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EXCLUSIVE बीजेपी चुनाव जीतने की मशीन है, ये मिथ टूट गया है: पायलट

राजस्थान उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद पायलट का मानना है कि उनके सूबे के लोग बीजेपी की सांप्रदायिक और समाज को बांटने की राजनीति को समझने लगे हैं

Rashme Sehgal Updated On: Feb 19, 2018 12:30 PM IST

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EXCLUSIVE बीजेपी चुनाव जीतने की मशीन है, ये मिथ टूट गया है: पायलट

राजस्थान कांग्रेस के प्रमुख सचिन पायलट खुश हैं कि सूबे में हाल के उपचुनाव में तीनों सीटों पर पार्टी को जीत मिली. पायलट का मानना है कि उनके सूबे के लोग बीजेपी की सांप्रदायिक और समाज को बांटने की राजनीति को समझने लगे हैं. उन्हें भरोसा है कि राजस्थान सहित पूरे देश के लोग अगले लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी को जोरदार सबक सिखाएंगे.

बीजेपी के बारे में माना जाता है कि वह चुनाव जीतने की मशीन है लेकिन राजस्थान के उपचुनावों में जीत के बाद क्या आपको लगता है कि बीजेपी को लेकर बना यह मिथ टूट गया है?

यह बात सही है कि बीजेपी अपने को बेहतरीन चुनावी मशीन कहती है लेकिन यह एक मिथ है और हम इस मिथ को तोड़ने में कामयाब हुए हैं. उपचुनाव सूबे के तीन अलग-अलग भौगोलिक इलाकों में हुए. अलवर राजस्थान के पूर्वी हिस्से में है, अजमेर मध्य राजस्थान में जबकि भीलवाड़ा पूरब की तरफ. हम तीनों ही इलाके में चुनाव जीते और 17 विधानसभाई क्षेत्रों में कामयाबी दर्ज की. उनके साथ पूरी सरकारी मशीनरी लगी थी. हम ये बात नहीं भूल सकते कि बीते चार सालों से उनकी सरकार है और वे पूरे बहुमत के साथ सत्ता में आए थे. पूरा धनबल उनके साथ था.

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया सूबे में बहुत अलोकप्रिय हैं?

देखिए, राज्य का मुख्यमंत्री उन्हें बीजेपी ने बनाया है, मैंने तो नहीं बनाया. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राजस्थान में सभी 25 सीटें जीती थीं और मंत्रिमंडल में सूबे की नुमाइंदगी भी अच्छी-खासी है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में सूबे से तीन-चार मंत्री हैं. लेकिन जहां तक राजस्थान का सवाल है बीजेपी के लिए आगे की इबारत बहुत साफ लिखी दिखाई दे रही है. लोग बेहतर भविष्य के लिए कांग्रेस की तरफ आएंगे.

आपका कहना है कि बीजेपी अब कदम पीछे खींच रही है लेकिन सच तो यह है कि कदम कांग्रेस ने पीछे हटाए हैं. मिसाल के लिए, त्रिपुरा में चुनाव होने जा रहे हैं लेकिन वहां आपकी कोई मौजूदगी नहीं है?

बीजेपी सरकारी तंत्र और धनबल के इस्तेमाल के जरिए भीड़ जुटा रही है. पूरे देश में उनकी यही रणनीति है.

क्या आपको लगता है कि राजस्थान में आई तब्दीली का असर कर्नाटक के चुनावों में भी दिखेगा?

जीत किसी भी राज्य में मिले, उससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को ताकत मिलती है. राजस्थान के उपचुनाव के नतीजों का सकारात्मक असर कर्नाटक में होने जा रहे चुनाव पर होना तय है. पंजाब में मिली जीत से भी हमें ताकत मिली थी. मुझे यह भी लगता है कि राहुल गांधी के आक्रामक चुनाव प्रचार से बीजेपी को कदम पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा है.

