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कांग्रेस में मंथन: UP में कौन दिलाएगा ब्राह्मण वोट, इन चार नेताओं पर सबकी नजर

लखनऊ में विवेक तिवारी की हत्या के बाद कांग्रेस को लग रहा है कि ब्राह्मण बीजेपी से गुस्से में है.

Updated On: Oct 09, 2018 03:33 PM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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कांग्रेस में मंथन: UP में कौन दिलाएगा ब्राह्मण वोट, इन चार नेताओं पर सबकी नजर

यूपी में कांग्रेस की कमान बदलने की सुगबुगाहट तेज है. यूपी के चुनाव नतीजों के बाद राजबब्बर ने इस्तीफे की पेशकश की थी लेकिन कांग्रेस ने उनको बने रहने के लिए कहा था. लखनऊ में विवेक तिवारी की हत्या के बाद कांग्रेस को लग रहा है कि ब्राह्मण बीजेपी से गुस्से में है. पार्टी अब इसका फायदा उठाने की फिराक में है. अब पार्टी ने नए सिरे से विचार-विमर्श कर रही है. पार्टी में कई ब्राह्मण नेताओं पर विचार चल रहा है. कुछ के समर्थक अपने नेता के लिए लॉबिंग भी कर रहे हैं.

चार ब्राह्नण कौन

यूपी में कांग्रेस हाशिए पर है लेकिन पार्टी में नेताओं की कमी नहीं है. जिन चार नेताओ के लिए लॉबिंग हो रही है. उसमें प्रमोद तिवारी, राजेश मिश्रा, ललितेश पति त्रिपाठी और जितिन प्रसाद है. ये चारों नेता ब्राह्नण हैं.

प्रमोद तिवारी प्रतापगढ़ के रामपुर खास से कई बार विधायक थे. एक टर्म राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं. यूपी विधानमंडल दल के कई साल तक नेता भी रहे हैं. प्रमोद तिवारी का तालमेल कई दलों में अच्छा है. अब उनकी बेटी रामपुर खास से विधायक है. प्रमोद तिवारी को पूरे यूपी में लोग जानते हैं लेकिन कांग्रेस के भीतर उनके विरोधी उन पर मुलायम सिंह का करीबी होने का आरोप लगाते हैं.

राजेश मिश्रा वाराणसी से पूर्व सांसद हैं. 2009 में मुरली मनोहर जोशी को लोकसभा चुनाव में मात दी थी. बीएचयू के पूर्व छात्रनेता रहे राजेश मिश्रा के समर्थन में पार्टी का ओल्ड गार्ड लॉबिंग कर रहा है. राजेश मिश्रा प्रधानमंत्री के संसदीय इलाके से हैं. इसका फायदा उनको मिल सकता है.

ललितेश पति त्रिपाठी कांग्रेस से कद्दावर नेता रहे कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र हैं. एक बार विधायक भी थे. इस बार चुनाव जीत नहीं पाए हैं. यूपी कांग्रेस को चलाने के लिए काफी यंग हैं. ललितेश के पास अनुभव की कमी है. हालांकि राहुल गांधी के यहां उनके नाम पर चर्चा हो रही है.

Rahul Gandhi

जितिन प्रसाद भी यूपी के कद्दावर कांग्रेसी परिवार से आते हैं. शाहजहांपुर के रहने वाले जितिन प्रसाद सेंट्रल यूपी से हैं. दो बार सांसद भी रहे हैं. जितिन का राजनीतिक करियर यूथ कांग्रेस से शुरू हुआ है. एआईसीसी में मध्य प्रदेश के प्रभारी सचिव भी थे. यूपीए की सरकार में कई अहम मंत्रालय में राज्यमंत्री रहे हैं. जिसमें पेट्रोलियम, सड़क परिवहन और मानव संसाधन मंत्रालय शामिल हैं. वर्तमान में कांग्रेस वर्किंग कमेटी में स्पेशल इनवाइटी हैं. जितिन प्रसाद कांग्रेस के लिए सबसे बढ़िया प्रेसिडेंट हो सकते हैं. उनके पिता जितेन्द्र प्रसाद का रसूख उनके काम आ सकता है. कांग्रेस में यंग होने के अलावा तजुर्बेकार और संसाधनयुक्त भी हैं. जो सबको साथ लेकर चल सकते हैं.

पांच का समूह

कांग्रेस में बताया जा रहा है कि एक मुखिया के नीचे चार वर्किंग प्रेसिडेंट बनाए जा सकते हैं. जो अलग-अलग इलाके के प्रभारी होंगे. जिसमें सोशल इंजीनियरिंग का नमूना देखने को मिल सकता है. जिसमें एक दलित, एक बैकवर्ड और एक मुस्लिम हो सकता है.

