव ने हाथ मिला लिया है

मायावती के साथ गठबंधन का फैसला उनके सियासी करियर में मील का पत्थर माना जाएगा. दरअसल पिता की राजनीति की चक्की का आटा खा कर बड़े हुए अखिलेश भी अपने पिता की तरह सियासत के दाव-पेंच में माहिर हो चुके हैं. वो सियासत के तराजू में अवसरों को तौलना सीख चुके हैं. यूपी विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब वो परिपक्व राजनीतिज्ञ की जुबान बोल रहे हैं. मायावती के साथ गठबंधन पर वो कह रहे हैं कि 'भविष्य के बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता, लेकिन आगे वही बढ़ता है, जो पुरानी बातों को भूल जाता है.'

अखिलेश यादव अतीत से आगे निकल कर अब साल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं. मायावती और अखिलेश को अब एसपी-बीएसपी गठबंधन में रब दिखने लगा है. एक फैसले ने दोनों ही नेताओं और पार्टियों की अचेतावस्था को आईसीयू से बाहर निकाल कर ग्लेडिएटर बना दिया है.

Akhilesh Mayawati

अखिलेश ने उपचुनाव के महत्व के खास मौके पर पढ़ लिया. वो ये जानते थे कि बीजेपी के लिए गोरखपुर और फूलपुर की सीटें साख का सवाल हैं. वो ये भी जानते थे कि यहां दी गई चोट की गूंज लखनऊ से होकर दिल्ली तक जाएगी. अखिलेश को उम्मीद थी कि गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के लखनऊ आने से वहां का राजनीतिक इतिहास जातीय समीकरण से बदला जा सकता है. वो ये भी जान चुके थे कि फूलपुर की सीट से केशव प्रसाद मौर्य के हटने के बाद जाति गणित में जोर लगाया जा सकता है क्योंकि बीजेपी के भीतर फूट की सुगबुगाहट दिख रही है.

गोरखपुर और फूलपुर से बीजेपी के उम्मीदवारों को देखते हुए अखिलेश को अपनी राजनीति की रंगबाजी दिखाने का मौका मिला. उन्होंने परखा कि इन दो सीटों पर समाजवादी पार्टी के लिए किस पार्टी का समर्थन सबसे मुफीद रहेगा. तभी तमाम गुणा-भाग के बाद अखिलेश को याद आईं बुआ यानी मायावती. उन्होंने बेहिचक समर्थन मांगा. वो ये जानते थे कि राजनीति के मैदान में कोने में खड़ीं मायावती ना नहीं करेंगीं.

मायावती से उन्हें समर्थन भी मिला और आशीर्वाद भी. 25 साल के सियासी इतिहास में ये नायाब घटना है कि मायावती  गेस्ट हाउस की कड़वी यादों से बाहर निकल कर समाजवादी पार्टी के लिए दोनों सीटों पर ‘गेस्ट अपीयरेंस’ के लिए तैयार हो गईं. बस यही टर्निंग प्वाइंट योगी और मौर्या को राजनीति के नेपथ्य में ले आया और समाजवादी पार्टी की साइकिल को ट्रैक पर.

Akhilesh Yadav With Cycle

बीजेपी के गढ़ में जीत दर्ज कर अब अखिलेश के पास गरजने की ताकत आ गई. सीएम योगी पर निशाना लगाने का उन्हें हौसला और बहाना मिल गया. अखिलेश पिता के राजनीतिक इतिहास से सीख चुके हैं कि राजनीति में एक बार दबाव बना कर चढ़ाई किस तरह की जाती है. वो ये जानते हैं कि हार के बाद बीजेपी बैकफुट पर है. इसलिए अखिलेश यादव इस जीत को अपनी राजनीति को फिर से चमकाने में जुट गए हैं. वो दो सीटों पर मिली जीत के जरिए समाजवादी पार्टी के अखिलेश युग की ब्रांडिंग कर रहे हैं. इसके लिए उन्हें पिता से शाबाशी मिलनी भी चाहिए. क्योंकि अखिलेश की वजह से ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के रिश्तों में से गेस्टहाउस का कलंक धुल सका है.

अखिलेश ने विपक्ष को भी ये मंत्र दे दिया है कि दुश्मन को दोस्त बना लो तो ताकत दो गुनी हो जाती है. अखिलेश इस कमबैक की वजह से एक बार फिर परिवार में सुल्तान बन चुके हैं. लेकिन गठबंधन की राजनीति की विडंबना ये है कि सत्ता की म्यान में दो तलवारें कभी एक साथ नहीं रह सकती हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो मुलायम-कांशीराम का गठबंधन टूटा नहीं होता.

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