परंपरागत रूप से देखें तो राजस्थान में उपचुनाव में अमूमन सत्ताधारी पार्टी जीतती है. लेकिन इस बार बीजेपी का दांव कहां गड़बड़ पड़ा, आपको इसके बारे में क्या लगता है?

कांग्रेस ने बेरोजगारी, कृषि-संकट और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सिद्धांत के आधार पर पक्ष लेने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई. लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी की कोशिश चुनाव में सरेआम ध्रुवीकरण और सांप्रदायीकरण करने की थी. लेकिन लोग उनके झांसे में नहीं आए. इससे पता चलता है कि हिंदुस्तानी वोटर बहुत समझदार है.

चूंकि कांग्रेस ने कर्नाटक के लिए अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर दी है, सो क्या वह राजस्थान में भी ऐसा करेगी?

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कांग्रेस परंपरागत रुप से किसी भी राज्य के लिए अपने मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के नाम का ऐलान नहीं करती. मेरा ख्याल है कि यह सवाल बीजेपी से पूछना बनता है जिसने वसुंधरा राजे का नाम मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर घोषित नहीं किया है जबकि कर्नाटक और मध्यप्रदेश में इसका फैसला किया जा चुका है.

पिछले विधानसभा चुनावों की हार के बाद राहुल गांधी ने कमान आपको थमाई, जिससे दो बातों का संकेत मिलता है: एक तो यह कि वे नये चेहरे और नए विचार को पार्टी में जगह देना चाहते हैं और पुराने नेताओं को जताना चाहते हैं कि अब बदलाव का वक्त आ चुका है. क्या इससे अशोक गहलोत के साथ आपके कामकाजी रिश्ते पर कोई असर पड़ा है? और, क्या यह सच है कि पुराने नेता नए चेहरों को जगह देने के लिए तैयार हैं?

राहुल गांधी चाहते हैं कि नए चेहरों को जगह मिले, साथ ही अनुभव में नए और पुराने का मेल हो. वे चाहते हैं कि हर आयु-वर्ग के लोग सक्रिय भूमिका निभाएं. वे एक इंद्रधनुषी जमावड़ा तैयार करना चाहते हैं जिसमें सबके लिए जगह हो. राजस्थान में, हाल के सालों में इसी की लगातार कोशिश की गई है और ऐसा तभी हो सकता है जब हर समुदाय के लोग कांग्रेस को समर्थन देने और मजबूत बनाने में मिल-जुलकर सहयोग दें.

आइए, जरा पीछे मुड़कर उस वक्त में चलें जब अजमेर में लोकसभा के उपचुनाव के नतीजों का ऐलान हुआ था. आपको याद ही होगा कि उस वक्त विजयी उम्मीदवार राजू शर्मा आशीर्वाद मांगते हुए आपको पैरों पर झुक गए थे. कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसे पार्टी के भीतर आपके आरोहण के संकेत के रूप में देखा. मुझे पता है कि कांग्रेस का आलाकमान ही तय करेगा कि उसके शासन वाले राज्यों में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में रहे लेकिन क्या आपको लगता है कि राजू शर्मा की भावमुद्रा इस तथ्य का संकेत है कि आप राजस्थान की अगुवाई करने के लिए तैयार हैं?

मुझे लगता है कि वह सब जज्बातों के जोर में वक्ती तौर पर हुआ था. हमने एक टीम के रूप में काम किया. अगर हम एकजुट होकर काम नहीं करते तो हमें जीत नहीं मिली होती. यह सब दुष्प्रचार है जो बीजेपी फैला रही है.

आपने स्वीकार किया है कि प्रधानमंत्री मोदी देश के सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता है. क्या आपको लगता है कि राहुल गांधी अपने को मोदी के विकल्प के तौर पर पेश कर पाएंगे ?