कांग्रेस का ब्राह्मण पर फोकस

यूपी की राजनीति जातीय आधार पर बंटी है. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जो सोशल इंजीनियरिंग की है. उसका तोड़ निकालना जरूरी है. बीजेपी ने अति पिछड़ो के अलावा उच्च जाति का वोट लिया है. दलित वोट में गैर जाटव वोट का काफी हिस्सा बीजेपी के साथ हो गया था.

योगी सरकार के दूसरा साल चल रहा है. कई घटनांए ऐसी हुई हैं जिससे ब्राह्मण बीजेपी से छिटक रहा है. लखनऊ में विवेक तिवारी वाली घटना से इस समुदाय में गुस्सा बढ़ा है. बीजेपी को भी इसका अंदाजा है. बैलेंस करने के लिए महेंद्र पांडे को प्रदेश की कमान दी है. केंद्र में योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर से आने वाले शिव प्रताप शुक्ला को वित्त राज्य मंत्री बनाया है. योगीराज में अति ठाकुरवाद से भी लोग खफा हैं.

ब्राह्मण पहले कांग्रेस का वोट था. कांग्रेस ब्राह्मण दलित और मुस्लिम के समर्थन से सत्ता में थी. ब्राह्मण वोटबैंक धीरे-धीरे बीजेपी के साथ चला गया है. जितेन्द्र प्रसाद के बाद कोई बड़े कद का ब्राह्मण नेता प्रदेश में नहीं उभर पाया है. पहले कांग्रेस के कई दिग्गज ब्राह्मण थे. बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की वजह से ये समुदाय में बीजेपी में चला गया था.

2007 में मायावती ने ब्राह्मण दलित और मुस्लिम को एकजुट करके यूपी की सत्ता हासिल की थी. मोदी लहर में सारे समीकरण टूट गए. ब्राह्मण को पार्टी से जोड़ने के लिए कांग्रेस का फोकस इस ओर है. एक बार ब्राह्मण के जुड़ने से मुस्लिम का रुझान कांग्रेस की ओर बढ़ सकता है.

कांग्रेस को यूपी में लगातार नए प्रयोग करने पड़ेंगे. ताकि पार्टी नया फार्मूला इजाद कर पाए. यूपी जैसे बड़े राज्य में सिर्फ एकतरफा राजनीति से कोई फायदा होना मुश्किल है. कांग्रेस को ब्राह्मण के अलावा तादाद में कम संख्या वाली जातियों को जोड़ने की आवश्यकता है.

यूपी के राजनीतिक समीकरण

यूपी में राजनीतिक समीकरण बीजेपी के साथ हैं. लोकसभा में और विधानसभा में बीजेपी का बोलबाला है. लोकसभा में कांग्रेस के पास सिर्फ दो सांसद हैं. विधानसभा में भी संख्या दहाई तक नहीं हैं. बीएसपी लोकसभा में सिफर है. विधानसभा में 17 सदस्य हैं. सपा की हालत थोड़ी बेहतर है. लोकसभा में चार सदस्य हैं तो विधानसभा में अपोजिशन के नेता का पद है. यानि 403 सदस्यीय विधानसभा में 10 फीसदी सदस्य सपा के हैं.

गठबंधन ही बचा सकता है लाज

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बीजेपी के खिलाफ बड़ा गठबंधन ही लाज बचा सकता है. सपा कांग्रेस का गठबंधन फेल हो चुका है. बिना बीएसपी के ये फार्मूला कामयाब नहीं हैं. यूपी के लड़को को जनता का साथ नहीं मिला है.

तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में गठबंधन नहीं हो पाना कांग्रेस के लिए झटका है. हालांकि राहुल गांधी ने उम्मीद जताई है कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन का रास्ता साफ हो जाएगा लेकिन किस फॉर्मूले के तहत ऐसा होगा, इसका खुलासा नहीं किया गया है. गोरखपुर और कैराना के उपचुनाव में गठबंधन ने बाजी मारी है. गठबंधन के सामने बीजेपी का राजनीतिक तिलिस्म टूट रहा है. योगी सरकार से लोगों का मोहभंग भी हो रहा है. हालांकि अमित शाह की रणनीति का खुलासा होना बाकी है. जिसके आगे सारे समीकरण ध्वस्त हो सकते हैं.

कांग्रेस के सामने चुनौती

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती गठबंधन में सम्मानजनक सीटें हासिल करना है. अभी तक जो ऑफर कांग्रेस को मिल रहे हैं वो सम्मानजनक नहीं कहे जा सकते हैं. कांग्रेस को उम्मीद है कि लगभग 15 सीट उसे हासिल हो जाएंगी. हालांकि अखिलेश-माया के सामने ये कांग्रेस के लिए सपने जैसा है. तीन राज्यों के चुनाव में अगर कांग्रेस ने जीत दर्ज की तो पार्टी की मोल-भाव की ताकत बढ़ेगी, जिसका फायदा यूपी में मिल सकता है.

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