राहुल गांधी मोदी के नेतृत्व का एक मजबूत विकल्प बनकर उभरे हैं. मोदी अपनी सारी गलतियों का दोष कांग्रेस को नहीं दे सकते. राहुल गांधी सत्ताधारी बीजेपी के काम और मकसद को चुनौती देते हुए मुश्किल सवाल पूछ रहे हैं. वे उनलोगों को जवाबदेह ठहरा रहे हैं और उनपर बेधड़क हमला बोल रहे हैं. वे उनलोगों के साथ सीधे-सीधे दो-दो हाथ कर रहे हैं और इससे लोगों को बहुत ताकत और ऊर्जा मिल रही है.

लेकिन कांग्रेस बीजेपी का क्या विकल्प पेश कर रही है?

राहुल गांधी कह चुके हैं कि कांग्रेस सत्ता में आई तो जीएसटी को सरल बनाया जायेगा. हम सुनिश्चित करेंगे कि हमारी अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं कहीं ज्यादा सुरक्षित हों. हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा अभी लड़खड़ा रही है, हम अपनी आर्थिक और विदेश नीति को मजबूत बनाने के लिए काम करेंगे. कांग्रेस खाली वादे करने में यकीन नहीं करती, हम काम करके दिखाने में यकीन करते हैं. हम एक रिपोर्ट कार्ड पेश करेंगे कि किसने बेहतर ढंग से शासन किया है.

क्या आपको ऐसा लगता है कि आने वाले चुनाव में विपक्षी दल एनडीए के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए एकजुट होंगे?

बीजेपी के खिलाफ खड़ी सभी पार्टियों को राष्ट्रीय स्तर पर एकसाथ आना होगा. देश के व्यापक हित में बीजेपी पर सीधा हमला बोलने के लिए सभी पार्टियों को एकजुट होना पड़ेगा. कांग्रेस एक धुरी का काम करेगी और कांग्रेस के इर्द-गिर्द सारी पार्टियां एकजुट होकर मंच बनाएंगी. पूछने का सवाल यह बनता है कि एनडीए किस हाल में है. बीजेपी ने शिवसेना से नाता तोड़ लिया है, टीडीपी के साथ उसका रिश्ता टूट के कगार पर है और बाकी सहयोगी दल भी खुलकर नाराजगी जता रहे हैं. सत्ता में होने के बावजूद बीजेपी अपने सहयोगी दलों को साथ नहीं रख पा रही.

कांग्रेस का कहना है कि वह गुजरात के चुनाव में अपने प्रदर्शन से संतुष्ट है. लेकिन सच्चाई यह है कि बीजेपी की चुनावी मशीनरी की राह आपने रोकी जरुर लेकिन जीत बीजेपी की ही हुई

बीजेपी 116 सीटों ( 2012 के चुनाव) से घटकर अब दहाई अंकों पर आ गई है. कांग्रेस बीजेपी को पीछे धकेलने में कामयाब रही है. बीजेपी की नाकामी सबको नजर आ रही है. वे लोग रोजगार देने में नाकाम रहे, कृषि-संकट बेसंभाल हुआ, कालेधन पर रोक नहीं लगी और चीन और पाकिस्तान का मसला भी उनसे नहीं संभल पा रहा. लोग उनकी जुमलेबाजी से थक चुके हैं. देश के लोग उनसे सवाल पूछ रहे हैं लेकिन बीजेपी के पास इन सवालों का जवाब नहीं है.

किन मामलों में आपको लग रहा है कि बीजेपी भारत की जनता की उम्मीदों को पूरा करने में नाकाम रही और अगले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के ख्याल से कांग्रेस ने कौन से मुद्दे उठाने की उम्मीद लगाई है?

बीजेपी ने वादा तो किया था कि चांद लाकर देंगे लेकिन जमीन पर उनका काम एकदम ना के बराबर है. लोग ऐसी सरकार चाहते हैं जो सचमुच काम करके दिखाए ना कि एक ऐसी सरकार जो अच्छे-अच्छे भाषण सुनाए.

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